14 Jan 2012

YOG AUR SEHAT


                                              योग और सेहत
आज हम जिस तरह का लाइफ स्टाइल जी रहे है उसमें,ना तो हमारे पास तसल्ली से खाना खाने का वक़्त है और न ही पूरी नींद सोने का, दुनियावी  चमक-दमक और पैसा कमाने का जूनून हम पर इस क़दर हावी हो चला है कि हम अपनी सेहत को भी नज़र अंदाज़ कर बैठे हैं.
आज हम जिस हवा में सांस ले रहे है वो polluted हो चुकी है,जो खाना हम खाते है उसमेpesticidesमिले हुए है यहाँ तक की पीने का पानी भी साफ़ नहीं मिल पाता.ऊपर से स्ट्रेस भरी भाग दौड़ की जिंदिगी ने  लोगो का जीना  मुहाल कर रखा है.तरह-तरह की नई नई बीमारियाँ हमें घेरती जा रही है.महगे इलाज,अस्पताल का खर्च और डॉक्टर की फीस ने आम आदमी की जेब ख़ाली कर दी है.
आज हर किसी को अच्छी सेहत और दिल के सुकून की तलाश है जिसे पाने के लिए योगासन और प्राणायाम से बेहतर तरीक़ा और कोई नहीं है.इस प्रक्टिस को लगातार करते रहने से,जो बीमार है वो अच्छे हो जाते है और जो सेहतमंद है उनके पास सेहत का अनमोल खज़ाना बना रहता है.  
      प्राणायाम साँसों को सही ढंग से लेने की वो टेक्नीक है जिससे बॉडी के हर cell को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है,वो activeऔर healthy  बने रहते  है.यहाँ तक की कई बार dead cells भी एक्टिव होकर सही ढंग के काम करना शुरू कर देते है.साँसों को सही ढंग से लेने और छोड़ने का ये तरीक़ा शरीर के टोक्सिन्स(toxins)को बाहर फेक कर सभी organs को  healthy रखता है.
प्राणायाम में 6 तरह की exercises करवाई जाती है ये है -
1-भस्त्रिका प्राणायाम 2-कपाल भाति प्राणायाम 3-बह्य प्राणायाम 
4-अनुलोम प्राणायाम 5-ब्रह्मरी  प्राणायाम 6-उद्गीत प्राणायाम .
 योगभ्यास और प्राणायाम  करके लोग,0%खर्च,0%साइड एफ्फेक्ट और100 %फायदा उठा रहे है यहाँ तक की,कई बार जब डॉक्टर उम्मीद छोड़ बैठे है और मरीज़ से कह दिया है"की आपकी बीमारी का कोई इलाज नहीं है,आपको  ठीक रहने के लिए जिंदिगी बार दवाएं खानी होंगी"तब योग ने अपना कमाल दिखाया है.अनुलोम-विलोम,कपाल-भाति कर के मरीजों ने नयी जिंदिगी पायी है,और दवाओं को अलविदा कहा है .
     योग करने के लिए किसी ख़ास उम्र की दरकार नहीं है.ये किसी उम्र में भी  शुरू किया जा सकता है.यहाँ तक की छोटे मासूम बच्चे,जिन्हें बोलना भले ही नहीं आता हो पर वो अनुलोम-विलोम और कपाल-भाति का मतलब अच्छी तरह समझते है और कहने पर,एक्टिंग कर के भी दिखा देते है. 
     दूसरी तरफ ऐसे लोगो की तादाद भी कम नहीं है जिन्हें योग से होने वाले सारे फायदों के बारे में पूरी जानकारी तो है पर काहिली की चलते योगाभ्यास करने में टाल मटोल करते रहते है.बीमार पड़ जाने पर,पहले तो दवाईयां खा-खा कर सेहतयाब होने की हर मुमकिन कोशिश करते है लेकिन ख़ुदा न ख़स्ता,सारे इलाज कराने के बाद भी अगर बीमारी ठीक नहीं होती तो ये dialogueबोल कर खुद को तस्सली देने की कोशिश करते है ...."कि क्या करे किस्मत में यही लिखा था" ... या "ऊपर वाले की यही मर्ज़ी थी" .
इस तरह की सोच रखने वाले लोगो को दर्द से करहाते हुए,डॉक्टर के यहाँ चक्कर लगाना और पैसे को पानी की तरह बहाना तो मंज़ूर होता है पर बेहतर सेहत के लिए योग और प्राणायाम करना गवारा नहीं होता.
   योग की बात चले  और बाबा राम देव का ज़िक्र ना आये,ऐसा तो हो ही नहीं सकता.यूं तो योग की खोज महाऋषि पतंजलि ने पांच हज़ार पहले की थी पर आस्था टीवी के ज़रिये इसे घर-घर पहुचने की पहल बाबा रामदेव ने की थी.उन्होंने योग और प्राणायाम को आम लोगो की लिए खास बना दिया है,उनकी कही हुए बातें लोग,बड़े ध्यान से सुनते और समझते थे उनकी मजाक भरी चुटकियाँ लोगो को हसने पर मजबूर कर देती थी.उनकी बात में कितना दम था इसका अंदाज़ा तो इसी बात से लगाया जा सकता है, की जब उन्होंने पेप्सी और कोकाकोला जैसे बड़े ब्रांड के कोल्ड ड्रिंक कोToilet Cleaner का नाम देते हुए,लोगो को,इसे न पीने की हिदायत दी तो लोगो ने इन कोल्ड ड्रिंक्स को पीना तक छोड़ दिया था जिसकी वजह से न सिर्फ इन विदेशी कंपनीयो को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था बल्कि इसका बाज़ार भी उन दिनों  काफी डाउन हो गया था.
    बाबा रामदेव जनता की सेहत को सुधारने में पूरी तरह कामयाब रहे लेकिन जब उन्होंने समाज की सेहत को बेहतर बनाने के लिए हिन्दुस्तान की राजनीती में कदम ज़माने की कोशिश की तो वहाँ बात बिगड़ गयी और वो एक के बाद एक नई controversyमें फसते चले गए इससे उनकी इमेज को ज़बरदस्त धक्का लगा.
   योग करने के फायदे तब ही महसूस हो पाते है जब कोई खुद लगातार प्रक्टिस करता रहता है.अगर आप अपनी जिंदिगी में कुछ करना चाहते  है,कुछ पाना चाहते है तो इसके लिए आपको फिट रहना ज़रूरी है,अच्छी सेहत के बिना आप कुछ हासिल नहीं कर सकते.यूं तो कोई भी,किसी भी उम्र में बीमार हो सकता है,लेकिन अगर अपने आप पर,थोड़ी सी मेहनत करके जिंदिगी को सेहत मंद और चुस्त दुरुस्त और ख़ुशगवार  बनाया जा सकता है तो इसमें हर्ज ही क्या है!  

 अरशिया  ज़ैदी





7 Jan 2012

UMEED (HOPE)


