22 Dec 2011

Ek House Wife ki Ahmiyat

                  एक हाउस वाइफ की अहमीयत 


आज वसुंधरा जब इंग्लिश स्पीकिंग का क्लास करने आई तो कुछ उदास सी लग रही थी,मैंने वजह पूछी तो अपना दर्द बया करते हुए कहने लगी कि "क्या बताऊ,एक House Wife होने की सज़ा भुगत रही हूँ.सुबह से लेकर रात तक घर के लोगो के लिए तमाम जिम्मेदारियों को निभाने में लगी रहती हूँ .....अपनी थकान की परवाह किये बगैर सब की छोटी से छोटी ज़रुरत का ख्याल रखती हूँ लेकिन इसके बावजूद भी मेरी मेह्नत और कोशिशो को पूरी तरह से नकार दिया जाता है,जबकि मेरी देवरानी,जो एक Working Woman' तो है लेकिन घर और घर के लोगो के लिए बिल्कुल  लापरवाह है फिर भी घर के सभी लोग उसे अपने सर पर बैठा कर रखते है और उसका खास ख्याल रखते हैं. 
              बात तो सही है वसुंधरा की,पता नहीं क्यों, हमारी सोच इतनी baised हो गयी है.जहा हम Working Women को ज़रुरत से ज्यादा अहमियत देने लगे है, वही हम घर की Life Line कही जाने वाली  house wives की अहमियत को सिरे से नकार रहे है .....जैसे घर में रहने वाली औरते कुछ करती ही नहीं ऐश करने के अलावा !
           बेशक,आज के दौर में औरतों का financially independent होना और अपनी शक्सियत को पहचान देना बेहद ज़रूरी है लेकिन जनाब,घर-गृहस्थी की देख भाल करना भी कोई बच्चो का खेल नहीं है,बहुत हुनर मंदी का काम है ये ..... जिसे बिल्कुल भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.घर परिवार को ताख़ में रखकर सिर्फ करियर और पैसा कमाने को ही अपनी ज़िन्दगी का मकसद समझ लेना एक सेहत मंद सोच की निशानी नहीं कही जा सकती है .
                    ज़रा उन लोगो से पूछिए,जिन्हें रोज़ घर लौटने पर दरवाज़े  पर लगा ताला मुह चिढ़ाता हुआ मिलता है और घर के अंदर दाखिल होते ही तन्हाई और अकेलापन उनका स्वागत करता है .....एक गिलास पानी देने वाला भी कोई नहीं होता,खुद ही पानी लेकर,सूखा गला तर करना पड़ता है.खुशनसीब है आप.... अगर आपके घर लौटने पर कोई आपका इन्तिज़ार करता हुआ मिलता है.   
            एक 'घरेलू औरत',या 'होम मेकर' किसी भी घर के लिए एक वरदान होती है,जो घर के लोगो को सुख और आराम देने के लिए दिन-रात घर के कामो में लगी रहती है.और अपनी नेक कोशिशो से ईंट-पत्थर के मकान को ख़ूबसूरत घर में बदल देती है.जिन बेशकीमती जज्बातों और feelings के रहते वो यह सब करती है,उसकी कोई भी कीमत नही लगायी जा सकती है.
             जो जायका घर के बने खाने में होता है वो जायका आपको दुनिया के किसी होटल के खाने में नहीं मिल सकता,और रोज़ रोज़ जंक फ़ूड खा-खा के तो गुज़ारा भी नहीं किया जा सकता.अच्छे-अच्छे लज़ीज़ खाने पकाना भी एक आर्ट है,जिसमे अच्छा खासा वक़्त लग जाता है और एक House Wife बड़े जतन और प्यार से घर के सभी लोगो की पसंद-नापसंद का ख़याल रखते हुए लज़ीज़ खाना तैयार करती है.जिसे हम चट्खारे ले ले कर खाते हैं. 
 छोटे बच्चे जो कच्ची मिटटी की तरह होते है,जैसे ढालो ढल जाते है.माँ बच्चे की सबसे पहली और सबसे बेहतरीन टीचर होती है जो न सिर्फ बच्चो की सबसे अच्छी देखभाल और परवरिश कर सकती है बल्कि उसे अच्छे संस्कार भी सिखाती है.अगर माँ ही घर पर नहीं रहेगी तो बच्चो की अच्छी परवरिश कैसे होगी,उन्हें अच्छा-बुरा,सही-गलत का फर्क कौन समझाएगा?  वो भी आज के दौर में जब joint family ख़त्म हो चुकी हैं और nuclear family का ज़माना है.
     ऐसा पैसा किस काम का,जब आपकी नन्ही सी बेटी को आपकी सबसे ज्यादा ज़रुरत हो,उस वक़्त आप उसे रोता बिलखता छोड़ कर काम पर चली जायें,अपने बच्चो को बड़ा होता हुआ न देख सके ......उनकी  किल्कारिया ना सुन सके और आपके होते हुए भी आपके मासूम बच्चो की परवरिश creche या नौकरों के हाथो में हो.
             घर में माँ की नामौजूदगी कई बार बच्चो को चिडचिड़ा,जिद्दी और बत्तमीज़ बना देती है.छोटे बच्चो को creche और नौकरों के भरोसे छोड़ना  कई बार कितना खतरनाक हो जाता है,उनके साथ कैसे कैसे संगीन हादसे हो जाते है इसकी ख़बरे तो आये दिन अखबारों की सुर्खियाँ बनती ही रहती है.
            इसके अलावा आज कल स्कूल जाने वाले बच्चो को भी तरह तरह के assignment करने को दिए जाते है जिसमें बच्चो को guidance और help की ज़रुरत होती है.ऐसे में अगर माँ ही घर पर नहीं होगी .... हेल्प के लिए,तो बच्चो की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ सकता है.
            एक House Wife के घर पर रहने से घर के दरवाजे हर वक़्त मेहमानों के लिए खुले रहते है.मेहमानों को घर में आने के लिए वक़्त की पावंदी नहीं झेलनी पड़ती,और चाय की चुस्कियो के साथ एक-दुसरे से मिलना-जुलना और गपशप के मज़े लेना भी आसान हो जाता है.उनके घर में रहने से नौकरों पर भी निगरानी बनी रहती है और वो अपने काम को करने में लापरवाही नहीं कर पाते,नहीं तो घर के सामान को बेदर्दी से इस्तेमाल करने और तोड़ने फोड़ने में इन्हें ज़रा भी हिचक नहीं होती.  
         घर में रहने वाली एक घरेलू औरत की अहमियत का अहसास उस वक़्त सबसे ज्यादा होता है जब,ख़ुदा न खास्ता घर में कोई बीमार पड़ जाता है,मरीज़ को देखभाल और तीमारदारी की ज़रुरत होती है.ऐसे में वो न सिर्फ प्यार से मरीज़ की तीमारदारी करती है बल्कि बिस्तर पर बीमार पड़े होने की बोरियत और अकेलेपन से भी बचाती है.जो एक महगी नर्स कभी नहीं कर सकती.
                        चाहे कोई कुछ भी कह ले,और कितनी भी दलीले क्यों न दे दी जाये लेकिन सच तो यह है कि,House Wives की अहमियत को Working Women के मुक़ाबले किसी भी लिहाज़ से न तो कम आकां जा सकता है और न ही उसकी शख्सियत को हलके में लिया जा सकता है.

अरशिया  ज़ैदी

16 Dec 2011

Dream(khuaab)

                                         ख़ुआब
                 बनाऊ मुकाम और पहचान अपनी 
                 ये एक ख़ुआब बचपन से मैंने है देखा, 
                 हो ख़ुद फैसला करने का, हौसला भी 
                 बनू एक अच्छा, सहारा मैं ख़ुद का .

                 तमन्ना है मुझको खुले आसमा की 
                 जहां मेरी परवाज़,हो इतनी ऊची, 
                 मैं खुद्द्दार हू मेरी दौलत यही है 
                 न मुझपे उठे नज़रे बेचारगी की.

                  अरशिया  ज़ैदी 

3 Dec 2011

Park

                                         पार्क 



 जिंदिगी के सफ़र में कुछ खुशनुमा यादें ऐसी होती है जो हमेशा हमारे साथ रहती है.मेरी,ऐसी ही एक याद उस पार्क से जुड़ी  हुई है,जहां मैं रोज़evening walk के लिए जाया करती थी,वहां बाक़ी लोगो के अलावा,आस पास की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चे भी municipality के नल से पीने का पानी भरने आया करते थे.इन बच्चो में,किसी के तन पर पूरे कपड़े नहीं थे तो किसी के नन्हे पैर बिना चप्पल के थे ... लेकिन फिर भी,उनके माथे पर शिकन का  नामो- निशान  नहीं था.

