27 Mar 2012

                         अजब फ़साना  (Ajab Phasana)

दर्द से हर एक दिल का
रिश्ता बड़ा पुराना है, 
न कोई समझ सका जिसे 
ये वो अजब फ़साना है. 

 Dard se har ek dil ka 
 Rishta bada purana hain 
 na koi samajh saka  jise 
 ye vo  ajab  phasana  hai 

हर शख्स सिलवटो में 
लिपटा सा नज़र आता है, 
अपने दर्द की अलग    
एक दांस्ता सुनाता है 

Har shakhs , silwato mein 
lipta sa nazar aata hai . 
apne dard ki alag
ek daastaan  sunata hai 

उलझी सी जिंदिगी को 
सुलझाने की जुस्तुजू में,  
हसरतो के जाल में 
उलझता ही चला जाता है. 

 Uljhi  see zindigi ko 
suljhane ki  justujo main
hasrato ke jaal main 
ulajhta hi chala  jata hai 

आँसू पलकों से निकलने को 
बेचैन  हुए जाते है 
फिर भी खुश होने का अहसास
 हम दुनिया  को दिए जाते हैं  

 Aansoo palkon se nikalne  ko 
 bechain hue jate hain 
 phir bhi khush  hone ka ahsaas 
 hum duniya  ko diye jaatein  hain 
   
अरशिया ज़ैदी  ( Arshia Zaidi)   

16 Mar 2012

Ek yaad bachpan ki

                            एक याद बचपन की

  आज कुछ फुरर्सत के लम्हे मेरे पास हैं .....सोच रही हूँ की यादो के झरोको से अपने बचपन में झाँकू .... बचपन में झाकते ही कई खट्टी-मीठी यादें,किसी किताब के पन्नो की तरह मेरी नजरो के सामने से गुज़रने लगती है.एक यादगार पन्ना, जहां आकर मेरी सोच कुछ ठहर सी जाती है ,और मुझे उस वक़्त में वापस ले जाती है जब मैं तक़रीबन दस साल की और मेरा भाई रुफी आठ साल का रहा होगा.