                                        
26 जून 2011की बात है.दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में National Eligibility Test(NET) के exam में मेरी ड्यूटी लगी हुई थी.मैं कंट्रोल रूम में authorities से Instructions मिलने का इन्तिज़ार कर रही थी, इतने में एक 26-27 साल का नौजवान कमरे में दाखिल हुआ,गोरा रंग, दरमयाना क़द,चेहरे पर हलकी सी दाढ़ी,और self confidence से दमकता चेहरा..... ब्लू कलर की शर्ट और स्काई ब्लू कलर की जींस पहने इस लड़के ने कंधे पर एक rucksack बैग डाल रखा था .
      कमरे में आकर उसने कहा "मेरा नाम मोहम्मद आतिफ है प्लीज़ मुझे मेरा रूम नंबर बता दीजिये.( फिर थोडा रुक कर)am a person with special needs.मैं ठीक से पढ़ नहीं सकता, मेरी आँखों की रौशनी सिर्फ 40% है .क्या आप मुझे एक writer भी available करा देंगे?"ये कहते हुए उसने अपने हाथ में पकड़ी लम्बी सी अलमुनियम की छड़ी को कस कर दबाया.
Authorities ने मेरा नाम पुकारा और मो.आतिफ का टेस्ट पेपर और आंसर शीट पकडाते हुए इस student के साथ रूम नंबर-5 में जाने को कहा.
रूम नंबर-5 दूसरी मंजिल पर था,जिस पर सीढ़ीयो से जाना था.आतिफ ने बिना मेरी मदद लिए, आहिस्ता-आहिस्ता खुद सीढ़ीया चढ़ी.पेपर शुरू होने में सिर्फ15 मिनट बाक़ी थे.उसने फुर्ती से अपना बैग खोला और एक एक्सटेनशन कॉर्ड ,टेबल लेम्प, बहुत मोटे लेंस का चश्मा,ब्लाइंड स्टिक और Magnifying lens निकाल कर मेज़ पर रख दिया ... फिर मुझसे पूछा.......
              ''क्या यहाँ कही Extension cord लगाने की लिए socket है? मुझे टेबल लेम्प का प्लग लगाना है कमरे में रौशनी कम है ... मुझे ठीक से दिखेगा नहीं." 
मैंने इधर उधर देखा,स्विच बोर्ड मुझे कही नज़र नहीं आया,किसी fault की वजह से AC भी नहीं चल रहा था.इसलिए गर्मी की वजह से हाल और भी ज़्यादा बेहाल हो गया था.शिकायत करने पर बिजली वाला आया लेकिन वोAC की fault नहीं ढूढ सका हाँ उसने इतनी मेहरबानी ज़रूर की कि उसने हम लोगो को,उसी हाल नुमा कमरे के दूसरे हिस्से में बैठा दिया जहांACचल रहा था.
    यहाँ आते ही गर्मी से थोड़ी राहत मिली. मैंने जल्दी जल्दी उसका सामान दूसरी टेबल पर रखवा कर टेबल लेम्प का प्लग सामने लगे सोकेट में लगा दिया.आतिफ ने मुस्कुरा कर थैंक्स कहा और मुझसे अपनी Answer sheet  में उसका नाम,रोल नंबर वगेहरा भरने की request की.आतिफ का admit card देख कर मैंने उसकी सारी details कॉपी में भर दी.इन सारी formalities को पूरा करने में15मिनट और लग गए.पेपर शुरू हो चुका था और आतिफ ने पेपर लिखना अभी शुरू भी नहीं किया था.
        पहला पेपर objective question-answer का था.आतिफ ने कहा 
"मैम आप पहले मेरे लिए question पढ़ें  और फिर नीचे लिखे उसके answer,मैं जो answer बताऊ  ... आप उसे  आंसर शीट में टिक कर दीजिये.''
मैं उसके लिए invigilator/writer दोनों की तरह काम कर रही थी.वो मुझे आंसर  बता रहा था और मैं टिक करती जा रही थी.कई बार तो वो मेरे आंसर  के options पढने से पहले ही झट से जवाब  बता देता,फिर चाहें वो सब्जेक्ट General-knowledge का हो,Reasoning का हो या फिर हो English,हर Subject की उसने ज़बरदस्त तैयारी कर रखी थी.वो भी आँखों के साथ दिए बिना! उसने15 min.देर से पेपर शुरू करने के बाद भी तय वक़्त में पेपर पूरा कर लिया था.जो वाकई क़बीले तारीफ़ था
         पहले पेपर के बाद एक घंटे का ब्रेक था.मैंने आतिफ से पूछा कि
 "क्या आप 2nd पेपर शुरू होने तक यहीं रूम में बैठ कर इन्तिज़ार करेंगे"?
 "नहीं मैं इस ब्रेक में सबसे पहले मस्जिद जाऊँगा,नमाज़ पढूंगा तब कुछ खाऊँगा"उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया. 
  M.Com में गोल्ड मेडलिस्ट रह चुका ये लड़का अब P.hd कर रहा था न  वो मायूस था और न ही हताश .... बस थी तो कुछ बन जाने की लगन और जूनून.उसका ये Never Give Up वाला positive attitude कही न कही मुझे भी inspire कर रहा था.
    2nd paper descriptive था जिसमे लम्बे answers लिखने थे.उस वक़्त आतिफ को देख कर मैं यही सोच रही थी की अब ये कैसे लिखेगा लम्बे answers! . ..मुझे ही लिखने होंगे....तेज़ी से.अभी मैं अपने सवालो में ही उलझी थी कि मैंने उसको एक magnifying lens लगा कर पेपर पढने की कोशिश करते हुए देखा. 
"इस से मेरी नज़र का धुंधलापन कुछ कम हो जायेगा और आसानी से पेपर लिख लूँगा" मेरे अनकहे सवाल का जवाब देते हुए उसने कहा.फिर  बेहद मोटे लेन्स का चश्मा अपनी आखों पर चढ़ा कर मुझसे सवाल पढने को कहा.
मैंने आतिफ को question पढ़ कर सुनाया जिसे उसने दोहराते हुए समझने की कोशिश की फिर दोबारा मुझसे सवाल पढ़ने को कहा,इस तरह मैंने उसके हर सवाल को रुक-रुक कर कई-कई बार पढ़ा.सवाल को अच्छी तरह समझने के बाद उसने कॉपी खोलते हुए मुझसे पूछा...
."मैंम कॉपी के पेज पर लाइन कहा से शुरू हो रही है".
.मैंने उसकी उंगली पेज की लाइन पर रख दी....उसने पूरे पेज को हाथ से छु कर अंदाज़ा लगाया. 
फिर अगला सवाल किया-"एक answer लिखने के लिए कितने पेज की जगह दी गयी है"?और मेरे बताते ही बिना देर किये उसने तेज़ी से लिखना शुरू कर दिया.
 आम तौर पर लोगो की hand writing जल्दी जल्दी लिखने में अक्सर टेडी मेढ़ी और गन्दी हो जाती है. मुझे इस बात की curiosity थी की कि आतिफ कैसे लिखेगा? ...और ये देख कर मैं हैरान रह गयी की वो बड़े आराम से लिख पा रहा था.उसकी handwriting शुरू से लेकर आख़िर तक एक सी थी,एक दम साफ़-सुथरी, ना तो कोई लव्ज़ लाइन के बाहर निकला था और न ही कोई लाइन टेढ़ी -मेढ़ी हुई थी.
    आतिफ लिखते-लिखते बीच-बीच में टाइम भी पूछता जा रहा था ताकी पेपर छूटे नहीं  ...वो सर झुकाए तेज़ी से लिखता जा रहा था.और बीच-बीच में बातें करके अपना दर्द भी बांटता जा रहा था.
     "मैम मेरी नज़र बचपन में कमज़ोर नहीं थी पर धीरे धीरे कमज़ोर होने लगी और चश्मा लग गया फिर कुछ वक़्त के बाद चश्मे से भी दिखना बंद हो गया,अब मैं magnifying lens से पढ़ता हूँ.मेरी इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है ... इस बीमारी में नज़र धीरे धीरे कमज़ोर हो जाती है और कुछ वक़्त के बाद पूरी तरह से दिखना  बंद हो जाता है"
ये कह कर उसने एक आह भरी और चुप हो गया ..... कुछ लम्हों तक माहौल में ख़ामोशी की बर्फ सी जमी रही......
  फिर कुछ देर बाद उसने ख़ामोशी तोड़ते हुए आगे बताया   .... 
    "पता है मैम,मेरे 'सर' जिनके अंडर मैं Ph.d कर रहा हूँ उन्हें भी same problem है मेरी तरह .... अब उन्हें दिखाई देना बिलकुल बंद हो गया है मेरे साथ भी ऐसा ही होगा.पर सोचता हूँ कि तब-तक मैं settle हो जाऊ.Net का इम्तेहान तो मैं पहले भी पास कर चुका हूँ अब दुबारा Junior Research fellowship(JRF) के लिए ये exam दे रहा हूँ ... ताकि मुझे scholarship  मिल सके और मैं आगे की पढाई कर सकू. .."
 मैं दुःख और बेबसी से उसकी दर्द भरी दास्तान सुनती जा रही थी. मेरे पास लव्ज़ नहीं थे जिनसे मैं उसको तसल्ली देती ....और अगर तसल्ली देती भी तो क्या कहती ?
     ये पेपर भी उसने तय वक़्त में पूरा कर लिया.कॉपी मुझे दे कर उसने  धीरे धीरे एक-एक करके अपना सामान बैग में रखा और हम नीचे आ गए.जब मैं उसकी कॉपी जमा कराने कंट्रोल-रूम जाने लगी तो उसने कहा....
"मैम आपने मेरी अच्छी help की.पूरे question paper को अच्छी तरह से explain किया ... प्लीज़ आप मेरे लिए दुआ करिएगा कि मैं इस एक्साम  को पास कर लूं."
मैंने मुस्कुरा कर"आमीन" कहा ... और कंट्रोल रूम की तरफ बढ़ गयी.

अरशिया  ज़ैदी

1 Jan 2012

Shayari



                          मशाल

बदलते साल में पिछले बरस के देखे हुए 
अधूरे खुआब हक़ीक़त में ढल भी सकते है.
 अगर लगन हो,य़की और प्यार का जज़्बा 
तुम्हारे सामने पत्थर पिघल भी सकते है.
                
 मशाल इल्मो जुनूं की जला के हम सब लोग 
 कुरीतियों की फनो को कुचल भी सकते है. 
  गरीब बस्ती में फैले हुए अंधेरो को 
 चमकते इल्म के सूरज निगल भी सकते है. 