पार्क में आते ही,ये बच्चे सबसे पहले अपने साथ लाये छोटे- बड़े डिब्बो को एक किनारे रख देते और दौड़ कर झूले पर चढ़ जाते....झूला झूलते,फिर पकड़न-पकडाई खेलते हुए एक दुसरे के पीछे भागते रहते. शाम ढलने से पहले,अपने साथ लाए डिब्बो में नल से,पीने का पानी भर के अपने घर ले जाते.जो डिब्बे पानी के वज़न से भारी हो जाते,और जिन्हें उनके छोटे- छोटे हाथ नहीं उठा पाते तो वो उन्हें घसीट कर अपने घर ले जाने की कोशिश करते थे .    



एक दिन पार्क में टहलते हुए मेरी नज़र इन बच्चो पर पड़ी ... मैंने देखा कि एक रिक्शा ठेला, जिस पर,इन बच्चो ने कई पानी से भरे छोटे-बड़े डिब्बे रख लिए है .... और वो ठेला ढलान भरे गेट से नीचे नहीं उतर पा रहा है.इन्ही बच्चो में से एक 8-10 साल का लड़का,उस रिक्शा ठेला को पार्क के ढलान भरे रास्ते से उतारने की कोशिश कर रहा है और पीछे से नन्हे नन्हे 5-6 बच्चे उस रिक्शे को धक्का लगा  रहे है ... मैं जल्दी से गयी और 'रिक्शा ठेला' को उस ढलान भरे रास्ते से उतरवा दिया ..... बच्चे मुस्कुरा दिए और   "थैंक यू आंटी" कह कर चले गए .
अब इन बच्चो को जब भी मदद की जरूरत होती .... वो मुझे आवाज़ लगा देते ....कभी कहते कि"आंटी... मेरा डिब्बा... ठेले पर रखवा दो" .......
तो कभी कहते कि आंटी ....."ठेला ढलान से नहीं उतर पा रहा है ..... आ कर धक्का लगवा दो न".
 इस तरह अब हमारी अच्छी-ख़ासी जान-पहचान हो गयी थी.
उस पार्क के सामने 'सबका बाज़ार' नाम का एक किराना स्टोर था जहां से मैं अक्सर घर की ज़रुरत का सामान खरीदा करती थी.इसलिए  कभी-कभी अपने साथ एक छोटा सा पर्स भी ले जाती थी.एक दिन उन्ही बच्चो में से, एक नन्ही से लड़की ने मेरे हाथ में पर्स देखा तो कहने लगी .....
 'आंटी पैसे दो न' ....'आंटी पैसे दो न' ... 
और ये कह कर मेरे पीछे पीछे चलने लगी ...... मैंने भी चलते चलते उसे जवाब दिया.
"नहीं अच्छे बच्चे पैसा नहीं मागते,हाँ .....अगर तुम्हे कुछ चाहिए तो बताओ .... मैं  तुम्हे खरीद दूंगी".
अभी हमारी बात-चीत चल ही रही थी कि उस लड़की के बाक़ी साथी भी आ गए .... और बड़े ग़ौर से हमारी बात सुनने लगे  ...... क्यूंकि मुझे उन की फरमाइश पूरी करनी थी इसलिए मैंने वहां खड़े सभी बच्चो से मुख़ातिब होकर उनसे अपनी फरमाइश बताने को कहा ....
अब इन बच्चो ने शर्माना शुरू कर दिया...  मेरे काफी पूछने पर इनमें से कुछ बच्चो ने तो"मैदा की बनी मठरियां" खाने की फरमाइश की लेकिन  कुछ बच्चे अभी भी खामोश खड़े थे ..... शायद कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन झिझक की वजह से कह नहीं पा रहे थे.मैंने भी हार नहीं मानी और कोशिश करती रही.आखिर मेरी कोशिश रंग लायी और मुझसे जवाब में कहा गया कि -
"हमें नारंगी  रंग का पानी पीना है"यानि वो कोल्ड ड्रिंक पीना चाहते थे.
"चलो तुम्हारी फरमाइश पूरी करते है ."
अभी मैंने ये कहा ही था कि, सभी बच्चे खुश होते हुए पार्क के बाहर लगी खोके नुमा दूकान पर जा पहुचे.बच्चो ने जैसे ही वहां सजे शीशे के जार में मठरियां देखी .... तो चिल्ला पड़े.....और उस तरफ इशारा करते हुए बोले "वो रहीं मठरियां...... हमें तो वो खानी है".
मैंने दूकानदार से इन बच्चो को मठरियां देने को कहा .... दुकानदार ने पहले तो हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा कर सब बच्चो को मठरियां पकड़ा दी.मठरियां देते वक़्त उस दुकानंदार के चेहरे पर भी तसल्ली झलक आयी थी.
अब 'उन' बच्चो को अपनी फरमाइश पूरी होने का इन्तिज़ार था जिन्होंने "नारंगी रंग का पानी"(कोल्ड ड्रिंक)पीने की खुआइश ज़ाहिर की थी.लिहाज़ा अब,हम सब,सामने के किराना स्टोर में घुस गयी.चमचमाते स्टोर में जा कर पहले तो ये बच्चे ज़रा.... झिझके.फिर वहा सजी खाने पीने की चीजों को ताकने लगे.अचानक उनमे से एक बच्चे की नज़र फ्रिज में रखी कोल्ड ड्रिंक पर पड़ी .. जिसे देखते ही वो ख़ुशी से चिल्ला पड़ा ...
." अरे..... वो रही नारगी रंग की बोतल ...  मैं तो यही पियूँगा".
मैंने फ्रिज से उनकी पसंदीदा "नारंगी रंग की बोतलें "निकाल कर उनके हाथो में थमा दी 
बिल का पेमेंट करके, हम सब दूकान के बाहर आ गए.बाहर आते ही उन सब ने बिना देर किये कोल्ड ड्रिंक की बोतले खोल कर "नारंगी रंग का पानी"  पीना शुरू कर दिया.

उस लम्हा मैंने उन मासूम बच्चो के चहेरों पर  जो ख़ुशी देखी .   उसे देख कर मेरा दिल  सुकून के खुशनुमा अहसास से भर गया.ये खुशनुमा अहसास एक हसीन याद बन कर हमेशा मेरे साथ रहेगा .


 अरशिया ज़ैदी 

24 Nov 2011

Koun Banega Karodpati-Season-5



नया इतिहास बना गया ....कौन  बना करोड़पति  सीजन -5


   . ब्रिटिश टेलीवीज़न के पोपुलर रिअलिटी शो WhoWants To Be A Millionaire की तर्ज़ पर बना "कौन बनेगा करोडपति सीज़न-5"ख़त्म हुए हफ्ता बीत चुका है लेकिन आज भी लोगो की ज़हेन में इसकी यादें ताज़ा है. जहाँ सबको अपने इस पसंदीदा रिअलिटी शो के ख़त्म होने का मलाल है . वही सब, बेसब्री से अगले सीज़न में केबीसी-6 शुरू होने का इन्तिज़ार कर रहे है.  
 
और इन्तिज़ार करे भी क्यों न,आख़िर "केबीसी-5"सैकड़ो लोगो के दिलो पर अपनी ऐसी गहरी छाप छोड़ी है जिसे मिटा पाना आसान नहीं होगा. हिंदुस्तान के आम आदमी को आसमान का सितारा बना कर इस गेम शो ने कामयाबी का नया इतिहास बना दिया है.शो की रूह कहे जाने वाले बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने आखरी एपीसोड में जिस वक़्त गुड बाय कह कर विदाई ली, उस वक़्त लोगो की आखें नम हो गयी थी.


KBC सीज़न-5 में ग्लैमर की चमक दमक के बजाये,हिंदुस्तान के एक आम आदमी की तमन्नाओं को उड़ान भरते देखा गया.इस शो ने ऐसे लोगो के लिए रास्ते बनाये जिसके पास इल्म की दौलत थी,जिंदिगी में कुछ कर गुज़रने का जूनून था लेकिन  अगर कुछ नहीं था तो..... वो था मौक़ा ..... .और ये मौक़ा मुहैया कराया केबीसी ने,जिसने इनके करोड़पति बनने का ख़ुआब हक़ीक़त  में बदल दिया .
इस बार जिस Tag Line  को प्रोमोट करते हुए KBC-5  ने अपना सफ़र शुरू किया ..वो थी ...."कोई इंसान छोटा नहीं होता"और जिन लोगो ने जीत का इतिहास बनाया ... उनकी...... जिंदिगी से, कोई लम्बी- चौड़ी फरमाइशे नहीं थी.बस किसी को सर छुपाने की लिए अपना घर खरीदना था तो कोई अपने घरवालो और बच्चो का "कल" महफूज़ करना चाहता था. 
Sushil Kumar House in Bihar 
केबीसी-5 में,5 करोड़ जीतने का इतिहास रचने वाले 27 साल के सुशील कुमार को आज पूरा हिंदुस्तान जानता है  ..... ये वही सुशील कुमार है जिनके बाबूजी के पास,बीते मानसून में टपकती छत को ठीक कराने के पैसे नहीं थे,आज हर कोई सुशील कुमार के उस घर को देखना चाहता है ... जहा ये माटी का लाल पला बढ़ा,जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में दूसरी बार जूता तब पहना जब वो KBC में हिस्सा लेने आये थे . 