हर भाई-बहन की तरह हम भी बहुत झगड़ा करते थे.बात तू-तू मै-मै से शुरू हो कर अक्सर मार-पिटाई पर जाकर ख़त्म होती थी.मेरा प्यारा शैतान-भैया रुफी जो उम्र में मुझसे दो साल छोटा ज़रूर था लेकिन हर बार बाज़ी मार ले जाता था.हमारी लड़ाईयों से अगर कोई सबसे ज्यादा परेशान था .... तो वो थीं हमारी मम्मी.वो मुझे बार बार भइया से दूर रहने और लड़ाई न करने की हिदायत देती लेकिन मैं उनकी एक न सुनती.....और बार-बार झगड़ा करने के बाद भी अपने भैया के आस-पास ही रहना पसंद करती .... शायद इसलिए .....की मुझे उसके बिना ज़रा भी चैन नहीं था और मैं  उससे ज्यादा देर तक नाराज़ भी नहीं रह सकती थी. 
एक शाम  ... घर में सब लोग किसी पार्टी में जाने की तैयारी कर रहे थे. मम्मी ने हमेशा की तरह मुझे और रुफी  को पहले ही तैयार कर दिया था.खेल-खेल में हम दोनों की लड़ाई हुई और बात घूसों-लातो तक पहुच गयी.उस लड़ाई में मेरा पडला भरी रहा और मैने रुफी की पिटाई कर ली.
  मैं जानती थी कि मेरा नटखट  भैया मुझसे बदला ज़रूर लेगा,क्योंकि अक्सर ऐसी लडाई के बाद वो मुझे मारने भागता.... और मैं जल्दी से कमरे में जाकर छुप जाती,दरवाज़े को अंदर से बंद कर लेती....इस पर उसे और भी  ज़्यादा गुस्सा आता था.वो ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़े को धक्का देकर दरवाज़ा खोलने की  कोशिश करता  .... जब कभी  दरवाज़ा नही खुल पाता तो वो मुझे बहकाने के लिए  झूट-मूठ कहता अरे मेरी उंगली पिच गयी".जल्दी से दरवाज़ा खोलो.और मैं  झट से दरवाज़ा खोल देती...(इस डर से,कही सच में उसकी उंगली न पिच जाये) और दरवाज़ा खोलते ही रुफी को अपने सामने,शरारत से मुस्कुराता हुआ खड़ा पाती और फिर तो,मेरी ख़ैर नहीं होती थी.
उस दिन भी कुछ ऐसा  ही हुआ था .... दरवाज़ा बंद रखने के लिए मैंने  अपने दोनों हाथो की ताक़त लगा रखी थी ....दरवाज़े पर लगी चटख़नी भी कमज़ोर थी. 2-3 बार जोर से धक्का देने पर खुल जाती थी.उधर दरवाज़ा न खुल पाने की वजह से रुफी का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था ....वो दरवाज़े को जोर जोर से धक्का दे रहा था.अचानक उसने चिल्ला कर कहा ....  मेरी उंगली पिच गयी"....रेनी जल्दी से दरवाज़ा खोलो "..मैंने दिल ही दिल में सोचा ....
"अच्छा बच्चू....फिर एक बार तुम  मुझे बेवकूफ़ बना रहे हो  .....लेकिन इस बार मैं  तुम्हारी  बातो में नहीं आने वाली".
ये सब बातें दिल ही दिल में सोचते हुए मैंने और कस के दरवाज़ा बंद कर लिया.
अभी मैं अपने ख़यालो में उलझी हुई थी की,बाहर से मेरी अतिया फुप्पो  की आवाज़ आयी ....."रेनी जल्दी से दरवाज़ा खोलो....... रुफी की उंगली सच में, दरवाज़े के बीच में आ गयी है ."ये सुनते ही मैंने झट से दरवाजा खोल दिया और सामने  जो देखा......उसे देख कर मेरे तो होश उड़ गए  ....मेरा प्यारा भैया दर्द से बेहाल हो रहा था,उसका भोला-भाला मासूम चेहरा आँसूओ से तर था.उंगली से बुरी तरह खून बह रहा था,खाल आपस में चिपक गयी थी और नाख़ून उंगली से अलग हो चुका था. 
इतने में शोर सुन कर मम्मी बाहर आ गयी,और रुफी की यह हालत देख सन्न रह गयी ...लेकिन जल्दी ही उन्होंने खुद को सभाल लिया.बिना घबराये रुफी के हाथ पर डिटोल लगा कर पट्टी बाधी और मुझे पड़ोस में रहने वाले अज़ीज़ मामू को बुलाने भेज दिया.
 अज़ीज़ मामू एक बेहद नेक दिल और हमदर्द इंसान थे,जिन्हें हम प्यार से 'मामू' कहते थे.मैने जल्दी-जल्दी उन्हें सारी बात बतायी.वो घर आ गए और रुफी को फ़ौरन डॉक्टर चड्डा के पास ले जाकर  मरहम पट्टी करवा दी.
    घर में सब मुझसे बेहद नाराज़ थे.उसके बाद जो मेरी क्लास लगी है...उसके बारे में क्या बताऊ ? रुफी हमारे ताया-जानी(बड़े अब्बा) का बहुत लाडला भतीजा था. अपने लाडले की ये हालत देख कर ताया-जानी को मुझ पर बहुत ग़ुस्सा आया था ... मुझे अभी भी याद है ... उस वक़्त वो कघी से अपने बाल बना रहे थे... जैसे ही उन्होंने मुझे देखा... उन्हें और ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने उसी कघी से मेरी पिटाई कर दी थी,उस बेचारे कंघे को भी थोड़ी बहुत चोट आयी थी और वो टूट गया था. 
ऐसा लग रहा था की शायद भेड़िया आया-भेड़िया आया,वाली कहानी सच हो गयी थी.खेल ही खेल में एक बड़ा हादसा हो गया था,जिसकी वजह से मेरे भैया को बहुत दर्द सहना पड़ा था.जो कुछ हुआ वो अनजाने में हुआ ... लेकिन बेहद बुरा हुआ था.. 
रुफी की उंगली को ठीक होने में कई दिन लग गए थे...उसकी उंगली तो ठीक हो गयी लेकिन उस उंगली पर पूरा नाख़ून कभी न आ सका.जिसको देख कर आज भी मुझे अफ़सोस होता है..
अरे आप किस सोच में डूब गए ....क्या आप को भी अपने बचपन की कुछ शरारते याद आ गयी ? अगर आप ये सोच रहे है कि इस हादसे के बाद   हम सुधर गए होंगे और हमने झगड़ा करना बंद कर दिया होगा ... तो आप गलत समझ रहे है.उसके बाद भी हम झगड़ा करते रहे..... आज भी करते है लेकिन थोड़ी तमीज़ से !!!
 अरशिया  ज़ैदी



