एक दिन अपनी टीचर के साथ
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| A day with my Teacher |
पता है आपको ,बीते सन्डे मैं मेरे कॉलेज टाइम की favorite टीचर और मेरी रहनुमा मिसेज़ वसुमती अग्निहोत्री अपने बच्चों के साथ हमारे घर आयी थीं . तक़रीबन 10-15 साल के बाद मैं उनसे मिल रही थी .....बहुत खुश थी मैं .
उनसे मेरा रिश्ता तब का है जब मैं 11th क्लास में पढ़ती थी और वो हमारी हिस्टरी टीचर थी . उन्हें हम वसु दीदी कहते थे क्योंकि हमारे कॉलेज में टीचर को दीदी बुलाया जाता था .
एक सुलझी हुए सोच , निडर और बिंदास अंदाज़ और हमेशा अपने स्टुडेंट्स को सुनने -समझने और मदद करने को तैयार रहने वाली रौबदार शक्सियत रही हैं वसु दीदी । उन्हें शेरो -शायरी का भी शौक़ था , गाती भी अच्छा थी, इसलिए कॉलेज में होने वाली Extra Curricular Activities में उनकी सुरीली आवाज़ में गीत और गज़ले भी सुनने को मिलते थे।
वो अपने स्टुडेंट्स का बहुत ख़याल रखती थी ,बात उन दिनों की है जब हमारे 12th के बोर्ड के इम्तिहान हो रहे थे ..... मैं इम्तिहान दे रही थी .... और मुझे ठण्ड लग रही थी .... वसु दीदी क्लास में स्टुडेंट्स को चेक करने आयी थी, उन्होंने मुझे देखा ...और बिना कुछ कहे अपनी शाल उड़ा दी. हॉल में बैठी बाक़ी लडकियाँ तिरछी निगाहो से मेरी तरफ देखने लगी थी . क्योकि वसु दीदी की रौबदार शक्सियत से लड़कियां जल्दी उनसे बात करने में झिझकती थी . मुझे भी अपनी पसंददीदा टीचर से मिला ये प्यार और अहमियत बहुत अच्छी लग रही थी और इस वाक़ये के बाद मैं जज़्बाती तौर पर उनसे जुड़ने लगी थी .
उनकी जिंदिगी का एक पहलु ये भी है की वो इंसानियत के नाते हमेशा दूसरो की मदद करने को तैयार रहती थी। इंसानियत की एक मिसाल उन्होंने तब क़ायम की, जब उन्होंने Muscular Dystrophy जैसी बीमारी ,(जिसमे मरीज़ हिलडुल भी नहीं पाता) की एक Patient पदमा अग्रवाल की लम्बे वक़्त तक ख़िदमत की और उनका ख़याल रखा. उनके दर्द को कम करने और उनका हक़ दिलवाने के लिए न जाने कितने लोगो से लड़ी , दुश्मनी मोल ली ... लेकिन पीछे नहीं हटी.
वसु दीदी ने पदमा दीदी को कमरे की चार दिवारी से निकाला, और उन्हें हरे - भरे पार्क की सैर से लेकर पहाड़ो तक की सैर करवायी. वसु दीदी ने उन्हें ख़ुश रखने और उनके होटो पर मुस्कराहट लाने की हर मुमकिन कोशिश की .जिसमे वो कामयाम रही .
वसु दीदी ने ही मेरी मुलाक़ात पदमा दीदी से करवाई थी,जो उम्र में मुझसे काफी बड़ी थी, मेरा मानना है की दोस्ती के लिए उम्र नहीं बल्कि सोच और ख़याल मिलना ज़रूरी होता है. पदमा दीदी मेरी मुलाक़ात कब दोस्ती के गहरे रिश्ते में बदल गयी मुझे पता ही नहीं चला , पद्मा दीदी का दर्द मुझे भी बहुत दुःख देता था ... और मैं दिल से उनके लिए कुछ करना चाहती थी। यहाँ मेरे मम्मी - डैडी से, विरासत में मिली इंसानियत और वसु - दीदी की Inspiration ने मेरे हौसले बुलंद किये .... जिसकी वजह से मैं भी पदमा दीदी की थोड़ी बहुत ख़िदमत कर सकी.