हमारा बदलता भारत,जहा लोगो में बेशुमार क़ाबलियत है लेकिन उनके पास मौक़े नहीं थे  ......ज़रिये नहीं थे,जो उन्हें कामयाबी दिला सके.चार  महीने तक चले केबीसी-5 में, भारत के कोने कोने में छुपी क़ाबलियत और असली टैलेंट देखने को मिला .मध्य प्रदेश का इमली खेडा,उड़ीसा का  लास्ताला,उतराखंड का कुञ्ज बहादुरपुर,उत्तर प्रदेश का उबारपुर जैसे दूरदराज़ इलाके और क़स्बे,जिन्हें बहुत ही कम लोग जानते थे अब ये जगाहें अखबारों की सुर्खियाँ बन कर चमक रहे है .


इस बार इस रिअलिटी शो के प्रोडूसर ने ग्लैमर और स्टारडम के ज़रिये अपने प्रोडक्ट को बेचने के बजाये आम आदमी पर फोकस रखा,जिसके लिए KBC की टीम ने हिंदुस्तान के दूरदराज़ इलाको की खूब ख़ाक छानी.और असली टैलेंट को ढूँढ निकाला.

ऐसे लोग,जिन्हें ज़िन्दगी में कोई रास्ता नज़र नहीं आता था,उनके लिए केबीसी-5 ने ना सिर्फ रास्ता बनाया,बल्कि एक ऐसी मंजिल पर ला कर खड़ा कर दिया जहां से कई और रास्ते कामयाबी की नयी ऊचाइयों को छूने के लिए खुल गए .
Rukhsana  kouser 
Aparna Maaliker 
 आतंक वादियों से लोहा लेने वाली बहादुर रुखसाना कौसर हो या अपर्णा मालेकर जैसी क़र्ज़ में डूबी .एक विधवा ..... या पेड़ से गिर कर हमेशा के लिए अपनी टाँगे खो देने वाले युसूफ मल्लू .केबीसी ने  इन सबको एक बेहतर ज़िन्दिगी गुजरने के लिए पैसे दिए. इसके अलावा दो दर्जन से ज्यादा लोगो को केबीसी ने लखपति बना कर ख़ुशी ख़ुशी घर रवाना किया  .


केबीसी-5 में 'आम आदमी' पर फोकस करने का 'आईडिया 'बेहद कामयाब रहा.जिसने सबको प्रोफिट पहुचाते हुए,सबकी जेबें नोटों से भर दी, फिर चाहे वो इस प्रोग्राम को बनाने वाले प्रोडूसर हो,या इस प्रोग्राम का हिस्सा बनने आये मेहमान हो,सब इसके प्लेटफ़ॉर्म से खुश होकर अपने घर गए. 
Sushil Kumar & Amitabh  Bachchan 


टी.वी इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस बार केबीसी-5 में10 सेकंड का एक 'एड स्लोट' तक़रीबन साढ़े तीन लाख रूपए में बिका. इस हिसाब से अगर हम देखे तो KBC-5 की हर दिन की आमदनी 2 करोड़ रूपए बनती है.जबकि आमतौर पर रिअलिटी शो पर इतने ही वक़्त का एक 'एड स्लोट' डेढ़ लाख से ढाई लाख रूपए में बिकता है.सुना गया है कि जिस दिन बिहार के सुशील कुमार ने पांच करोड़ रूपए जीते उस दिन TRP 7.2 से लेकर 8 तक पंहुचा गयी थी जो अपने आप में किसी गेम शो का रिकॉर्ड है. इस बेहद मशहूर और कामयाब रिअलिटी शो के ख़त्म होने के बाद बाकी रिअलिटी शो यकीनन चैन की सांस ले रहे होंगे.

Yusuf  Mallu 
केबीसी में जान डालने वाले 'स्टार ऑफ़  द मिलेनियम'  अमिताभ बच्चन के बिना तो इस शो का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता उन्होंने,जिस शानदार तरीक़े से केबीसी-5 को होस्ट किया और शो में हिस्सा लेने आये  हर मेहमान से,जिस हमदर्दी,अपनेपन और इज्ज़त से पेश आये उसकी जितनी भी तारीफ की जाये वो कम होगी.एक एपीसोड़ में जब हॉट सीट पर बैठे युसूफ मल्लू का अपाहिज होने का दर्द उनकी आखों से छलक पड़ा था, तो इस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी हॉट सीट से उठ कर जिस हमदर्दी और अपनेपन से उनके आसूं पोछे थे उसे देख कर हर किसी का दिल भर आया था.


खबर है कि अमिताभ बच्चन ने केबीसी -6 के लिए कांट्रेक्ट साइन कर लिया है जिसे देखने के लिए हम सब को अगले सीज़न तक इन्तिज़ार करना पड़ेगा. उम्मीद है कि केबीसी के नए सीज़न में पुराने रिकॉर्ड टूटेंगे ...  कामयाबी के कुछ नए इतिहास रचे जायेंगे और कई और ज़रूरतमंद  लोगो की ज़िन्दगी बेहतर और खूबसूरत बनेगी .


अरशिया  ज़ैदी













3 Nov 2011

Roshni ka Diya

                                        रौशनी का दीया 

बीते हफ्ते में रौशनी फैलाने वाले त्यौहार दीवाली को हम सब ने बड़ी धूम धाम से मनाया.भगवान श्री राम के14 बरस बाद अयोध्या लौटने की ख़ुशी में जहां हर तरफ रौशनी की जगमगाहट देखने को मिली वही कुछ ऐसे बदलाव भी नज़र आये जिन्होंने ये महसूस करने को मजबूर कर दिया की शायद अब दीवाली सिर्फ अमीर लोगो का त्यौहार बन के रह गया है.

दीवाली की असली मिठास जो शक्कर के खिलौनों खीले,बताशे और मिठाई  में हुआ करती थी.रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलना मिलाना अपने आप में एक तोहफा  हुआ करता था ...वो सब,अब पैसे की चकाचौंद और दिखावे में कही गुम सा हो होने लगा है. ज़रुरत से ज़्यादा  बाज़ार के - commercialization ने इस ख़ूबसूरत त्यौहार  के मायने ही बदल डाले हैं 

दीवाली में लोगो का रूझान जिस चीज पर सबसे ज्यादा दिखाई पड़ा ,वो थी महगी खरीददारी और तोहफे देने का चलन. यूं तो कोई भी तोहफा अनमोल होता है और अपने प्यार और जज़्बात को बयाँ करने के लिए तोहफे लिए और दिए जाते है.जिसे हर कोई सर- आँखों पर रखता है .बात अगर यहाँ तक रहे तो समझ में आती है लेकिन अब इस महगाई के ज़माने में दीवाली पर गिफ्ट देना एक थोपा हुआ रिवाज भी बनता जा रहा है, जो मिडिल क्लास की जेब पर जहां गैरज़रूरी बोझ डालता है वहीँ बेचारे ग़रीब आदमी को अहसास ए कामतरी का शिकार बना देता  है.

अब दीवाली के मौके पर,लोगो ने गिफ्ट के नाम पर रिश्वत देने को एक ख़ूबसूरत बहाना बना लिया है अपने बॉस या client को खुश करना हो या अपने कारोबार में फायदा लेने की मंशा हो.दीवाली के मौके पर दिया गया हर तोहफा जायज़ मान लिया जाता है.जितना बड़ा अपना फायदा उतना बड़ा और महगा तोहफा.  अब हर तरफ तोहफे देने की होड़ सी नज़र आने लगी है.