हमारे प्यार की झप्पी से ही फ़क़त ऐ दोस्त 
सिसकते भूख से बच्चे बहल भी सकते है.  
अगर हम मिलके कुछ कुर्बानियों का अहद कर ले 
तो इस समाज की किस्मत बदल भी सकते है.

वो तपती रेत,अगर कर्बला की जहन में हो 
दहकती आग पे इंसान चल भी सकते है.
छिपा है दर्द हर एक क़ेह्क्हे के दामन में 
हर एक आँख से आंसू निकाल भी सकता है.
             
नाकामयाबी को जोड़ो न अपनी क़िस्मत से 
 सितारे चाल को अपनी बदल भी सकते है. 
 तू अपने हाथो की मेहनत पे ऐतबार तो कर 
 के तेरे हाथ की रेखा बदल भी सकते है. 
  
अरशिया  ज़ैदी

22 Dec 2011

Ek House Wife ki Ahmiyat

                  एक हाउस वाइफ की अहमीयत 


आज वसुंधरा जब इंग्लिश स्पीकिंग का क्लास करने आई तो कुछ उदास सी लग रही थी,मैंने वजह पूछी तो अपना दर्द बया करते हुए कहने लगी कि "क्या बताऊ,एक House Wife होने की सज़ा भुगत रही हूँ.सुबह से लेकर रात तक घर के लोगो के लिए तमाम जिम्मेदारियों को निभाने में लगी रहती हूँ .....अपनी थकान की परवाह किये बगैर सब की छोटी से छोटी ज़रुरत का ख्याल रखती हूँ लेकिन इसके बावजूद भी मेरी मेह्नत और कोशिशो को पूरी तरह से नकार दिया जाता है,जबकि मेरी देवरानी,जो एक Working Woman' तो है लेकिन घर और घर के लोगो के लिए बिल्कुल  लापरवाह है फिर भी घर के सभी लोग उसे अपने सर पर बैठा कर रखते है और उसका खास ख्याल रखते हैं. 
              बात तो सही है वसुंधरा की,पता नहीं क्यों, हमारी सोच इतनी baised हो गयी है.जहा हम Working Women को ज़रुरत से ज्यादा अहमियत देने लगे है, वही हम घर की Life Line कही जाने वाली  house wives की अहमियत को सिरे से नकार रहे है .....जैसे घर में रहने वाली औरते कुछ करती ही नहीं ऐश करने के अलावा !
           बेशक,आज के दौर में औरतों का financially independent होना और अपनी शक्सियत को पहचान देना बेहद ज़रूरी है लेकिन जनाब,घर-गृहस्थी की देख भाल करना भी कोई बच्चो का खेल नहीं है,बहुत हुनर मंदी का काम है ये ..... जिसे बिल्कुल भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.घर परिवार को ताख़ में रखकर सिर्फ करियर और पैसा कमाने को ही अपनी ज़िन्दगी का मकसद समझ लेना एक सेहत मंद सोच की निशानी नहीं कही जा सकती है .
                    ज़रा उन लोगो से पूछिए,जिन्हें रोज़ घर लौटने पर दरवाज़े  पर लगा ताला मुह चिढ़ाता हुआ मिलता है और घर के अंदर दाखिल होते ही तन्हाई और अकेलापन उनका स्वागत करता है .....एक गिलास पानी देने वाला भी कोई नहीं होता,खुद ही पानी लेकर,सूखा गला तर करना पड़ता है.खुशनसीब है आप.... अगर आपके घर लौटने पर कोई आपका इन्तिज़ार करता हुआ मिलता है.   
            एक 'घरेलू औरत',या 'होम मेकर' किसी भी घर के लिए एक वरदान होती है,जो घर के लोगो को सुख और आराम देने के लिए दिन-रात घर के कामो में लगी रहती है.और अपनी नेक कोशिशो से ईंट-पत्थर के मकान को ख़ूबसूरत घर में बदल देती है.जिन बेशकीमती जज्बातों और feelings के रहते वो यह सब करती है,उसकी कोई भी कीमत नही लगायी जा सकती है.
             जो जायका घर के बने खाने में होता है वो जायका आपको दुनिया के किसी होटल के खाने में नहीं मिल सकता,और रोज़ रोज़ जंक फ़ूड खा-खा के तो गुज़ारा भी नहीं किया जा सकता.अच्छे-अच्छे लज़ीज़ खाने पकाना भी एक आर्ट है,जिसमे अच्छा खासा वक़्त लग जाता है और एक House Wife बड़े जतन और प्यार से घर के सभी लोगो की पसंद-नापसंद का ख़याल रखते हुए लज़ीज़ खाना तैयार करती है.जिसे हम चट्खारे ले ले कर खाते हैं. 
 छोटे बच्चे जो कच्ची मिटटी की तरह होते है,जैसे ढालो ढल जाते है.माँ बच्चे की सबसे पहली और सबसे बेहतरीन टीचर होती है जो न सिर्फ बच्चो की सबसे अच्छी देखभाल और परवरिश कर सकती है बल्कि उसे अच्छे संस्कार भी सिखाती है.अगर माँ ही घर पर नहीं रहेगी तो बच्चो की अच्छी परवरिश कैसे होगी,उन्हें अच्छा-बुरा,सही-गलत का फर्क कौन समझाएगा?  वो भी आज के दौर में जब joint family ख़त्म हो चुकी हैं और nuclear family का ज़माना है.
     ऐसा पैसा किस काम का,जब आपकी नन्ही सी बेटी को आपकी सबसे ज्यादा ज़रुरत हो,उस वक़्त आप उसे रोता बिलखता छोड़ कर काम पर चली जायें,अपने बच्चो को बड़ा होता हुआ न देख सके ......उनकी  किल्कारिया ना सुन सके और आपके होते हुए भी आपके मासूम बच्चो की परवरिश creche या नौकरों के हाथो में हो.
             घर में माँ की नामौजूदगी कई बार बच्चो को चिडचिड़ा,जिद्दी और बत्तमीज़ बना देती है.छोटे बच्चो को creche और नौकरों के भरोसे छोड़ना  कई बार कितना खतरनाक हो जाता है,उनके साथ कैसे कैसे संगीन हादसे हो जाते है इसकी ख़बरे तो आये दिन अखबारों की सुर्खियाँ बनती ही रहती है.
            इसके अलावा आज कल स्कूल जाने वाले बच्चो को भी तरह तरह के assignment करने को दिए जाते है जिसमें बच्चो को guidance और help की ज़रुरत होती है.ऐसे में अगर माँ ही घर पर नहीं होगी .... हेल्प के लिए,तो बच्चो की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ सकता है.
            एक House Wife के घर पर रहने से घर के दरवाजे हर वक़्त मेहमानों के लिए खुले रहते है.मेहमानों को घर में आने के लिए वक़्त की पावंदी नहीं झेलनी पड़ती,और चाय की चुस्कियो के साथ एक-दुसरे से मिलना-जुलना और गपशप के मज़े लेना भी आसान हो जाता है.उनके घर में रहने से नौकरों पर भी निगरानी बनी रहती है और वो अपने काम को करने में लापरवाही नहीं कर पाते,नहीं तो घर के सामान को बेदर्दी से इस्तेमाल करने और तोड़ने फोड़ने में इन्हें ज़रा भी हिचक नहीं होती.  
         घर में रहने वाली एक घरेलू औरत की अहमियत का अहसास उस वक़्त सबसे ज्यादा होता है जब,ख़ुदा न खास्ता घर में कोई बीमार पड़ जाता है,मरीज़ को देखभाल और तीमारदारी की ज़रुरत होती है.ऐसे में वो न सिर्फ प्यार से मरीज़ की तीमारदारी करती है बल्कि बिस्तर पर बीमार पड़े होने की बोरियत और अकेलेपन से भी बचाती है.जो एक महगी नर्स कभी नहीं कर सकती.
                        चाहे कोई कुछ भी कह ले,और कितनी भी दलीले क्यों न दे दी जाये लेकिन सच तो यह है कि,House Wives की अहमियत को Working Women के मुक़ाबले किसी भी लिहाज़ से न तो कम आकां जा सकता है और न ही उसकी शख्सियत को हलके में लिया जा सकता है.

अरशिया  ज़ैदी

16 Dec 2011

Dream(khuaab)

                                         ख़ुआब
                 बनाऊ मुकाम और पहचान अपनी 
                 ये एक ख़ुआब बचपन से मैंने है देखा, 
                 हो ख़ुद फैसला करने का, हौसला भी 
                 बनू एक अच्छा, सहारा मैं ख़ुद का .