25 Feb 2012

A New Dawn.......

                                       एक नई सुबह 
 शादी मुबारक...ये मुबारकबाद है गुजरात के वाडिया गावं की उन लड्कियो के लिए,जो 11 मार्च 2012 को एक नया इतिहास रचने वाली है.Prostitution के लिए बदनाम इस गावं की 15 मासूम लड्कियो को Prostitution के पुश्तैनी कारोबार से निकाल कर उनकी शादी करवाई जा रही है.... वो भी एक साथ....एक ही  मंडप में. इस नेक काम को अंजाम दिया है विचार्थी जाति समुदाय समर्थन मंच नाम की एक NGO ने...जिसने उन लाखो लडकियों को एक उम्मीद की किरण दी है जो इस अँधेरे भरी जिंदिगी  से निकलना चाहती है.
यूं तो भारत की आज़ादी के 65 बरस बीत चुके है. लेकिन इस गावं  की लड़कियों को  सही माएने  में आज़ादी अब नसीब हो रही है.कहा जाता है  की सालो से,इस ग़ाव की लड़कियों को ज़बरदस्ती Prostitution के  कारोबार में धकेला जाता रहा है.इनकी कमाई से इनके घर के चूल्हे जलते रहे है और इनके घर के मर्द ठाट से अपनी जिंदिगी गुज़ारते रहे है.
Red Light Zone,Prostitution .....ये लफ्ज़ ऐसे है जिनके बारे में आम तौर पर  हम बात नहीं करना चाहते .. या फिर करते भी है तो बेहद ढके छुपे अंदाज़ में.उन लड़कियों को बेहद गिरी हुई नज़र से देखा जाता है जो जिस्म फरोशी के इस कारोबार में रहकर अपनी रोज़ी रोटी कमा रही हैं.  
एक लम्हे के लिए भी हम रुक कर.........ये नहीं सोचते की इस तरह की जिंदिगी जीने के पीछे उनकी क्या मजबूरियां रही होंगी? 
आम तौर पर कोई भी लड़की जान बूझ कर तो इस गन्दी दलदल में नहीं आना चाहेगी...जिस पर बीतती है,शायद वही जान पाता है.इसके लिए कई बार तो उनके घर के हालात,माँ-बाप का बर्ताव ज़िम्मेदार होते है तो कभी जानलेवा भूखमरी और ग़रीबी उन्हें तोड़कर रख देती है जिसके चलते वो कुछ ऐसे लोगो की झूटी हमदर्दी के शिकार हो जाती हैं जो उनकी मजबूरी का फायदा उठाना चाहते है.और जब उन्हें असलियत का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
कही न कही इनके लिए हमारा रवैया और हमारी सोच भी ज़िम्मेदार रही  है.अगर इस ज़िल्लत भरी जिंदिगी से निकलने के लिए कोई लड़की हमारी तरफ हाथ बढ़ाये, तो हम पहले तो उसकी मदद ही नहीं करते और कभी मदद करना भी चाहें तो बदनामी का डर हमें रोक देता है.
शुक्र है इस NGO का,जिसने एक बेहद अच्छी पहल की है उम्मीद की जानी चाहिए की बाक़ी prostitutes की  जिंदिगी को भी बेहतर बनाने के लिए कुछ और ठोस कदम उठाये जायेंगे ताकी उनकी जिंदिगी मुस्कुराहटो से भर सके और वो एक अच्छी जिंदिगी जी सके.
   