  इस चकाचौंध में कही कोई गुम हो रहा है तो वो है गरीब आदमी. हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है.अमीर और ज़्यादा अमीर होते जा रहे है,ग़रीब और ज्यादा गरीब जिनकी जेबें गर्म हैं, जिनके पास खर्च करने के लिए खूब सारे पैसे है वो तो महगे तोहफे और महगी खरीददारी कर के अपनी दीवाली को अच्छी तरह मना लेते है .लेकिन अँधेरा दूर करने वाले इस त्यौहार में, उस ग़रीब तबके का क्या, जिसके पास मामूली ख़रीददारी करने के लिए भी पैसे नहीं होते.जिसे अँधेरे घर में जलाने के लिए थोड़े से दिए मिल जाये तो उसके लिए काफी होता है .मिठाई के नाम पर खीले,बताशे और शक्कर के खिलौने ही नसीब हो जाये तो उसका त्यौहार ख़ुशी ख़ुशी मन जाता है.

 क्या हम अपने फूज़ूल खर्च को रोक कर कुछ दीये उनके घरो में नहीं जला सकते जिनके घर अँधेरा है ? कुछ मिठाई,कुछ  कपड़े उनके लिए नहीं खरीद सकते जिनको ये मयस्सर नहीं ? अगर हम सब थोड़ी थोड़ी कोशिश करें तो ये न मुमकिन भी नहीं ....... सबकी तरफ से की गयी छोटी छोटी कोशिशें किसी  घर में अँधेरा नहीं रहने देंगी.
 ऐसी ही काबिले तारीफ पहल की है ....हिंदुस्तान के तीसरे सबसे अमीर भारतीय और विप्रो के chairman अज़ीम प्रेम जी ने .जो देश भर के गरीब बच्चो तक इल्म की रौशनी पहुचने के लिए अपने पैसे से,ऐसे स्कूल खोलने जा रहे है,जहां ग़रीब बच्चो को प्री स्कूल से लेकर 12 क्लास तक की education बिल्कुल मुफ्त दी जाएगी और जिस चीज़ पर सबसे  ज्यादा ध्यान दिया जायेगा वो  होगी ......  quality education.
 धने अँधेरे में इल्म की रौशनी का दिया जलाने वाले अज़ीम प्रेम जी की इस पहल के बाद इंशाल्लाह और हस्तियाँ भी इस मुहिम में शामिल होंगी और गरीबी और जहालत के अँधेरे को दूर करने  के लिए  अनगिनत दिए जलाएँगी. 

             "कभी कभी चलो दिल से अमीर हो जायें 
                    किसी गरीब के घर में दिया जला आयें ."


अरशिया ज़ैदी


22 Oct 2011

Jagjeet singh-khaan tum chale gaye




जगजीत सिंह .........कहां तुम चले गये 

आज भी मुझे याद है वो दिन, जब मुझे दिल्ली के जामिया- मिलिया इस्लामिया में मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की याद में आयोजित,एक प्रोग्राम में शामिल होने  का मौक़ा मिला था. इस  मौके पर कई मशहूर और बाइज्ज़त हस्तिया शामिल हुई थी,इन हस्तियों में एक बेहद खास चेहरा था ...... ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह का,जो  सफ़ेद कुरता -पैजामा पहने एक किनारे खामोश  खड़े हुए थे.
जगजीत सिंह नाम है एक ऐसी शख्सियत  का ..... जिनके बारे में,कितना  भी लिखा जाये वो कम होगा. 8 फरवरी 1941 को जन्मे  जगजीत सिंह को  बचपन  में  नाम  मिला था जगमोहन सिंह. एक दिन  उनके माँ-बाप के गुरु ने  उन्हें शबद गाते हुए सुना तो कहा कि .." इस बच्चे का नाम बदल कर जगजीत सिंह कर दो,इसकी आवाज़ में इतनी मीठास है ..... की  ये सारे जग को जीत लेगा ".इस तरह उन का नाम जगमोहन  सिंह से बदल कर जगजीत सिंह कर दिया गया.
जगजीत सिंह को गज़लो का बादशाह कहा जाता है.उन्होंने गज़लों को   आसान शायरी में तब्दील किया और सेमी क्लास्सिक बना कर लोगो के सामने पेश किया.1970  के दशक में जब गज़ले नूर जहाँ,मेहदी हसन ,मल्लिका पुखराज,बेगम अख्तर,तलत महमूद जैसे दिग्गज गा रहे थे.उस  दौर में,जगजीत सिंह अपनी खूबसूरत आवाज़ और गायकी से  उनके बीच  जगह बनाने में कामयाब रहे. जगजीत सिंह ने गजलो को अपना आधार बनाया. और गिटार जैसे वेस्टर्न साज और Digital Multitrack Recording   का इस्तेमाल करके ग़ज़ल को एक नई पहचान देकर उसे आम लोगो के बीच मशहूर कर दिया .

जगजीत सिंह ने मशहूर गायिका चित्रा को अपनी ज़िन्दगी का हम सफ़र बनाया.और1969 में उनसे शादी कर ली. इन दोनों ने,बतौर हिंदुस्तान की पहली पति -पत्नी की हिट जोड़ी के रूप में,देश और दुनिया में कई बेहेतरीन  पर्फोर्मांस देकर मोसकी और गायकी में अपनी अमिट छाप छोड़ दी है.नए रेकॉर्ड्स बनाने वाली उनकी एल्बम THE UNFORGATABLES में इस जोड़े ने अपनी मखमली आवाज़ में ऐसी लाजवाब गजले गायीं है जिनका जादू आज भी लोगो के सर चढ़ कर बोलता है................... 
दुनिया जिसे कहते है जादू का खिलौना है , मिल जाये तो मिट्टी है,  खो  जाये तो सोना है .........
सरकती जाये है रुख़ से  नकाब आहिस्ता आहिस्ता , निकालता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता  आहिस्ता .......
बहुत  पहले से इन क़दमो की आहट जान लेते है , तुझे ए  जिंदिगी हम दूर से पहचान लेते है...... वगेह्रह   वगेह्रह   ....... उनकी ऐसी यादगार  गज़ले है जो आज भी  हर गजल सुनने  वाले की पहली पसंद हुआ करती  है .
          उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब,क़तील शिफाई,निदा फाजली,फिराक गोरखपुरी, शाहिद कबीर,अमीर मीनानी,कफील अजहर,सुदर्शन फकीर की  शायरी को अपनी खूबसूरत आवाज़ से सजाया. जगजीत सिंह के कई शुरुवाती  कामयाब ग़ज़ल अलबमो के टाईटल जहा इंग्लिश में हुआ करते थे ......जैसे   Hope, In search,Vision , Love is Blind., Ecstasies, A Sound Affair, Passions.etc.वही बाद में,उनका रुझान उर्दू की तरफ ज्यादा हो गया था. जिसके चलते उन्होंने अपनी ग़ज़ल अलबमो को मेराज,कहकशां,चिराग , सजदा,सोज,सहर,मुन्तजिर,और मरासिम जैसे उर्दू उन्वानो(titles) से सवारा.इसके अलावा उन्होंने हिंदी,उर्दू ,पंजाबी, नेपाली,सिन्धी,बंगाली गुजरती में भी अनगिनत गीत गाये .
                कहते है कि हर कामयाबी के पीछे कड़ी मेहनत,लगन और लम्बा संघर्ष छुपा होता है.गज़लों के इस बेताज बादशाह को भी बॉलीवुड में एक अच्छा ब्रेक पाने के लिए काफी जद्दोजहेद करनी पड़ी......फिल्म एक्टर  ओम प्रकाश के बुलावे पर जब वो  फिल्मो में अपनी किस्मत आजमाने सपनो के शहर मुंबई  गए तो उन्हें काफी मायूसी  का सामना करना पड़ा .., बड़े बड़े संगीत कारो ने उनकी आवाज़ सुनी,पर ये कह कर मना कर दिया की ..... "आपकी आवाज़ तो अच्छी है ,पर हीरो  पर सूट नहीं करेगी ."
इसके बाद भी वो हताश नहीं हुए और बड़े- बड़े एक्टरो के घर सजी - महफ़िलो में भी उन्होंने performance दी,इस उम्मीद पर ........की शायद  किसी को उनकी आवाज़ पसंद आ जाये और उन्हें फिल्मो में गाने का एक मौक़ा मिल जाये.आखिर कार उनकी ये कोशिशे रंग लायी और1980 के दशक में प्रेमगीत,साथ साथ, अर्थ जैसी फिल्मो में अपनी मोसकी और खूबसूरत आवाज़ से सबको अपना क़ायल बना दिया .
फिल्म प्रेम गीत(1981)का का मशहूर गीत..." होठो  से छु लो तुम,मेरा  गीत अमर कर दो"फिल्म साथ -साथ  का  ...
"तुमको देखा तो ये,ख़याल  आया,जिंदिगी धूप तुम घना साया."
फिल्म अर्थ की मशहूर गज़ले -"तेरे खुशबू में लिखे ख़त मैं जलाता कैसे" ,                                                
                                               "झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है के नहीं.. "                           "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो 
  क्या गम है जिसको छुपा रहे हो." 
                                                                   "कोई ये कैसे बताये के वो  तन्हा क्यों है.".... 
जैसे गीत और गजले उनकी आवाज़ और मौसकी से सजे हुए है.इसके अलावा नये दौर की कई फिल्मे जैसे गाँधी टू हिटलर ,कसक, वीरज़ारा , जोगेर्स पार्क,तरकीब, दुश्मन,सरफरोश तुम बिन में भी उन्होंने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा.जिसकी गजले और गीत लोग अपने favourite  collection में बड़े शौक़ से  रखते है .
मशहूर शायर गुलज़ार जगजीत सिंह को प्यार से ग़ज़ल जीत सिंह कहा करते  थे. गुलज़ार के टी.वी सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर गज़लो को  जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ में गा कर बेमिसाल बना दिया है. 