                 तमन्ना है मुझको खुले आसमा की 
                 जहां मेरी परवाज़,हो इतनी ऊची, 
                 मैं खुद्द्दार हू मेरी दौलत यही है 
                 न मुझपे उठे नज़रे बेचारगी की.

                  अरशिया  ज़ैदी 

3 Dec 2011

Park

                                         पार्क 



 जिंदिगी के सफ़र में कुछ खुशनुमा यादें ऐसी होती है जो हमेशा हमारे साथ रहती है.मेरी,ऐसी ही एक याद उस पार्क से जुड़ी  हुई है,जहां मैं रोज़evening walk के लिए जाया करती थी,वहां बाक़ी लोगो के अलावा,आस पास की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चे भी municipality के नल से पीने का पानी भरने आया करते थे.इन बच्चो में,किसी के तन पर पूरे कपड़े नहीं थे तो किसी के नन्हे पैर बिना चप्पल के थे ... लेकिन फिर भी,उनके माथे पर शिकन का  नामो- निशान  नहीं था.

पार्क में आते ही,ये बच्चे सबसे पहले अपने साथ लाये छोटे- बड़े डिब्बो को एक किनारे रख देते और दौड़ कर झूले पर चढ़ जाते....झूला झूलते,फिर पकड़न-पकडाई खेलते हुए एक दुसरे के पीछे भागते रहते. शाम ढलने से पहले,अपने साथ लाए डिब्बो में नल से,पीने का पानी भर के अपने घर ले जाते.जो डिब्बे पानी के वज़न से भारी हो जाते,और जिन्हें उनके छोटे- छोटे हाथ नहीं उठा पाते तो वो उन्हें घसीट कर अपने घर ले जाने की कोशिश करते थे .    



एक दिन पार्क में टहलते हुए मेरी नज़र इन बच्चो पर पड़ी ... मैंने देखा कि एक रिक्शा ठेला, जिस पर,इन बच्चो ने कई पानी से भरे छोटे-बड़े डिब्बे रख लिए है .... और वो ठेला ढलान भरे गेट से नीचे नहीं उतर पा रहा है.इन्ही बच्चो में से एक 8-10 साल का लड़का,उस रिक्शा ठेला को पार्क के ढलान भरे रास्ते से उतारने की कोशिश कर रहा है और पीछे से नन्हे नन्हे 5-6 बच्चे उस रिक्शे को धक्का लगा  रहे है ... मैं जल्दी से गयी और 'रिक्शा ठेला' को उस ढलान भरे रास्ते से उतरवा दिया ..... बच्चे मुस्कुरा दिए और   "थैंक यू आंटी" कह कर चले गए .
अब इन बच्चो को जब भी मदद की जरूरत होती .... वो मुझे आवाज़ लगा देते ....कभी कहते कि"आंटी... मेरा डिब्बा... ठेले पर रखवा दो" .......
तो कभी कहते कि आंटी ....."ठेला ढलान से नहीं उतर पा रहा है ..... आ कर धक्का लगवा दो न".
 इस तरह अब हमारी अच्छी-ख़ासी जान-पहचान हो गयी थी.
उस पार्क के सामने 'सबका बाज़ार' नाम का एक किराना स्टोर था जहां से मैं अक्सर घर की ज़रुरत का सामान खरीदा करती थी.इसलिए  कभी-कभी अपने साथ एक छोटा सा पर्स भी ले जाती थी.एक दिन उन्ही बच्चो में से, एक नन्ही से लड़की ने मेरे हाथ में पर्स देखा तो कहने लगी .....
 'आंटी पैसे दो न' ....'आंटी पैसे दो न' ... 
और ये कह कर मेरे पीछे पीछे चलने लगी ...... मैंने भी चलते चलते उसे जवाब दिया.
"नहीं अच्छे बच्चे पैसा नहीं मागते,हाँ .....अगर तुम्हे कुछ चाहिए तो बताओ .... मैं  तुम्हे खरीद दूंगी".
अभी हमारी बात-चीत चल ही रही थी कि उस लड़की के बाक़ी साथी भी आ गए .... और बड़े ग़ौर से हमारी बात सुनने लगे  ...... क्यूंकि मुझे उन की फरमाइश पूरी करनी थी इसलिए मैंने वहां खड़े सभी बच्चो से मुख़ातिब होकर उनसे अपनी फरमाइश बताने को कहा ....
अब इन बच्चो ने शर्माना शुरू कर दिया...  मेरे काफी पूछने पर इनमें से कुछ बच्चो ने तो"मैदा की बनी मठरियां" खाने की फरमाइश की लेकिन  कुछ बच्चे अभी भी खामोश खड़े थे ..... शायद कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन झिझक की वजह से कह नहीं पा रहे थे.मैंने भी हार नहीं मानी और कोशिश करती रही.आखिर मेरी कोशिश रंग लायी और मुझसे जवाब में कहा गया कि -
"हमें नारंगी  रंग का पानी पीना है"यानि वो कोल्ड ड्रिंक पीना चाहते थे.
"चलो तुम्हारी फरमाइश पूरी करते है ."
अभी मैंने ये कहा ही था कि, सभी बच्चे खुश होते हुए पार्क के बाहर लगी खोके नुमा दूकान पर जा पहुचे.बच्चो ने जैसे ही वहां सजे शीशे के जार में मठरियां देखी .... तो चिल्ला पड़े.....और उस तरफ इशारा करते हुए बोले "वो रहीं मठरियां...... हमें तो वो खानी है".
मैंने दूकानदार से इन बच्चो को मठरियां देने को कहा .... दुकानदार ने पहले तो हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा कर सब बच्चो को मठरियां पकड़ा दी.मठरियां देते वक़्त उस दुकानंदार के चेहरे पर भी तसल्ली झलक आयी थी.
अब 'उन' बच्चो को अपनी फरमाइश पूरी होने का इन्तिज़ार था जिन्होंने "नारंगी रंग का पानी"(कोल्ड ड्रिंक)पीने की खुआइश ज़ाहिर की थी.लिहाज़ा अब,हम सब,सामने के किराना स्टोर में घुस गयी.चमचमाते स्टोर में जा कर पहले तो ये बच्चे ज़रा.... झिझके.फिर वहा सजी खाने पीने की चीजों को ताकने लगे.अचानक उनमे से एक बच्चे की नज़र फ्रिज में रखी कोल्ड ड्रिंक पर पड़ी .. जिसे देखते ही वो ख़ुशी से चिल्ला पड़ा ...
." अरे..... वो रही नारगी रंग की बोतल ...  मैं तो यही पियूँगा".
मैंने फ्रिज से उनकी पसंदीदा "नारंगी रंग की बोतलें "निकाल कर उनके हाथो में थमा दी 
बिल का पेमेंट करके, हम सब दूकान के बाहर आ गए.बाहर आते ही उन सब ने बिना देर किये कोल्ड ड्रिंक की बोतले खोल कर "नारंगी रंग का पानी"  पीना शुरू कर दिया.

उस लम्हा मैंने उन मासूम बच्चो के चहेरों पर  जो ख़ुशी देखी .   उसे देख कर मेरा दिल  सुकून के खुशनुमा अहसास से भर गया.ये खुशनुमा अहसास एक हसीन याद बन कर हमेशा मेरे साथ रहेगा .


 अरशिया ज़ैदी 

24 Nov 2011

Koun Banega Karodpati-Season-5



नया इतिहास बना गया ....कौन  बना करोड़पति  सीजन -5


   . ब्रिटिश टेलीवीज़न के पोपुलर रिअलिटी शो WhoWants To Be A Millionaire की तर्ज़ पर बना "कौन बनेगा करोडपति सीज़न-5"ख़त्म हुए हफ्ता बीत चुका है लेकिन आज भी लोगो की ज़हेन में इसकी यादें ताज़ा है. जहाँ सबको अपने इस पसंदीदा रिअलिटी शो के ख़त्म होने का मलाल है . वही सब, बेसब्री से अगले सीज़न में केबीसी-6 शुरू होने का इन्तिज़ार कर रहे है.  
 
और इन्तिज़ार करे भी क्यों न,आख़िर "केबीसी-5"सैकड़ो लोगो के दिलो पर अपनी ऐसी गहरी छाप छोड़ी है जिसे मिटा पाना आसान नहीं होगा. हिंदुस्तान के आम आदमी को आसमान का सितारा बना कर इस गेम शो ने कामयाबी का नया इतिहास बना दिया है.शो की रूह कहे जाने वाले बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने आखरी एपीसोड में जिस वक़्त गुड बाय कह कर विदाई ली, उस वक़्त लोगो की आखें नम हो गयी थी.