    अरशिया  ज़ैदी




15 Feb 2012

Are We Civilized ?

   .
                               क्या हम civilized हैं ?

मॉरिशस के साफ़-सुथरे ख़ूबसूरत बीच पर किसी tourist ने सिगरेट पी कर फेक दिया था... जिसे वहाँ के लोगो ने फौरन नोटिस किया और उस बन्दे को उसकी ग़लती का अहसास कराते हुए सिगरेट का टुकड़ा वहाँ न फेकने की हिदायत की.ये क़िस्सा बताया....मेरी दोस्त अनु ने,जो हाल ही में मॉरिशस घूम कर आयी है.
दूसरी तरफ अब ज़रा अपने देश का हाल सुनिए...जिसे अभी हाल ही में दुनिया की जानी मानी टॉक शो होस्ट Oprah Winfrey ने अपने  भारत दौरे में महसूस किया,उन्हें ये देख कर बेहद हैरानी हुई की यहाँ पर कुछ लोग सड़को पर रेड लाइट  होने पर भी  नहीं  रुक रहे थे और traffic rules को ताख़ में रख कर अपनी-अपनी गाडियों को दौड़ाए जा रहे थे.
एक भारतीय,एक हिन्दुस्तानी होने के  नाते ये सुन कर मेरा सर तो शर्म से झुक गया.कही कुछ था जो मुझे अपने गिरेबान में झाकने को मजबूर कर रहा था. 
यह Civic Sense, ये तमीज़ हम हिन्दुस्तानियों में क्यों नहीं है ?क्यों हमारे तौर तरीके ऐसे है जिससे दूसरो को परेशानी होती है ... और हमारे सर पर जूं भी नहीं रेंगती . 
हम पब्लिक प्लेसेस और सडको पर कूड़े-करकट के ढेर जमा करने में ज़रा भी नहीं हिचकिताते.बड़े बड़े डस्टबिन रखे होने के बावजूद फलो के छिलके,पोलिथीन बैग,खाने-पीने की चीजों के पैकेट,जहा खड़े होते है वही बड़ी लापरवाही से फेक देते है और तो और,साफ़ -सुथरी दीवारें हमें अच्छी नहीं लगती इसलिए थूक और पान की पीको के निशान से,साफ़ दीवारों को गन्दा करने में भी हम पीछे नहीं रहते .  
 
सब जानते है की पोलीथिन बैग नालियों में डालने से नालियां चोक हो जाती है जिसकी वजह से गन्दा पानी सड़को पर बहने लगता है और लोगो को उस गंदे पानी के ऊपर से फलांग कर जाना पड़ता है.लेकिन फिर भी लोग इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं करते.
हमारी सोच ऐसी हो गयी है कि बस हमें कोई दिक्क़त   नहीं होनी चाहिए.बाकी किसी को हमारे तौर तरीक़े से कोई परेशानी हो...तो हमारी बला से.
सफाई करने वाले आयेंगे...वही साफ़ करेंगे.सारी उम्मीदें सरकार से ही है. . भला क्यों ? आधी ज़िम्मेदारी तो हमारी भी बनती है.अगर सफाई करवाना सरकार का काम है तो गन्दगी न फैलाते हुए सफाई को बनाये रखना हमारी ज़िम्मेदारी है.सरकार और हम मिलकर काम करेंगे,तभी तो बात बन पायेगी.
टिकेट काउंटर हो या बुकिंग विंडो,कुछ लोग क्यू में खड़े होकर अपना नंबर आने का, ज़रा सा भी इन्तिज़ार नहीं करना चाहते,लेकिन अपना काम वो सबसे पहले हो जाने की उम्मीद ज़रूर करते है.इसी बेसब्री और बत्तामीज़ी के चलते जरा सी देर में,हालात बिगड़ जाते है और हाय-तौबा मच जाती है.पुलिस के लिए हालात पर क़ाबू पाना मुश्किल हो जाता है और जनता परेशान होती है वो अलग.