अपनी गायकी से सबका दिल जीत लेने वाले जगजीत सिंह की जिंदिगी  में उस वक़्त अँधेरा छा गया, जब जुलाई 1990 के एक रोड एक्सिडेंट में, उनके बीस साल के एकलौते बेटे, विवेक की मौत हो गयी.जिसके बाद सदमे में डूबी चित्रा सिंह ने, जहां हमेशा के लिए गाना छोड़ दिया.वही जगजीत सिंह ने अपने  बेटे की बेवक्त जुदाई के दर्द को अपने अंदर ही जज़्ब कर लिया और संगीत में अपने आप को, पूरी तरह  से डुबो दिया.जगजीत सिंह अक्सर एक पंजाबी  गाना गाते थे......."मिटटी का बावा" जिसे उनकी बीवी चित्रा सिंह ने एक पंजाबी फिल्म में गाया था.ये गाना जिसमे,किसी अपने को..... बहुत कम उम्र में खो देने का दर्द बया किया गया है, जो उनकी ही आप बीती है.जगजीत सिंह ने अपने बेटे विवेक की याद में एक एल्बम  Some One Some Where(1994)निकाला था,जिसमे आखरी बार उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने  उनके  साथ  गाया  था.
अपनी आवाज़ से सबके दिलो पर  राज करने वाले  जगजीत सिंह, एक ऐसे बेहेतरीन इंसान थे,जिन्होंने कई बार दूसरो की मदद, इतनी ख़ामोशी से कि, कि किसी को पता भी नहीं चला.एक शो ओर्गानायेज़र, जिनका काम ठीक-ठाक नहीं चल रहा था .एक महफ़िल में वो जगजीत सिंह से मिले और उनके साथ शो करने की  ख्वाहिश ज़ाहिर की और अपनी परेशानी बताते हुए कहा की "मेरी बेटी की शादी है,और मेरे पास पैसे की कमी  है, .... अगर आपके शो की ज़िम्मेदारी मुझे मिल जाएगी,तो मुझे बतौर प्रोफिट दो तीन लाख रूपए बच जायेगे और मुश्किलें आसान  हो जाएगी." जगजीत सिंह के पूछने पर ....... उन्होंने पैसे की पूरी ज़रुरत बता दी.
अगले दिन जगजीत सिंह ने उनको को बुलाया और कहा ..... " ठीक है .... आप मेरे लिए शो Organize करें, मै आपके शो में गाऊँगा लेकिन आपको शो इसी हफ्ते मे करना होगा."  ये सुन कर वो organizer घबरा गए और कहने लगे ..... "सर इतनी जल्दी शो कैसे organize होगा ......  इसके  लिए तो काफी तैयारी करनी होगी. इस पर जगजीत सिंह ने बेफिक्र होकर, मुस्कुराते हुए कहा ...... " फिक्र मत करो सब हो जायेगा. तुम्हारी बेटी की शादी तय हो गयी  है .... ये मिठाई का डिब्बा घर ले  जाओ और सबका मुह मीठा करो. "ये सुन कर वो साहब,मायूस होकर अपने घर चले गए. घर जाकर जब उन्होंने वो मिठाई का डिब्बा खोला तो हैरान रह गए ... क्योकि उस डिब्बे में उतनी रकम रखी हुई थी, जितनी उन्हें अपनी बेटी की शादी के लिए ज़रुरत थी .
अपने काम को लेकर उनका मानना था की "पहले हमें खुद अपने काम को, अच्छी तरह से समझ कर ,तसल्ली कर लेनी चाहिए,क्योकि  जब हमें अपने काम से तसल्ली  होगी ,तब हम दूसरो से ये उम्मीद कर सकते है की शायद उन्हें  भी  हमारा काम पसद  आये."
वो अपने काम के लिए इतने Devoted थे की, जब उनकी माँ का इंतकाल हुआ तो, उस दिन कोलकाता में उनका बहुत बड़ा शो था. सारे टिकेट एडवांस  में बिक चुके थे. माँ के गुजर जाने की खबर सुन कर उन्होंने फ़ौरन दिल्ली का एयर टिकेट बुक कराया, घर पहुच कर,एक बेटे होने के सारे फर्ज अदा किये, और फिर वापस अपना शो करने कोलकाता चले गए. .....किसी का कोई नुकसान नहीं होने दिया उन्होंने .शो में पहुच कर भी उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा ...... बल्कि,एक घंटा देर से पहुचने के लिए माफ़ी मांगी.  फिर तीन चार अच्छी -अच्छी गज़ले पेश करने  के बाद सबको बताया की उनकी माँ इस दुनिया से चली गयी है.ये था उनका Professionalism और  काम के लिए उन की लगन .
2003 में उन्हें आर्ट और संगीत में दिए गए योगदान के लिए भारत सरकार ने तीसरे सबसे बड़े अवार्ड पदम् भूषण से सम्मानित किया. इसके बाद 10 मई 2007 को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में1857 में लड़ी  गयी पहली आजादी की लडाई की 150 वी साल गिरह पर, जगजीत सिंह ने बहादुर शाह  जफ़र की मशहूर ग़ज़ल ..... लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में ..... गायी.जिसे सुनने के लिए राष्ट्रपति अबुल कलाम आज़ाद ,प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ,लोक सभा स्पीकर सोम नाथ चटर्जी,कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गाँधी के अलावा तमाम बड़े नेता मौजूद थे.
                                                                            जगजीत सिंह आखरी वक़्त तक ,अपनी सुरीली आवाज़ से महफिले सजाते रहे. बीमार होने से पहले उन्होंने लगातार तीन शो किये थे.जो 16 सितम्बर 2011 को मुंबई के Nehru Science Centre में,17 सितम्बर 2011को  दिल्ली के श्री फोर्ट ऑडिटोरियम में और 20 Sep.को देहरादून के The Indian Public School में organised किया गया. वही उन्होंने सर दर्द की शिकायत की थी ,जिसके बाद मुंबई के लीलावती अस्पताल में उनके दिमाग की सर्जरी हुई और उन्हें  I.C.U में Ventilator पर रखा गया था .देश और दुनिया में उनके अनगिनत चाहने वाले उनके सेहत मंद होने की दुआ मांगते हुए ये कहते रहे
 "उठ के महफ़िल से मत चले जाना
                                  तुमसे रोशन ये कोना कोना है."
लेकिन फिर भी, उन्होंने किसी की नहीं सुनी और 70 साल की उम्र में 10 अक्टूबर 2011 को अपने सभी  चाहने वालो को अलविदा कह कर वो इस दुनिया से चले गये  .और उन्हें याद करके हमारे सुनने के लिए छोड़ गये .....  अपना गाया हुआ ,ये गीत ...... 
चिट्ठी न कोई सन्देश ,
              न जाने कौन से देश
कहां  तुम चले गये .
अरशिया  ज़ैदी













2 Oct 2011

Ek Shardhanjali Bapu Ko

                                           एक श्रद्दांजली  बापू को  
       
Always aim at complete harmony of thoughts word & deed.Always aim at purifying your thoughts and every thing will be well. Mahatma Ghandi

यह महान विचार है बापू के,जिनकी 142 वी सालगिरह मनाते हुए हम सब उन्हें याद कर रहे है.अहिंसा और सत्याग्रह के जिन हथियारों को लेकर बापू ने ,आज़ादी की एक लम्बी लड़ाई लड़ी और हमारे देश को  अंग्रेजो की गुलामी से आज़ाद कराया, उनकी उसी फिलोसफी  और गाँधीगीरी का गहरा असर, हमें आज भी देखने को मिलता है.
      