KBC सीज़न-5 में ग्लैमर की चमक दमक के बजाये,हिंदुस्तान के एक आम आदमी की तमन्नाओं को उड़ान भरते देखा गया.इस शो ने ऐसे लोगो के लिए रास्ते बनाये जिसके पास इल्म की दौलत थी,जिंदिगी में कुछ कर गुज़रने का जूनून था लेकिन  अगर कुछ नहीं था तो..... वो था मौक़ा ..... .और ये मौक़ा मुहैया कराया केबीसी ने,जिसने इनके करोड़पति बनने का ख़ुआब हक़ीक़त  में बदल दिया .
इस बार जिस Tag Line  को प्रोमोट करते हुए KBC-5  ने अपना सफ़र शुरू किया ..वो थी ...."कोई इंसान छोटा नहीं होता"और जिन लोगो ने जीत का इतिहास बनाया ... उनकी...... जिंदिगी से, कोई लम्बी- चौड़ी फरमाइशे नहीं थी.बस किसी को सर छुपाने की लिए अपना घर खरीदना था तो कोई अपने घरवालो और बच्चो का "कल" महफूज़ करना चाहता था. 
Sushil Kumar House in Bihar 
केबीसी-5 में,5 करोड़ जीतने का इतिहास रचने वाले 27 साल के सुशील कुमार को आज पूरा हिंदुस्तान जानता है  ..... ये वही सुशील कुमार है जिनके बाबूजी के पास,बीते मानसून में टपकती छत को ठीक कराने के पैसे नहीं थे,आज हर कोई सुशील कुमार के उस घर को देखना चाहता है ... जहा ये माटी का लाल पला बढ़ा,जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में दूसरी बार जूता तब पहना जब वो KBC में हिस्सा लेने आये थे . 


हमारा बदलता भारत,जहा लोगो में बेशुमार क़ाबलियत है लेकिन उनके पास मौक़े नहीं थे  ......ज़रिये नहीं थे,जो उन्हें कामयाबी दिला सके.चार  महीने तक चले केबीसी-5 में, भारत के कोने कोने में छुपी क़ाबलियत और असली टैलेंट देखने को मिला .मध्य प्रदेश का इमली खेडा,उड़ीसा का  लास्ताला,उतराखंड का कुञ्ज बहादुरपुर,उत्तर प्रदेश का उबारपुर जैसे दूरदराज़ इलाके और क़स्बे,जिन्हें बहुत ही कम लोग जानते थे अब ये जगाहें अखबारों की सुर्खियाँ बन कर चमक रहे है .


इस बार इस रिअलिटी शो के प्रोडूसर ने ग्लैमर और स्टारडम के ज़रिये अपने प्रोडक्ट को बेचने के बजाये आम आदमी पर फोकस रखा,जिसके लिए KBC की टीम ने हिंदुस्तान के दूरदराज़ इलाको की खूब ख़ाक छानी.और असली टैलेंट को ढूँढ निकाला.

ऐसे लोग,जिन्हें ज़िन्दगी में कोई रास्ता नज़र नहीं आता था,उनके लिए केबीसी-5 ने ना सिर्फ रास्ता बनाया,बल्कि एक ऐसी मंजिल पर ला कर खड़ा कर दिया जहां से कई और रास्ते कामयाबी की नयी ऊचाइयों को छूने के लिए खुल गए .
Rukhsana  kouser 
Aparna Maaliker 
 आतंक वादियों से लोहा लेने वाली बहादुर रुखसाना कौसर हो या अपर्णा मालेकर जैसी क़र्ज़ में डूबी .एक विधवा ..... या पेड़ से गिर कर हमेशा के लिए अपनी टाँगे खो देने वाले युसूफ मल्लू .केबीसी ने  इन सबको एक बेहतर ज़िन्दिगी गुजरने के लिए पैसे दिए. इसके अलावा दो दर्जन से ज्यादा लोगो को केबीसी ने लखपति बना कर ख़ुशी ख़ुशी घर रवाना किया  .


केबीसी-5 में 'आम आदमी' पर फोकस करने का 'आईडिया 'बेहद कामयाब रहा.जिसने सबको प्रोफिट पहुचाते हुए,सबकी जेबें नोटों से भर दी, फिर चाहे वो इस प्रोग्राम को बनाने वाले प्रोडूसर हो,या इस प्रोग्राम का हिस्सा बनने आये मेहमान हो,सब इसके प्लेटफ़ॉर्म से खुश होकर अपने घर गए. 
Sushil Kumar & Amitabh  Bachchan 


टी.वी इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस बार केबीसी-5 में10 सेकंड का एक 'एड स्लोट' तक़रीबन साढ़े तीन लाख रूपए में बिका. इस हिसाब से अगर हम देखे तो KBC-5 की हर दिन की आमदनी 2 करोड़ रूपए बनती है.जबकि आमतौर पर रिअलिटी शो पर इतने ही वक़्त का एक 'एड स्लोट' डेढ़ लाख से ढाई लाख रूपए में बिकता है.सुना गया है कि जिस दिन बिहार के सुशील कुमार ने पांच करोड़ रूपए जीते उस दिन TRP 7.2 से लेकर 8 तक पंहुचा गयी थी जो अपने आप में किसी गेम शो का रिकॉर्ड है. इस बेहद मशहूर और कामयाब रिअलिटी शो के ख़त्म होने के बाद बाकी रिअलिटी शो यकीनन चैन की सांस ले रहे होंगे.

Yusuf  Mallu 
केबीसी में जान डालने वाले 'स्टार ऑफ़  द मिलेनियम'  अमिताभ बच्चन के बिना तो इस शो का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता उन्होंने,जिस शानदार तरीक़े से केबीसी-5 को होस्ट किया और शो में हिस्सा लेने आये  हर मेहमान से,जिस हमदर्दी,अपनेपन और इज्ज़त से पेश आये उसकी जितनी भी तारीफ की जाये वो कम होगी.एक एपीसोड़ में जब हॉट सीट पर बैठे युसूफ मल्लू का अपाहिज होने का दर्द उनकी आखों से छलक पड़ा था, तो इस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी हॉट सीट से उठ कर जिस हमदर्दी और अपनेपन से उनके आसूं पोछे थे उसे देख कर हर किसी का दिल भर आया था.


खबर है कि अमिताभ बच्चन ने केबीसी -6 के लिए कांट्रेक्ट साइन कर लिया है जिसे देखने के लिए हम सब को अगले सीज़न तक इन्तिज़ार करना पड़ेगा. उम्मीद है कि केबीसी के नए सीज़न में पुराने रिकॉर्ड टूटेंगे ...  कामयाबी के कुछ नए इतिहास रचे जायेंगे और कई और ज़रूरतमंद  लोगो की ज़िन्दगी बेहतर और खूबसूरत बनेगी .


अरशिया  ज़ैदी













3 Nov 2011

Roshni ka Diya

                                        रौशनी का दीया 

बीते हफ्ते में रौशनी फैलाने वाले त्यौहार दीवाली को हम सब ने बड़ी धूम धाम से मनाया.भगवान श्री राम के14 बरस बाद अयोध्या लौटने की ख़ुशी में जहां हर तरफ रौशनी की जगमगाहट देखने को मिली वही कुछ ऐसे बदलाव भी नज़र आये जिन्होंने ये महसूस करने को मजबूर कर दिया की शायद अब दीवाली सिर्फ अमीर लोगो का त्यौहार बन के रह गया है.

दीवाली की असली मिठास जो शक्कर के खिलौनों खीले,बताशे और मिठाई  में हुआ करती थी.रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलना मिलाना अपने आप में एक तोहफा  हुआ करता था ...वो सब,अब पैसे की चकाचौंद और दिखावे में कही गुम सा हो होने लगा है. ज़रुरत से ज़्यादा  बाज़ार के - commercialization ने इस ख़ूबसूरत त्यौहार  के मायने ही बदल डाले हैं 

दीवाली में लोगो का रूझान जिस चीज पर सबसे ज्यादा दिखाई पड़ा ,वो थी महगी खरीददारी और तोहफे देने का चलन. यूं तो कोई भी तोहफा अनमोल होता है और अपने प्यार और जज़्बात को बयाँ करने के लिए तोहफे लिए और दिए जाते है.जिसे हर कोई सर- आँखों पर रखता है .बात अगर यहाँ तक रहे तो समझ में आती है लेकिन अब इस महगाई के ज़माने में दीवाली पर गिफ्ट देना एक थोपा हुआ रिवाज भी बनता जा रहा है, जो मिडिल क्लास की जेब पर जहां गैरज़रूरी बोझ डालता है वहीँ बेचारे ग़रीब आदमी को अहसास ए कामतरी का शिकार बना देता  है.