हमारे देश में बेहतरीन Tourism होते के बाद भी हमारी Tourism- Industry घाटे में जाती जा रही है.वजह सामने है ....अगर  हम  घर आये मेहमान के साथ अच्छा बर्ताव नहीं  करेंगे तो हमारे घर कौन आएगा ?शायद हम "अतिथि देवो भवा:"का रिवाज भुला बैठे है .कई बार टूरिस्ट हमारे बारे में बहुत बुरा Impression ले कर वापस जाते है.कुछ बेहूदा लोगो की वजह से इन मेहमानों को कई परेशानीयो का सामना करना पड़ जाता  है.... कभी  सामान चोरी हो जाता है तो कभी उनके साथ बदसुलूकी और धोखा-धडी हो जाती है. जो हर हिन्दुस्तानी को शर्म सार करने के लिए काफी है .
कुछ इसी तरह की परेशानिया हमें अपने घर और पास-पड़ोस में भी झेलने को मिलती रहती है.पड़ोसी कोई भी चीज़ ये कह कर ले जायेंगे... कि काम ख़त्म होने के बाद वापस कर देंगे  .... लेकिन उनका 'वो कल' कभी नहीं आता.भले ही आप को आपकी चीज़ की कितनी भी ज़रुरत हो,लिहाज़ और शराफत के मारे आप,अगले बन्दे की मदद करने की नियत से उससे ' न' नहीं कहेंगे और वो आपको वक़्त पर आपकी चीज़ लौटाएगा - नहीं......आखिर परेशान होकर,आपको ही अपनी चीज़ वापस लेने पड़ोसी के पास जाना पड़ेगा. 
    पढ़ने के शौक़ीन लोग अपने पास अच्छी किताबो  का collection रखना पसंद करते है.जिन्हें अक्सर दोस्त लोग पढने के लिए मांग कर ले जाते है.किताबे देना किसी को बुरा नहीं लगता,बल्कि अच्छा लगता है.यहाँ तक तो बात ठीक है,लेकिन बुरा तब लगता है जब आपकी किताब कोई मांग कर ले जाये और पढ़ कर वापस करने की कोई सुध ही न ले,और बार बार तकाज़ा करने पर जब किताब वापस करे तो उस पर या तो हल्दी-तेल के धब्बे लगे हो,या फिर किताब फटी हुई हो.तब ये ज़रूर लगता है की शायद हमने इस बन्दे को किताब दे कर गलती कर दी.और ये ग़लती अब दुबारा नहीं करनी है.
कहते है ज़रुरत पर जो काम आ जाये वो आपका सच्चा साथी होता है और अगर ज़रुरत पैसे की हो,और आपका कोई हमदर्द आपकी उस ज़रुरत को पूरा कर दे तो आप इसे क्या कहेंगे? .....आप उसके अहसान मंद होंगे न .......और दिल ही दिल में जल्दी से जल्दी उसके पैसे लौटने का इरादा करेंगे!
 कई बार हक़ीक़त इसके उलट हो जाती है जनाब .... कुछ लोग पैसे लेने के बाद उसे लौटना याद नहीं रखते, और आज-कल पे टालते रहते है.जबकि अपनी दुनिया भर की सारी ज़रूरते पूरी करते रहते है.उधार देने वाला शख्स तकाज़ा करने में शर्म महसूस  करता है और सोचता  रहता है की ...कब मेरे पैसे वापस मिले और  मैं अपने रुके हुए ख़र्च पूरे करू .

कुछ लोगो का celebration तब तक पूरा नहीं होता जब तक वो अपने घर का शोर लाउड-स्पीकर के ज़रिये पड़ोसियों को न सुनवा दे.किसी बीमार को लाउड-स्पीकर के शोर से तकलीफ हो रही हो,या किसी की नींद खराब हो रही हो उन्हें इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता.अरे भई ...आपके घर कोई celebration है बहुत अच्छी बात है,यक़ीनन आप से प्यार करने वाले आपके दोस्त और रिश्ते दार आप की ख़ुशी में शामिल होंगे क्या इतना काफी नहीं है आपके लिए? ...जो आप लाउड -स्पीकर के शोर से लोगो के कान के परदे फाड़ देने पर तुले हुए है.
    