इसके लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है ,अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को ही ले लीजिये ,जिन्होंने बापू के रास्ते पर चल कर ही अपने आन्दोलन को कामयाब बनाया. हज़ारो  की भीड़ जमा होने के बावजूद  वहां न तो कोई अफरा-तफरी मची और न ही कोई  हंगामा हुआ .लोग  शांति और  सब्र से मैदान में डटे रहे . क्या बड़े क्या बच्चे ,सभी   गाँधी टोपी  पहने  हुए पूरी तरह गाँधी वाद के रंग में रगे हुए नज़र आ रहे थे .गाँधी जी के  उसूलो  का गहरा असर वहां जमा लोगो के बर्ताव में  साफ़ नज़र आ रहा था .
       
आज जब हमारा देश महगाई भ्रष्टाचार,आतंकवाद,गरीबी जैसी तमाम मुश्किलों से जूझ रहा है.सामाजिक उथल- पुथल मची हुई है.बेगुनाह और मासूम लोगो का खून बहाया जा रहा है. बापू के सपनो का वो भारत जो गाँव और क़स्बो में  बसता  था ,उन बसे बसाये गाँव को बेदर्दी से उजाड़ा जा रहा है. आम आदमी के साथ खुले आम नाइंसाफी की जा रही है और देखने -सुनने वाला कोई नहीं.इन्साफ बेबस होकर दम तोड़ रहा है.
            
गाँधी जी का गुजरात अब नरेंद्र मोदी जैसे लोगो की गिरफ्त में है.जिन्होंने नफरत के बीज बोकर, तैयार की गयी फसल को काटने की नाकाम कोशिश की है.इनकी तानाशाही का ताज़ा तरीन शिकार I.P.S ऑफिसर संजीव भट्ट बने है.जिन्हें किसी झूठे  मामले में फ़सा कर जेल में डाल दिया गया है.उनका  कुसूर सिर्फ इतना हैकि उन्होंने नरेन्द्र मोदी पर गुजरात दंगो में शामिल होने का इलज़ाम लगाया था.
       
देश में ऐसे हालात पैदा हो गए है जहा बापू के उसूलो और उनके अपनाये रास्ते पर चलने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है.
  
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गाँधी के सिद्दांत और गाँधीवादी विचार धारा कितनी अहमियत रखती है इसकी जीती-जागती मिसाल है .93 साल के गाँधीवादी नेल्सन मंडेला जो साउथ अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति है. जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है.वो दुनिया के सबसे ज्यादा बाइज्ज़त,और मशहूर ह्स्तीओ में से एक है .नेल्सन मंडेला  ने गाधी जी के दिखाए रास्ते पर चल कर अपनी मंजिल को पाया है.और सारी दुनिया को दिखा दिया है कि गांधीवाद  ही वो रास्ता है,जिस पर चल कर हर मुश्किल से मुश्किल मसले का हल शांति  से निकाला जा सकता है. आज दुनिया में उनके जैसा कोई नहीं. उन्होंने बद से बदतर हालात में भी हिम्मत नहीं हारी और टेढ़े मेंढ़े रास्तो पर बिना डगमगाए चलते हुए अपनी मंजिल को पाया है.

दुनिया  को अहिंसा  का पाठ  पढ़ाने  वाले  बापू,  30 जनवरी 1948 को   शहीद कर  दिए  गए। उनकी शहादत पर यक़ीन  न करते हुए, किसी शायर  ने  यूं  अपना दर्द  बयां  किया   था  -

"ख़ुदारा  न बोलो यह  मनहूस बोली 
भला कौन  मारेगा  बापू को गोली 
ज़मी ऐसी  बातों  से थर्रा गयी है।
जगाओ न बापू को नींद आ गयी है।"

महात्मा  गांधी  की शख्सियत  क्या थी  इसे किसी को बताया या समझाया नहीं जा सकता .....सिर्फ महसूस किया जा सकता है .साबरमती के  इस  संत  को  हमारा  सलाम.
अरशिया  ज़ैदी








 










22 Sept 2011

Aatankwaad aur Hum

 आतंकवाद और हम 

हाल में ही दिल्ली में हुए धमाको ने पूरी दिल्ली को हिला कर रख दिया .कई बेगुनहा लोगो की जाने चली गयी,और बाक़ी कई लोग कई दिन तक घायल अवस्था में,जिंदिगी और मौत  के बीच संघर्ष  करते रहे .एक बार फिर आतंकवाद ने मानवता को शर्मिंदा कर दिया.

आतंकवादियों  ने पहले जयपुर , बंगलौर,अहमदाबाद ,और अब भारत की राजधानी दिल्ली  को अपने आतंकवाद का निशाना बनाया है तथा लोगो के दिलो में दहशत बैठाने का असफल प्रयास किया है. आतंकवाद  समाज  के नाम पर ,धर्म के नाम पर, देश के नाम पर और राजनीती के नाम पर आम आदमी को बाटने की एक सोची -समझी साजिश है .आतंकवाद के माध्यम से कुछ असामाजिक तत्व देश के प्रति गद्दारी करते हुए,अपने व्यक्तिगत स्वार्थो को पूरा कर रहे है,नहीं तो ऐसा कौन सा धर्म है जो मजहब और जिहाद के नाम पर बेगुनहा और मासूम लोगो की जान लेना सिखाता हो .

जहा तक  इस्लाम धर्म का सम्बन्ध है ,वो तो आपसी सदभाव,अहिंसा और प्रेम का सन्देश देता है|ये धर्म तो पेड़-पौधो से लेकर जानवरों और इंसानों  को चोट पहुचाने को भी पाप समझता है....तो फिर ये इंसानियत के दुश्मन इस्लाम के नाम पर लोगो का खून कैसे बहा सकते है और हजारो लोगो की रोज़ी-रोटी कैसे छीन सकते है?


आज का भारतीय मुसलमान अपने उन सभी भाई बहनों लिए बेहद दुखी है ,जो इस आतंकवाद के शिकार हुए है ,इसका जबरदस्त विरोध ,वो कभी लखनऊ की मशहूर  हजरत अब्बास की दरगाह पर,मुह पर सफेद पट्टी बांध कर करते  हैं तो कभी लाखो मुसलमान, मुंबई में शुक्रवार की नमाज़ के बाद ,विशेष तौर पर दहशत गर्दी के लिए बददुआ करने के लिए अपने हाथ उठाते हैं .

आज हर मुसलमान जो भारतीय है ,वो इस आतंकवाद की ज़ोरदार शब्दों में निंदा करता है और इस पाप के लिए दोषियों को कठोर से कठोर सज़ा दिलाने की हिमायत करता है . दूसरी ओर जब- जब इन दहशत गर्दो  ने मानवता का रक्त बहाया है ,तब तब हजारो नेक और अच्छे लोगो ने आगे आकर हादसे के शिकार लोगो के लिए , हर सम्भव सहायता देने का प्रयास किया है फिर चाहे वो किसी धर्म ,किसी जाति या समाज के किसी वर्ग से सम्बंध रखता हो . हर भारतीय ने अपने इन भाई बहनों  के लिए सहयता करके  देश और समाज के प्रति  अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा किया है .

इसी सम्बंध में दो कूड़ा बीनने वाले बच्चो ने दो जिंदा बमो के खबर वक़्त रहते पुलिस को दी. जिनके कारण पुलिस उन बमों को निष्क्रिय कर सकी  और कई और बड़े हादसे होने से बच गए . 

आतंकवाद हमारी लड़ाई है जिस के लिए हम सभी को मिल कर आगे आना होगा और पहल करनी होगी केवल पुलिस और नेताओ पर हम सारी ज़िम्मेदारी नहीं डाल सकते . हमें भी जागरूक होना पड़ेगा ,तभी हम अपने देश को आतंक वाद से बचा पायेगे . साथ ही इस बात का भी विशेष ध्यान रखना होगा कि दोषी व्यक्ति  को सख्त से सख्त सज़ा मिले ,पर किसी निर्दोष के साथ कोई  अन्याए ना हो. हमारा देश सभी के रहने के लिए एक सुरक्षित स्थान हो .और अब न तो कोई आतंकवाद की  घटना घट सके और न ही कोई आतंकवाद के भेट न चढ़ सके .