पदमा दीदी की बारे में क्या बताऊ , बस इतना ही कह सकती हूँ की उन जैसे लोग ख़ुदा बहुत कम ही बनाता है ,उनकी Death से एक दिन पहले ही मैं उनसे मुलाक़ात करने गयी थी और अगले दिन ही पता चला था की वो इस दुनिया से चली गयी हैं . उनका नाम आते ही आज भी आखें नम हो जाती है . उनसे वो आख़री मुलाक़ात और उनके प्यार का अहसास आज भी मेरे साथ है .
इसके बाद जब वसु दीदी पहली बार हमारे घर आयी थी , उससे जुडी ख़ूबसूरत याद आज भी मेरे ज़हन में ताज़ा है , उन्हें अपने घर में देखकर मेरी ये समझ में नहीं आ रहा था की उन्हें कहां उठाऊ .... कहाँ बिठाऊ . जब वो मेरे मम्मी - डैडी से मिली तो उन्हें और भी ज़्यादा अच्छा लगा और फिर हमारे घरेलु ताल्लुक़ात हो गए थे और हम अक्सर एक दुसरे के घर आने -जाने लगे ,इसके बाद हम सब अपनी- अपनी ज़िन्दिगियो में मसरूफ होते चले गए ... मैं अपनी पढ़ाई में .... और वसु दीदी कामयाबी की ऊचाईयों को छूती चली गयी, इंटर कॉलेज की टीचर से वो प्रिंसिपल बनी प्रिंसिपल से District Inspector Of School बनी और फिर लखनऊ में Deputy Director Of Education की पोस्ट को बाख़ूबी संभाला और जुलाई 2011 को Deputy Director की पोस्ट से रिटायर हुई .
इतने लम्बे अरसे के बाद हम मिल रहे थे ..... यक़ीन जानिये ,मिल कर ये बिल्कुल भी नहीं लगा की जैसे हमें 15 साल के बाद मिल रहे हैं । वसु दीदी आयी..... आराम से बैठी, अपनी तजुर्बेकार नज़रों से हमारे चहेरों को पढ़ती रही ---- प्यार से मुस्कुराती रही . वो लखनऊ से मशहूर चिकन के कुर्तो के रूप में , हम सब के लिए अपना प्यार समेट कर लाई थी जो हम सब को पसंद आया , और हमने सर झुका कर क़ुबूल किया . उनके बच्चे और मेरा भाई शैली (अली ) और मेरी बहन सिम्मी (हिना), हम सभी एक- दुसरे से मिल कर बेहद खुश थे.
मैंने उनके लिए अच्छा सा लंच तैयार किया जिसे हम सब ने साथ खाया खाने के बाद गरमा - गरम चाय और शेरो -शायरी का भी दौर चला जिसे देख कर पुराने दिनों की यादें ताज़ा हो गयी बातो - बातो में ये पता ही नहीं चला कब तीन घंटे बीत गए ..... फिछले कई सालो का स्टॉक था .... बातो का ... इसलिए दिल किसी का भी नहीं भरा था न उन लोगो का .... न ही हमारा ....फिर भी उन्हें जाना था इसलिए फिर मिलने का वायदा करके भारी दिल से उन्हें खुदा हाफ़िज़ कहा .
कुछ रिश्ते ऐसे
होते है जिनमे बेहद अपना पन होता है जहां आपकी सोच और ख़याल
इतने मिलते होते है, की आपको किसी तसन्नो , किसी बनावट या
किसी शो ऑफ की ज़रुरत नहीं होती, कुछ समझाने की ज़रूरत नहीं
होती, बिना कहे बाते समझ ली जाती हैं .
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| A day with my Teacher |
तब ....उस रिश्ते की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ जाती है जब रिश्ता एक " टीचर और एक स्टुडेंट" का हो मै उन ख़ुशकिस्मत स्टुडेंट्स में से एक हूँ .जिसे अपनी टीचर मिसेज़ वसुमती अग्निहोत्री के रूप में एक ऐसा गाइड मिला है , जिन्होंने एक रहनुमा बन कर मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाया और आगे बढ़ने का हौसला दिया .
अरशिया ज़ैदी
अरशिया ज़ैदी


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