अब दीवाली के मौके पर,लोगो ने गिफ्ट के नाम पर रिश्वत देने को एक ख़ूबसूरत बहाना बना लिया है अपने बॉस या client को खुश करना हो या अपने कारोबार में फायदा लेने की मंशा हो.दीवाली के मौके पर दिया गया हर तोहफा जायज़ मान लिया जाता है.जितना बड़ा अपना फायदा उतना बड़ा और महगा तोहफा.  अब हर तरफ तोहफे देने की होड़ सी नज़र आने लगी है.

  इस चकाचौंध में कही कोई गुम हो रहा है तो वो है गरीब आदमी. हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है.अमीर और ज़्यादा अमीर होते जा रहे है,ग़रीब और ज्यादा गरीब जिनकी जेबें गर्म हैं, जिनके पास खर्च करने के लिए खूब सारे पैसे है वो तो महगे तोहफे और महगी खरीददारी कर के अपनी दीवाली को अच्छी तरह मना लेते है .लेकिन अँधेरा दूर करने वाले इस त्यौहार में, उस ग़रीब तबके का क्या, जिसके पास मामूली ख़रीददारी करने के लिए भी पैसे नहीं होते.जिसे अँधेरे घर में जलाने के लिए थोड़े से दिए मिल जाये तो उसके लिए काफी होता है .मिठाई के नाम पर खीले,बताशे और शक्कर के खिलौने ही नसीब हो जाये तो उसका त्यौहार ख़ुशी ख़ुशी मन जाता है.

 क्या हम अपने फूज़ूल खर्च को रोक कर कुछ दीये उनके घरो में नहीं जला सकते जिनके घर अँधेरा है ? कुछ मिठाई,कुछ  कपड़े उनके लिए नहीं खरीद सकते जिनको ये मयस्सर नहीं ? अगर हम सब थोड़ी थोड़ी कोशिश करें तो ये न मुमकिन भी नहीं ....... सबकी तरफ से की गयी छोटी छोटी कोशिशें किसी  घर में अँधेरा नहीं रहने देंगी.
 ऐसी ही काबिले तारीफ पहल की है ....हिंदुस्तान के तीसरे सबसे अमीर भारतीय और विप्रो के chairman अज़ीम प्रेम जी ने .जो देश भर के गरीब बच्चो तक इल्म की रौशनी पहुचने के लिए अपने पैसे से,ऐसे स्कूल खोलने जा रहे है,जहां ग़रीब बच्चो को प्री स्कूल से लेकर 12 क्लास तक की education बिल्कुल मुफ्त दी जाएगी और जिस चीज़ पर सबसे  ज्यादा ध्यान दिया जायेगा वो  होगी ......  quality education.
 धने अँधेरे में इल्म की रौशनी का दिया जलाने वाले अज़ीम प्रेम जी की इस पहल के बाद इंशाल्लाह और हस्तियाँ भी इस मुहिम में शामिल होंगी और गरीबी और जहालत के अँधेरे को दूर करने  के लिए  अनगिनत दिए जलाएँगी. 

             "कभी कभी चलो दिल से अमीर हो जायें 
                    किसी गरीब के घर में दिया जला आयें ."


अरशिया ज़ैदी


22 Oct 2011

Jagjeet singh-khaan tum chale gaye




जगजीत सिंह .........कहां तुम चले गये 

आज भी मुझे याद है वो दिन, जब मुझे दिल्ली के जामिया- मिलिया इस्लामिया में मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की याद में आयोजित,एक प्रोग्राम में शामिल होने  का मौक़ा मिला था. इस  मौके पर कई मशहूर और बाइज्ज़त हस्तिया शामिल हुई थी,इन हस्तियों में एक बेहद खास चेहरा था ...... ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह का,जो  सफ़ेद कुरता -पैजामा पहने एक किनारे खामोश  खड़े हुए थे.
जगजीत सिंह नाम है एक ऐसी शख्सियत  का ..... जिनके बारे में,कितना  भी लिखा जाये वो कम होगा. 8 फरवरी 1941 को जन्मे  जगजीत सिंह को  बचपन  में  नाम  मिला था जगमोहन सिंह. एक दिन  उनके माँ-बाप के गुरु ने  उन्हें शबद गाते हुए सुना तो कहा कि .." इस बच्चे का नाम बदल कर जगजीत सिंह कर दो,इसकी आवाज़ में इतनी मीठास है ..... की  ये सारे जग को जीत लेगा ".इस तरह उन का नाम जगमोहन  सिंह से बदल कर जगजीत सिंह कर दिया गया.
जगजीत सिंह को गज़लो का बादशाह कहा जाता है.उन्होंने गज़लों को   आसान शायरी में तब्दील किया और सेमी क्लास्सिक बना कर लोगो के सामने पेश किया.1970  के दशक में जब गज़ले नूर जहाँ,मेहदी हसन ,मल्लिका पुखराज,बेगम अख्तर,तलत महमूद जैसे दिग्गज गा रहे थे.उस  दौर में,जगजीत सिंह अपनी खूबसूरत आवाज़ और गायकी से  उनके बीच  जगह बनाने में कामयाब रहे. जगजीत सिंह ने गजलो को अपना आधार बनाया. और गिटार जैसे वेस्टर्न साज और Digital Multitrack Recording   का इस्तेमाल करके ग़ज़ल को एक नई पहचान देकर उसे आम लोगो के बीच मशहूर कर दिया .

जगजीत सिंह ने मशहूर गायिका चित्रा को अपनी ज़िन्दगी का हम सफ़र बनाया.और1969 में उनसे शादी कर ली. इन दोनों ने,बतौर हिंदुस्तान की पहली पति -पत्नी की हिट जोड़ी के रूप में,देश और दुनिया में कई बेहेतरीन  पर्फोर्मांस देकर मोसकी और गायकी में अपनी अमिट छाप छोड़ दी है.नए रेकॉर्ड्स बनाने वाली उनकी एल्बम THE UNFORGATABLES में इस जोड़े ने अपनी मखमली आवाज़ में ऐसी लाजवाब गजले गायीं है जिनका जादू आज भी लोगो के सर चढ़ कर बोलता है................... 
दुनिया जिसे कहते है जादू का खिलौना है , मिल जाये तो मिट्टी है,  खो  जाये तो सोना है .........
सरकती जाये है रुख़ से  नकाब आहिस्ता आहिस्ता , निकालता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता  आहिस्ता .......
बहुत  पहले से इन क़दमो की आहट जान लेते है , तुझे ए  जिंदिगी हम दूर से पहचान लेते है...... वगेह्रह   वगेह्रह   ....... उनकी ऐसी यादगार  गज़ले है जो आज भी  हर गजल सुनने  वाले की पहली पसंद हुआ करती  है .
          उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब,क़तील शिफाई,निदा फाजली,फिराक गोरखपुरी, शाहिद कबीर,अमीर मीनानी,कफील अजहर,सुदर्शन फकीर की  शायरी को अपनी खूबसूरत आवाज़ से सजाया. जगजीत सिंह के कई शुरुवाती  कामयाब ग़ज़ल अलबमो के टाईटल जहा इंग्लिश में हुआ करते थे ......जैसे   Hope, In search,Vision , Love is Blind., Ecstasies, A Sound Affair, Passions.etc.वही बाद में,उनका रुझान उर्दू की तरफ ज्यादा हो गया था. जिसके चलते उन्होंने अपनी ग़ज़ल अलबमो को मेराज,कहकशां,चिराग , सजदा,सोज,सहर,मुन्तजिर,और मरासिम जैसे उर्दू उन्वानो(titles) से सवारा.इसके अलावा उन्होंने हिंदी,उर्दू ,पंजाबी, नेपाली,सिन्धी,बंगाली गुजरती में भी अनगिनत गीत गाये .
                कहते है कि हर कामयाबी के पीछे कड़ी मेहनत,लगन और लम्बा संघर्ष छुपा होता है.गज़लों के इस बेताज बादशाह को भी बॉलीवुड में एक अच्छा ब्रेक पाने के लिए काफी जद्दोजहेद करनी पड़ी......फिल्म एक्टर  ओम प्रकाश के बुलावे पर जब वो  फिल्मो में अपनी किस्मत आजमाने सपनो के शहर मुंबई  गए तो उन्हें काफी मायूसी  का सामना करना पड़ा .., बड़े बड़े संगीत कारो ने उनकी आवाज़ सुनी,पर ये कह कर मना कर दिया की ..... "आपकी आवाज़ तो अच्छी है ,पर हीरो  पर सूट नहीं करेगी ."
इसके बाद भी वो हताश नहीं हुए और बड़े- बड़े एक्टरो के घर सजी - महफ़िलो में भी उन्होंने performance दी,इस उम्मीद पर ........की शायद  किसी को उनकी आवाज़ पसंद आ जाये और उन्हें फिल्मो में गाने का एक मौक़ा मिल जाये.आखिर कार उनकी ये कोशिशे रंग लायी और1980 के दशक में प्रेमगीत,साथ साथ, अर्थ जैसी फिल्मो में अपनी मोसकी और खूबसूरत आवाज़ से सबको अपना क़ायल बना दिया .
फिल्म प्रेम गीत(1981)का का मशहूर गीत..." होठो  से छु लो तुम,मेरा  गीत अमर कर दो"फिल्म साथ -साथ  का  ...
"तुमको देखा तो ये,ख़याल  आया,जिंदिगी धूप तुम घना साया."
फिल्म अर्थ की मशहूर गज़ले -"तेरे खुशबू में लिखे ख़त मैं जलाता कैसे" ,                                                
                                               "झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है के नहीं.. "                           "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो 
  क्या गम है जिसको छुपा रहे हो." 
                                                                   "कोई ये कैसे बताये के वो  तन्हा क्यों है.".... 
जैसे गीत और गजले उनकी आवाज़ और मौसकी से सजे हुए है.इसके अलावा नये दौर की कई फिल्मे जैसे गाँधी टू हिटलर ,कसक, वीरज़ारा , जोगेर्स पार्क,तरकीब, दुश्मन,सरफरोश तुम बिन में भी उन्होंने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा.जिसकी गजले और गीत लोग अपने favourite  collection में बड़े शौक़ से  रखते है .
मशहूर शायर गुलज़ार जगजीत सिंह को प्यार से ग़ज़ल जीत सिंह कहा करते  थे. गुलज़ार के टी.वी सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर गज़लो को  जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ में गा कर बेमिसाल बना दिया है. 