अरशिया  ज़ैदी 
Published in  hindi monthly Magazine BYAAN(nov.2008)

7 Sept 2011

Article-Kuch Khushfehmiyaa Shadi Ke Baare Me

                               कुछ खुशफहमिया शादी के बारे में 
               

Greh Shobha ,June- 11,2009
शादी से पहले हर लड़की यही सपने सजोये होती है की जब वह दूल्हन  बन कर साजन के घर  जाएगी तो ,हर कदम पर उसका हमसफ़र उसके साथ होगा . हर तरफ खुशिया ही खुशिया होंगी,दुल्हे मिया अपनी दुल्हन को पलकों पर बिठा कर रखेंगे और उसे कोई दुःख न होने देंगे.
क्या आपने भी कुछ ऐसे ही सपने सजाये है, अपनी शादी के बारे में? अगर ह़ा ,तो हमारी कामना है कि                         
आपके सारे सपने सच हो.                                         


दर असल, लड़किया अपनी शादी को लेकर, कुछ ज़यादा ही  खुश फहमिया पाल लेती  है ,जो अगर शादी के बाद सच नहीं निकलती, तो शादी का लड्डू मीठे के बजाये कडवा लगने लगता है . लेकिन अगर शादी के पहले हम कुछ हक़ीक़तो को अच्छी तरह से समझ  ले तो शादी का पवित्र रिश्ता हमेशा महकता रहेगा.

खुश फ़हमी में न रहे -

शादी, एक बेहद खास और ख़ुशी का अवसर  होता  है, जिस जीवन साथी का इंतज़ार अब तक, हम करते आये हैवो हमें मिल जाता है, नया घर बसता है, नए रिश्ते बनते है, प्यार का खुशनुमा अहसास, हमें हर लम्हा मदहोश किये रहता है.इस तरह हम शादी को अपनी खुशियों का आधार समझने लगते है, और उम्मीद करने लगते है कि अब जीवन  में जो कुछ भी होगा ,वो हमारी खुश्यो को बढाने के लिए ही होगा.पर ये सच नहीं है .....इस बात की कोई गारेंटी नहीं होती की शादी के बाद पति पत्नी एक दुसरे के साथ खुश ही रहेंगे.सच्चाई तो ये है कि आपसी रिश्तो में मनमुटाव ,तनाव या मुद्दों को लेकर गंभीर मतभेद हो सकते है,इसलिए अगर कभी कोई ऐसी स्थिति  आ जाये,तो अच्छा यही होगा कि आप कोई भी बात अपने दिल पर न ल़े. 


अगर आप ये सोच रही है कि,आप के पति आप के प्यार में इतने डूबे रहेंगे कि आप के बिना बोले ही ,आप के दिल की बात को समझ जायेगे ...तो आप ग़लत है. ऐसा नहीं होने वाला है, इस ग़लतफ़हमी को अपने दिल से निकाल दीजिये वर्ना इंतज़ार ही करती रह जाएगी.

शादी के बाद लड़ाई -झगडा न हो,ऐसा तो हो ही नहीं सकता . किचन के बर्तन और कांच की क्रोकरी बचा कर रखियेगा ,गुस्से में कही इस सामान की शामत न आ जाये.

याद रखिये,कि प्रेमिका के पत्नी बन जाने पर, काफी चीजे बदल जाती हैशादी से पहले ,आप के प्रेमी को आप में गुढ़ ही गुढ़ नज़र आते थे,और वो आपकी तारीफ करते नहीं थकते थे पर शादी के बाद, हालात बदल जायेंगे -अब वो आपकी तारीफ करने में कंजूसी करने लगेंगे, और क्यों न करे .....अब उनका काम जो निकल चुका है. अब आप 24 - घंटे उन के पास ही तो रहेंगी उन के घर में. आप को यह नहीं  भूलना चाहिए की "घर की मुर्ग़ी- दाल बराबर'' होती है.


एक मत होना ज़रूरी नहीं-


ऐसा माना जाता है, कि पति- पत्नी है तो सारे काम एक साथ ही करेंगे मगर ये ज़रूरी तो नहीं है कि विभिन्न  मुद्दों पर, दोनों के विचार एक से ही हों .दोनों की सोच और विचार अलग अलग भी तो हों सकते है. दोनों अलग -अलग शख्सियत के मालिक होते है, अलग-अलग माहौल में परवरिश पाते है|  उनके ,संस्कार अलग अलग होने की वजह से  मानसिक स्तर  भी एक दुसरे से जुदा होता है, हों सकता है कि, जो बात एक को सही लग रही हों वही दुसरे को ग़लत लगती हों ,तो फिर ये कैसे मुमकिन है कि पति-पत्नी हर मुद्दे पर एक दुसरे के साथ सहमत हों और वो सारे काम साथ -साथ ही करे.
शादी के बाद आप अपने पति को बदल लेंगी ,ऐसा मत सोचियेगा ,बदलाव सिर्फ तभी हो सकता है जब कोई चाहे और उसके लिए कोशिश करे ,वर्ना किसी की मानसिकता या फितरत कभी नहीं बदलती .


पैसा सब कुछ नहीं-

ये  भी एक भ्रम ही  है कि, पैसा सारी समस्याओ का हल निकाल सकता है वैवाहिक  जीवन की खुशीया, धन से नहीं खरीदी जा सकती. पैसा जिंदिगी में बहुत कुछ है पर सब कुछ नहीं है. आपसी ताल मेल ,प्रेम एक दुसरे के लिए आदर और विश्वास , वैवाहिक जीवन की बड़ी से बड़ी मुश्किल को  भी आसान  बना सकता है.


शादी अकेलापन दूर नहीं करती -

ये भी एक धारणा है कि शादी के बाद अकेला पन दूर होता है, जबकि सच्चाई तो ये है कि,शादी के बाद कई बार अकेलापन बढ जाता है. एक अजीब से खालीपन का अहसास होने लगता है. अगर विवाह बेमेल है तो, शादी एक ग़लती लगने लगती है.

शादी के बाद अपना, ऐसा मनपसंद काम करते रहना चाहिए ,जो सकारात्मक और उद्देश पूर्ण हो,जिससे आपको ख़ुशी और संतुष्टि तो मिले ही ,साथ ही आपके वजूद  का अहसास  आपको .....और आपके आस-पास वालो को होता रहे.
एक गलत फ़हमी लोगो ने यह भी पाल रक्खी है कि शादी करना सबके  लिए ज़रूरी है. जिस की शादी नहीं हुई उस का जीवन व्यर्थ है. जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है,शादी के बिना भी जीवन सार्थक है ......और बहुत खूबसूरत भी.
अर्शिया ज़ैदी
Published in Grehshobha June-2, 2009
(Delhi press publication)


     



21 Aug 2011

Touch


                                    स्पर्श एक अहसास 



अक्सर देखा गया है कि जब हमारे अपने हमें प्यार से गले लगाते है तो हमारी आख़े नम हो जाती  हैं.हम जज्बाती हो उठते हैं,गला रुंध सा जाता है और लफ्ज़ जैसे गले में ही अटक कर रह जाते है.क्या आपने कभी इस बात पर ग़ौर किया है कि ऐसा क्यों होता है?
ये कुछ और नहीं, बल्कि स्पर्श का  खुशनुमा अहसास है,जो शारीरिक  सीमओं को लाघ कर हमारे जज्बातों को छूता हुआ, हमारी रूह में उतर जाता है. ये उन खूबसूरत लम्हों का अहसास है,...जिन पर  वक़्त की धूल कभी नहीं जमती.सालो बीत जाने के बाद भी कल की बात लगती है.


Father & Daughter
हमारी रोज़ मर्रा की जिंदगी में ऐसी कई चीज़े और घट्नाय होती रहती  है जो हमारे दिल को  छू  जाती  हैं..... जैसे माँ बाप का ममता भरा स्पर्श , अपनों के साथ बिताये गए हसीन यादगार लम्हे, रूह में उतर जाने वाला कोई संगीत किसी की कही हुई कोई अच्छी बात,किसी गीत या ग़ज़ल के खूबसूरत बोल ,कुदरत का कोई हसींन नज़ारा,अपने बच्चे का पहला कोमल स्पर्श,किसी की सुरीली आवाज़ या जिंदगी के सफ़र में मिलने वाले कुछ ऐसे अनजाने लोग ,जो आपके अपने से बन गए हो...... वगेहरह वागेहरह.
किसी से मुलाक़ात करते वक़्त जब हाथो का स्पर्श होता है, तो ये स्पर्श कई बार ये महसूस करा देता है कि सामने वाला,इस मुलाक़ात को लेकर कितना उत्साहित और  पोजिटिव है.स्पर्श के बारे में अब तक कई रिसर्च की जा चुकी है,जो ये कहती है कि पहली बार गर्म जोशी से हाथ मिलाने और गले लगा कर मुलाक़ात करने से,एक दुसरे positive vibes मिलती  है और Oxytocin नाम का एक हर्मोन निकलता है,जो एक-दूसरे के लिए प्यार और परवाह को ज़ाहिर करता है .