इस तरह के खट्टे -मीठे तजुरबो से हम सभी को आये दिन दो चार होना पड़ता है.दूसरो में Civic Sense जागने का इन्तिज़ार करेंगे तो सिर्फ इन्तिज़ार ही करते रह जायेंगे. क्यों न इस से निपटने के लिए पहल अपने ही घर से, और अभी की जाये? ...   क्यों न खुद इस बात का ध्यान रक्खा जाये की हमारा कोई भी तौर-तरीक़ा दूसरो की परेशानी का सबब न बन सके और हम अपना देश,अपना शहर, अपनी गलियों को साफ़ -सुथरा बनाये रखने की ज़िम्मेदारी को बखूबी पूरा कर सके. 

अरशिया  ज़ैदी  






















  



















14 Jan 2012

YOG AUR SEHAT


                                              योग और सेहत
आज हम जिस तरह का लाइफ स्टाइल जी रहे है उसमें,ना तो हमारे पास तसल्ली से खाना खाने का वक़्त है और न ही पूरी नींद सोने का, दुनियावी  चमक-दमक और पैसा कमाने का जूनून हम पर इस क़दर हावी हो चला है कि हम अपनी सेहत को भी नज़र अंदाज़ कर बैठे हैं.
आज हम जिस हवा में सांस ले रहे है वो polluted हो चुकी है,जो खाना हम खाते है उसमेpesticidesमिले हुए है यहाँ तक की पीने का पानी भी साफ़ नहीं मिल पाता.ऊपर से स्ट्रेस भरी भाग दौड़ की जिंदिगी ने  लोगो का जीना  मुहाल कर रखा है.तरह-तरह की नई नई बीमारियाँ हमें घेरती जा रही है.महगे इलाज,अस्पताल का खर्च और डॉक्टर की फीस ने आम आदमी की जेब ख़ाली कर दी है.
आज हर किसी को अच्छी सेहत और दिल के सुकून की तलाश है जिसे पाने के लिए योगासन और प्राणायाम से बेहतर तरीक़ा और कोई नहीं है.इस प्रक्टिस को लगातार करते रहने से,जो बीमार है वो अच्छे हो जाते है और जो सेहतमंद है उनके पास सेहत का अनमोल खज़ाना बना रहता है.  
      प्राणायाम साँसों को सही ढंग से लेने की वो टेक्नीक है जिससे बॉडी के हर cell को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है,वो activeऔर healthy  बने रहते  है.यहाँ तक की कई बार dead cells भी एक्टिव होकर सही ढंग के काम करना शुरू कर देते है.साँसों को सही ढंग से लेने और छोड़ने का ये तरीक़ा शरीर के टोक्सिन्स(toxins)को बाहर फेक कर सभी organs को  healthy रखता है.
प्राणायाम में 6 तरह की exercises करवाई जाती है ये है -
1-भस्त्रिका प्राणायाम 2-कपाल भाति प्राणायाम 3-बह्य प्राणायाम 
4-अनुलोम प्राणायाम 5-ब्रह्मरी  प्राणायाम 6-उद्गीत प्राणायाम .
 योगभ्यास और प्राणायाम  करके लोग,0%खर्च,0%साइड एफ्फेक्ट और100 %फायदा उठा रहे है यहाँ तक की,कई बार जब डॉक्टर उम्मीद छोड़ बैठे है और मरीज़ से कह दिया है"की आपकी बीमारी का कोई इलाज नहीं है,आपको  ठीक रहने के लिए जिंदिगी बार दवाएं खानी होंगी"तब योग ने अपना कमाल दिखाया है.अनुलोम-विलोम,कपाल-भाति कर के मरीजों ने नयी जिंदिगी पायी है,और दवाओं को अलविदा कहा है .
     योग करने के लिए किसी ख़ास उम्र की दरकार नहीं है.ये किसी उम्र में भी  शुरू किया जा सकता है.यहाँ तक की छोटे मासूम बच्चे,जिन्हें बोलना भले ही नहीं आता हो पर वो अनुलोम-विलोम और कपाल-भाति का मतलब अच्छी तरह समझते है और कहने पर,एक्टिंग कर के भी दिखा देते है. 