अपनी गायकी से सबका दिल जीत लेने वाले जगजीत सिंह की जिंदिगी  में उस वक़्त अँधेरा छा गया, जब जुलाई 1990 के एक रोड एक्सिडेंट में, उनके बीस साल के एकलौते बेटे, विवेक की मौत हो गयी.जिसके बाद सदमे में डूबी चित्रा सिंह ने, जहां हमेशा के लिए गाना छोड़ दिया.वही जगजीत सिंह ने अपने  बेटे की बेवक्त जुदाई के दर्द को अपने अंदर ही जज़्ब कर लिया और संगीत में अपने आप को, पूरी तरह  से डुबो दिया.जगजीत सिंह अक्सर एक पंजाबी  गाना गाते थे......."मिटटी का बावा" जिसे उनकी बीवी चित्रा सिंह ने एक पंजाबी फिल्म में गाया था.ये गाना जिसमे,किसी अपने को..... बहुत कम उम्र में खो देने का दर्द बया किया गया है, जो उनकी ही आप बीती है.जगजीत सिंह ने अपने बेटे विवेक की याद में एक एल्बम  Some One Some Where(1994)निकाला था,जिसमे आखरी बार उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने  उनके  साथ  गाया  था.
अपनी आवाज़ से सबके दिलो पर  राज करने वाले  जगजीत सिंह, एक ऐसे बेहेतरीन इंसान थे,जिन्होंने कई बार दूसरो की मदद, इतनी ख़ामोशी से कि, कि किसी को पता भी नहीं चला.एक शो ओर्गानायेज़र, जिनका काम ठीक-ठाक नहीं चल रहा था .एक महफ़िल में वो जगजीत सिंह से मिले और उनके साथ शो करने की  ख्वाहिश ज़ाहिर की और अपनी परेशानी बताते हुए कहा की "मेरी बेटी की शादी है,और मेरे पास पैसे की कमी  है, .... अगर आपके शो की ज़िम्मेदारी मुझे मिल जाएगी,तो मुझे बतौर प्रोफिट दो तीन लाख रूपए बच जायेगे और मुश्किलें आसान  हो जाएगी." जगजीत सिंह के पूछने पर ....... उन्होंने पैसे की पूरी ज़रुरत बता दी.
अगले दिन जगजीत सिंह ने उनको को बुलाया और कहा ..... " ठीक है .... आप मेरे लिए शो Organize करें, मै आपके शो में गाऊँगा लेकिन आपको शो इसी हफ्ते मे करना होगा."  ये सुन कर वो organizer घबरा गए और कहने लगे ..... "सर इतनी जल्दी शो कैसे organize होगा ......  इसके  लिए तो काफी तैयारी करनी होगी. इस पर जगजीत सिंह ने बेफिक्र होकर, मुस्कुराते हुए कहा ...... " फिक्र मत करो सब हो जायेगा. तुम्हारी बेटी की शादी तय हो गयी  है .... ये मिठाई का डिब्बा घर ले  जाओ और सबका मुह मीठा करो. "ये सुन कर वो साहब,मायूस होकर अपने घर चले गए. घर जाकर जब उन्होंने वो मिठाई का डिब्बा खोला तो हैरान रह गए ... क्योकि उस डिब्बे में उतनी रकम रखी हुई थी, जितनी उन्हें अपनी बेटी की शादी के लिए ज़रुरत थी .
अपने काम को लेकर उनका मानना था की "पहले हमें खुद अपने काम को, अच्छी तरह से समझ कर ,तसल्ली कर लेनी चाहिए,क्योकि  जब हमें अपने काम से तसल्ली  होगी ,तब हम दूसरो से ये उम्मीद कर सकते है की शायद उन्हें  भी  हमारा काम पसद  आये."
वो अपने काम के लिए इतने Devoted थे की, जब उनकी माँ का इंतकाल हुआ तो, उस दिन कोलकाता में उनका बहुत बड़ा शो था. सारे टिकेट एडवांस  में बिक चुके थे. माँ के गुजर जाने की खबर सुन कर उन्होंने फ़ौरन दिल्ली का एयर टिकेट बुक कराया, घर पहुच कर,एक बेटे होने के सारे फर्ज अदा किये, और फिर वापस अपना शो करने कोलकाता चले गए. .....किसी का कोई नुकसान नहीं होने दिया उन्होंने .शो में पहुच कर भी उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा ...... बल्कि,एक घंटा देर से पहुचने के लिए माफ़ी मांगी.  फिर तीन चार अच्छी -अच्छी गज़ले पेश करने  के बाद सबको बताया की उनकी माँ इस दुनिया से चली गयी है.ये था उनका Professionalism और  काम के लिए उन की लगन .
2003 में उन्हें आर्ट और संगीत में दिए गए योगदान के लिए भारत सरकार ने तीसरे सबसे बड़े अवार्ड पदम् भूषण से सम्मानित किया. इसके बाद 10 मई 2007 को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में1857 में लड़ी  गयी पहली आजादी की लडाई की 150 वी साल गिरह पर, जगजीत सिंह ने बहादुर शाह  जफ़र की मशहूर ग़ज़ल ..... लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में ..... गायी.जिसे सुनने के लिए राष्ट्रपति अबुल कलाम आज़ाद ,प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ,लोक सभा स्पीकर सोम नाथ चटर्जी,कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गाँधी के अलावा तमाम बड़े नेता मौजूद थे.
                                                                            जगजीत सिंह आखरी वक़्त तक ,अपनी सुरीली आवाज़ से महफिले सजाते रहे. बीमार होने से पहले उन्होंने लगातार तीन शो किये थे.जो 16 सितम्बर 2011 को मुंबई के Nehru Science Centre में,17 सितम्बर 2011को  दिल्ली के श्री फोर्ट ऑडिटोरियम में और 20 Sep.को देहरादून के The Indian Public School में organised किया गया. वही उन्होंने सर दर्द की शिकायत की थी ,जिसके बाद मुंबई के लीलावती अस्पताल में उनके दिमाग की सर्जरी हुई और उन्हें  I.C.U में Ventilator पर रखा गया था .देश और दुनिया में उनके अनगिनत चाहने वाले उनके सेहत मंद होने की दुआ मांगते हुए ये कहते रहे
 "उठ के महफ़िल से मत चले जाना
                                  तुमसे रोशन ये कोना कोना है."
लेकिन फिर भी, उन्होंने किसी की नहीं सुनी और 70 साल की उम्र में 10 अक्टूबर 2011 को अपने सभी  चाहने वालो को अलविदा कह कर वो इस दुनिया से चले गये  .और उन्हें याद करके हमारे सुनने के लिए छोड़ गये .....  अपना गाया हुआ ,ये गीत ...... 
चिट्ठी न कोई सन्देश ,
              न जाने कौन से देश
कहां  तुम चले गये .
अरशिया  ज़ैदी













2 Oct 2011

Ek Shardhanjali Bapu Ko

                                           एक श्रद्दांजली  बापू को  
       
Always aim at complete harmony of thoughts word & deed.Always aim at purifying your thoughts and every thing will be well. Mahatma Ghandi

यह महान विचार है बापू के,जिनकी 142 वी सालगिरह मनाते हुए हम सब उन्हें याद कर रहे है.अहिंसा और सत्याग्रह के जिन हथियारों को लेकर बापू ने ,आज़ादी की एक लम्बी लड़ाई लड़ी और हमारे देश को  अंग्रेजो की गुलामी से आज़ाद कराया, उनकी उसी फिलोसफी  और गाँधीगीरी का गहरा असर, हमें आज भी देखने को मिलता है.
      