हम अपने बड़ो का आदर - सम्मान करने के लिए उनके पैर छूते है, और जिसके  बदले में पाते है ढेर सारा आर्शीवाद और दुआए. चरण -स्पर्श का ये खूबसूरत  रिवाज बड़ो और छोटो, दोनों के दिलो को छूता है और प्यार के रिश्तो  को मजबूत करता है.
अपने माथे पर अपनी माँ के होठो का स्पर्श, भला कोई कैसे  भूल सकता है . कैसे भूलाया  जा सकता है, माँ के उन हाथो  का स्पर्श, जिन्होंने हमें पाल - पोस कर बड़ा कर दिया, और वो सुकून और सिक्यूरिटी का अहसास ,जो बच्चो को अपने पिता के सीने से लग कर मिलता है जिसको लफ्ज़ो में बयान कर पाना मुमकिन नहीं .

'स्पर्श' लफ्ज़ो से कही ज्यादा असरदार तरीके से, हमारे जज्बातों  को ज़ाहिर कर सकता है. किसी के साथ कोई दर्द- नाक हादसा हो जाने पर कई बार उसे दिलासा दे पाना  बड़ा मुश्किल  हो जाता है. शब्द  कम पड़ने लगते है, ऐसे  में आपका स्नेह भरा स्पर्श,आपकी हमदर्दी भरे ज़ज्बातो को आसानी से उन तक पंहुचा सकता  है.

बेज़बान जानवर भी प्यार के ज़ज्बात को बड़ी शिद्दत से महसूस करते है एक साहिबा का पालतू तोता तब तक अपने पिंज़रे में चीखता रहता जब तक उसकी मालकिन उसे पिन्जरे से निकाल कर प्यार से सहला कर चूमती नहीं थी,और मिठू मियां भी अपनी मालकिन के प्यार का जवाब उन्हें पप्पी कर के देते थे.है- न ये ,ये स्पर्श का कमाल !
मशहूर हिंदी फिल्म 'मुन्ना भाई ऍम बी बी एस' में संजय दत्त की टच थेरेपी यानी' जादू  की झप्पी' तो अभी तक सबको याद है , वो स्पर्श का ही जादू तो था जिसने फिल्म में मरीजों को अच्छा किया और सबको,जादू की झप्पी दे कर लोगो के साथ अच्छा बर्ताव करने का सन्देश दिया | इस 'टच थेरपी से लोगो की बीमारियों  का  इलाज भी किया जाने लगा है,जिसमे शरीर की उर्जा को इकठ्ठा करके संतुलित और सेहतमंद बनाया जाता है और मरीजों की तकलीफों को दूर किया जाता है.
जब रिश्तो में प्यार और अपना पन होता है,तो एक-दुसरे से उम्मीदे भी हो जाती है और जब ये उम्मीदे पूरी नहीं होती तो दिल को ठेस लगती है ,रिश्तो में नाराज़गी और कड़वाहट आ जाती है ऐसे में स्पर्श, आपसी नाराज़गी को मिटाने में काफी मददगार साबित हो सकता है . बशेर्ते गिले-शिकवे दूर करने की  ईमानदार कोशिश की जाये .ऐतबार को बार-बार चकनाचूर करने ,गलतियाँ  दोहराते रहने के बाद अगर प्यार और हमदर्दी का झूठा  दिखावा किया जायेगा .....और फिर सुलह करने की कोशिश की जाएगी तो सिर्फ नाकामी  ही हाथ लगेगी.
स्पर्श हमारे सच्चे  ज़ज्बातो को ज़ाहिर करता है| अगर ज़ज्बात सच्चे नहीं होंगे ,तो लाख गले लगा कर, प्यार भरा स्पर्श महसूस करवाने की, कोशिश की जाये.... वो स्पर्श, दिल को कभी छु नहीं सकेगा और न ही आपसी रिश्ते खुशनुमा हो सकेंगे.
हम बड़े होने के बाद  स्पर्श करने और करवाने से बचने लगते है और यहाँ तक की, किसी अपने के, स्नेह भरे  स्पर्श से भी नर्वस हो जाते है....शायद वो इसलिए क्योकि बड़े होने के बाद स्पर्श को सिर्फ 'सेक्स' से जोड़ कर देखा जाने लगता है.
पश्चिमी देशो के मुकाबले हमारे मुल्क में स्पर्श करने और करवाने, दोनों को ही बुरा समझा जाता है,क्योकि इसमें हमें  सिर्फ गन्दगी और बुराई ही नज़र आती है ...जबकि ये गन्दगी और बुराई तो हमारी सोच में होती है जिसकी वजह से ,हमें अच्छी बात में भी बुराई नज़र आती है और हम आलोचना करने के बहाने तलाश कर लेते  हैं .इस तरह का बर्ताव, हमारी सोच के तंग दायरे को ज़ाहिर करता है जिसके चलते हम,कुदरत के इस खुशनुमा अहसास को दरकिनार कर देते है.

हम में से ऐसे कितने लोग होंगे जिन्होंने अपने माँ-बाप को बेफिक्री से एक दुसरे के हाथ में हाथ डाले पास-पास बैठे देखा होगा.'सम्मानजनक रूप' से पति-पत्नी के, एक-दुसरे के लिए ज़ाहिर की गयी मोहब्बत और परवाह न सिर्फ,उनके बीच के रिश्तों को गहरा बनाती है, बल्कि बच्चो को भी ये महसूस कराती है कि उनके परेंट्स का रिश्ता,पाक और अटूट है जिसे  मोहब्बत और यकीन के, ऐसे मजबूत धागों में पिरोया गया है,जो कभी नहीं  टूटेगा.ऐसा करके हम बच्चो को ज्यादा सुरक्षित  होने का अहसास कर पाएंगे .
 इस प्यार भरे स्पर्श' की सबसे ज्यादा ज़रुरत बड़े बुजुर्गो और हमारे माँ-बाप को होती है जिनके वो कंधे शायद अब  इतने मजबूत नहीं रहे जिन पर हम सवारी किया करते थे .....पीठ दर्द करने लगी है, शरीर थक  गया है..... निगाह कमजोर हो गयी है,धुन्दला  दिखाई देने लगा है.....फिर भी ये सूनी आखे कुछ तलाश कर रही है.....यकीनन हमारा- आपका  यानी .... अपने बच्चो का प्यार भरा स्पर्श.
जिन माँ-बाप और बड़े--बुजुर्गो ने,अपनी ज़िन्दगी के बेहतरीन साल और कीमती वक़्त, हमारी एक मुस्कराहट पर बस यूं ही नेओछावर कर दिया..हमारी अच्छी  परवरिश की,हमें अच्छे संस्कार देकर लायक और कामयाब इंसान बनाया जिनकी उंगली पकड़ कर हमने चलना सीखा ,जिन्होंने रातो  में जाग कर हमारी देख भाल की, हमारी आँखों  से बहते आँसू पोछे,और वक़्त की परवाह किये बगैर,घंटो बड़े चाव से रोज़ हमारे दोस्तों और स्कूल के क़िस्से सुने .
Grand father & Grand daughter
 लेकिन अफ़सोस.....आज,उनके साथ,बिताने के लिए,हमारे पास चंद मिनट का भी वक़्त नहीं है हमने उन्हें अकेलेपन और depression के अंधेरो में ढ़केल दिया है और खुद अपनी ज़िन्दगी में मस्त है .हमें, शायद  खुद को इस दर्दनाक सच्चाई से ,रूबरू करने की ज़रुरत  है,कि आज हम जिन माँ-बाप और बड़े-बुजुर्गो की अहमीयत और मोजूद्गी को 'फॉर ग्रांटेड' ले रहे है,कल, वो शायद हमारे साथ न हो,और हमसे इतनी दूर..... चले जाये कि हम उन्हें देखने,स्पर्श करने को, तरस जाये और  हमारे लाख आवाज़ देने के बाद भी वापस न आ पाए.
मत फिसलने दीजिये इस बेशकीमती वक़्त को अपने हाथ से, हम खुशकिस्मत है कि हम पर बड़े-बुज़र्गो का साया है ,अपनों का साथ है ....अपने दिल में दबे प्यार को बाहर आने दीजिये और अपनों के साथ बढ़ते इस  -communication gap को खत्म कर दीजिये.


Touch Therapy
थाम लीजिये अपने -बुजुर्गो  के खूबसूरत झुर्रियो भरे हाथो  को, और प्यार से उनके गले  लग कर -उन्हें महसूस करा दीजिये कि आपको उनकी परवाह है.....और उनका साथ.....आपके लिए  अनमोल है.
अरशिया  ज़ैदी