इसके लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है ,अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को ही ले लीजिये ,जिन्होंने बापू के रास्ते पर चल कर ही अपने आन्दोलन को कामयाब बनाया. हज़ारो  की भीड़ जमा होने के बावजूद  वहां न तो कोई अफरा-तफरी मची और न ही कोई  हंगामा हुआ .लोग  शांति और  सब्र से मैदान में डटे रहे . क्या बड़े क्या बच्चे ,सभी   गाँधी टोपी  पहने  हुए पूरी तरह गाँधी वाद के रंग में रगे हुए नज़र आ रहे थे .गाँधी जी के  उसूलो  का गहरा असर वहां जमा लोगो के बर्ताव में  साफ़ नज़र आ रहा था .
       
आज जब हमारा देश महगाई भ्रष्टाचार,आतंकवाद,गरीबी जैसी तमाम मुश्किलों से जूझ रहा है.सामाजिक उथल- पुथल मची हुई है.बेगुनाह और मासूम लोगो का खून बहाया जा रहा है. बापू के सपनो का वो भारत जो गाँव और क़स्बो में  बसता  था ,उन बसे बसाये गाँव को बेदर्दी से उजाड़ा जा रहा है. आम आदमी के साथ खुले आम नाइंसाफी की जा रही है और देखने -सुनने वाला कोई नहीं.इन्साफ बेबस होकर दम तोड़ रहा है.
            
गाँधी जी का गुजरात अब नरेंद्र मोदी जैसे लोगो की गिरफ्त में है.जिन्होंने नफरत के बीज बोकर, तैयार की गयी फसल को काटने की नाकाम कोशिश की है.इनकी तानाशाही का ताज़ा तरीन शिकार I.P.S ऑफिसर संजीव भट्ट बने है.जिन्हें किसी झूठे  मामले में फ़सा कर जेल में डाल दिया गया है.उनका  कुसूर सिर्फ इतना हैकि उन्होंने नरेन्द्र मोदी पर गुजरात दंगो में शामिल होने का इलज़ाम लगाया था.
       
देश में ऐसे हालात पैदा हो गए है जहा बापू के उसूलो और उनके अपनाये रास्ते पर चलने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है.
  
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गाँधी के सिद्दांत और गाँधीवादी विचार धारा कितनी अहमियत रखती है इसकी जीती-जागती मिसाल है .93 साल के गाँधीवादी नेल्सन मंडेला जो साउथ अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति है. जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है.वो दुनिया के सबसे ज्यादा बाइज्ज़त,और मशहूर ह्स्तीओ में से एक है .नेल्सन मंडेला  ने गाधी जी के दिखाए रास्ते पर चल कर अपनी मंजिल को पाया है.और सारी दुनिया को दिखा दिया है कि गांधीवाद  ही वो रास्ता है,जिस पर चल कर हर मुश्किल से मुश्किल मसले का हल शांति  से निकाला जा सकता है. आज दुनिया में उनके जैसा कोई नहीं. उन्होंने बद से बदतर हालात में भी हिम्मत नहीं हारी और टेढ़े मेंढ़े रास्तो पर बिना डगमगाए चलते हुए अपनी मंजिल को पाया है.

दुनिया  को अहिंसा  का पाठ  पढ़ाने  वाले  बापू,  30 जनवरी 1948 को   शहीद कर  दिए  गए। उनकी शहादत पर यक़ीन  न करते हुए, किसी शायर  ने  यूं  अपना दर्द  बयां  किया   था  -

"ख़ुदारा  न बोलो यह  मनहूस बोली 
भला कौन  मारेगा  बापू को गोली 
ज़मी ऐसी  बातों  से थर्रा गयी है।
जगाओ न बापू को नींद आ गयी है।"

महात्मा  गांधी  की शख्सियत  क्या थी  इसे किसी को बताया या समझाया नहीं जा सकता .....सिर्फ महसूस किया जा सकता है .साबरमती के  इस  संत  को  हमारा  सलाम.
अरशिया  ज़ैदी








 










22 Sept 2011

Aatankwaad aur Hum

 आतंकवाद और हम 

हाल में ही दिल्ली में हुए धमाको ने पूरी दिल्ली को हिला कर रख दिया .कई बेगुनहा लोगो की जाने चली गयी,और बाक़ी कई लोग कई दिन तक घायल अवस्था में,जिंदिगी और मौत  के बीच संघर्ष  करते रहे .एक बार फिर आतंकवाद ने मानवता को शर्मिंदा कर दिया.

आतंकवादियों  ने पहले जयपुर , बंगलौर,अहमदाबाद ,और अब भारत की राजधानी दिल्ली  को अपने आतंकवाद का निशाना बनाया है तथा लोगो के दिलो में दहशत बैठाने का असफल प्रयास किया है. आतंकवाद  समाज  के नाम पर ,धर्म के नाम पर, देश के नाम पर और राजनीती के नाम पर आम आदमी को बाटने की एक सोची -समझी साजिश है .आतंकवाद के माध्यम से कुछ असामाजिक तत्व देश के प्रति गद्दारी करते हुए,अपने व्यक्तिगत स्वार्थो को पूरा कर रहे है,नहीं तो ऐसा कौन सा धर्म है जो मजहब और जिहाद के नाम पर बेगुनहा और मासूम लोगो की जान लेना सिखाता हो .

जहा तक  इस्लाम धर्म का सम्बन्ध है ,वो तो आपसी सदभाव,अहिंसा और प्रेम का सन्देश देता है|ये धर्म तो पेड़-पौधो से लेकर जानवरों और इंसानों  को चोट पहुचाने को भी पाप समझता है....तो फिर ये इंसानियत के दुश्मन इस्लाम के नाम पर लोगो का खून कैसे बहा सकते है और हजारो लोगो की रोज़ी-रोटी कैसे छीन सकते है?


आज का भारतीय मुसलमान अपने उन सभी भाई बहनों लिए बेहद दुखी है ,जो इस आतंकवाद के शिकार हुए है ,इसका जबरदस्त विरोध ,वो कभी लखनऊ की मशहूर  हजरत अब्बास की दरगाह पर,मुह पर सफेद पट्टी बांध कर करते  हैं तो कभी लाखो मुसलमान, मुंबई में शुक्रवार की नमाज़ के बाद ,विशेष तौर पर दहशत गर्दी के लिए बददुआ करने के लिए अपने हाथ उठाते हैं .

आज हर मुसलमान जो भारतीय है ,वो इस आतंकवाद की ज़ोरदार शब्दों में निंदा करता है और इस पाप के लिए दोषियों को कठोर से कठोर सज़ा दिलाने की हिमायत करता है . दूसरी ओर जब- जब इन दहशत गर्दो  ने मानवता का रक्त बहाया है ,तब तब हजारो नेक और अच्छे लोगो ने आगे आकर हादसे के शिकार लोगो के लिए , हर सम्भव सहायता देने का प्रयास किया है फिर चाहे वो किसी धर्म ,किसी जाति या समाज के किसी वर्ग से सम्बंध रखता हो . हर भारतीय ने अपने इन भाई बहनों  के लिए सहयता करके  देश और समाज के प्रति  अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा किया है .

इसी सम्बंध में दो कूड़ा बीनने वाले बच्चो ने दो जिंदा बमो के खबर वक़्त रहते पुलिस को दी. जिनके कारण पुलिस उन बमों को निष्क्रिय कर सकी  और कई और बड़े हादसे होने से बच गए . 

आतंकवाद हमारी लड़ाई है जिस के लिए हम सभी को मिल कर आगे आना होगा और पहल करनी होगी केवल पुलिस और नेताओ पर हम सारी ज़िम्मेदारी नहीं डाल सकते . हमें भी जागरूक होना पड़ेगा ,तभी हम अपने देश को आतंक वाद से बचा पायेगे . साथ ही इस बात का भी विशेष ध्यान रखना होगा कि दोषी व्यक्ति  को सख्त से सख्त सज़ा मिले ,पर किसी निर्दोष के साथ कोई  अन्याए ना हो. हमारा देश सभी के रहने के लिए एक सुरक्षित स्थान हो .और अब न तो कोई आतंकवाद की  घटना घट सके और न ही कोई आतंकवाद के भेट न चढ़ सके .

अरशिया  ज़ैदी 
Published in  hindi monthly Magazine BYAAN(nov.2008)