     दूसरी तरफ ऐसे लोगो की तादाद भी कम नहीं है जिन्हें योग से होने वाले सारे फायदों के बारे में पूरी जानकारी तो है पर काहिली की चलते योगाभ्यास करने में टाल मटोल करते रहते है.बीमार पड़ जाने पर,पहले तो दवाईयां खा-खा कर सेहतयाब होने की हर मुमकिन कोशिश करते है लेकिन ख़ुदा न ख़स्ता,सारे इलाज कराने के बाद भी अगर बीमारी ठीक नहीं होती तो ये dialogueबोल कर खुद को तस्सली देने की कोशिश करते है ...."कि क्या करे किस्मत में यही लिखा था" ... या "ऊपर वाले की यही मर्ज़ी थी" .
इस तरह की सोच रखने वाले लोगो को दर्द से करहाते हुए,डॉक्टर के यहाँ चक्कर लगाना और पैसे को पानी की तरह बहाना तो मंज़ूर होता है पर बेहतर सेहत के लिए योग और प्राणायाम करना गवारा नहीं होता.
   योग की बात चले  और बाबा राम देव का ज़िक्र ना आये,ऐसा तो हो ही नहीं सकता.यूं तो योग की खोज महाऋषि पतंजलि ने पांच हज़ार पहले की थी पर आस्था टीवी के ज़रिये इसे घर-घर पहुचने की पहल बाबा रामदेव ने की थी.उन्होंने योग और प्राणायाम को आम लोगो की लिए खास बना दिया है,उनकी कही हुए बातें लोग,बड़े ध्यान से सुनते और समझते थे उनकी मजाक भरी चुटकियाँ लोगो को हसने पर मजबूर कर देती थी.उनकी बात में कितना दम था इसका अंदाज़ा तो इसी बात से लगाया जा सकता है, की जब उन्होंने पेप्सी और कोकाकोला जैसे बड़े ब्रांड के कोल्ड ड्रिंक कोToilet Cleaner का नाम देते हुए,लोगो को,इसे न पीने की हिदायत दी तो लोगो ने इन कोल्ड ड्रिंक्स को पीना तक छोड़ दिया था जिसकी वजह से न सिर्फ इन विदेशी कंपनीयो को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था बल्कि इसका बाज़ार भी उन दिनों  काफी डाउन हो गया था.
    बाबा रामदेव जनता की सेहत को सुधारने में पूरी तरह कामयाब रहे लेकिन जब उन्होंने समाज की सेहत को बेहतर बनाने के लिए हिन्दुस्तान की राजनीती में कदम ज़माने की कोशिश की तो वहाँ बात बिगड़ गयी और वो एक के बाद एक नई controversyमें फसते चले गए इससे उनकी इमेज को ज़बरदस्त धक्का लगा.
   योग करने के फायदे तब ही महसूस हो पाते है जब कोई खुद लगातार प्रक्टिस करता रहता है.अगर आप अपनी जिंदिगी में कुछ करना चाहते  है,कुछ पाना चाहते है तो इसके लिए आपको फिट रहना ज़रूरी है,अच्छी सेहत के बिना आप कुछ हासिल नहीं कर सकते.यूं तो कोई भी,किसी भी उम्र में बीमार हो सकता है,लेकिन अगर अपने आप पर,थोड़ी सी मेहनत करके जिंदिगी को सेहत मंद और चुस्त दुरुस्त और ख़ुशगवार  बनाया जा सकता है तो इसमें हर्ज ही क्या है!  

 अरशिया  ज़ैदी





7 Jan 2012

UMEED (HOPE)


                                        
26 जून 2011की बात है.दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में National Eligibility Test(NET) के exam में मेरी ड्यूटी लगी हुई थी.मैं कंट्रोल रूम में authorities से Instructions मिलने का इन्तिज़ार कर रही थी, इतने में एक 26-27 साल का नौजवान कमरे में दाखिल हुआ,गोरा रंग, दरमयाना क़द,चेहरे पर हलकी सी दाढ़ी,और self confidence से दमकता चेहरा..... ब्लू कलर की शर्ट और स्काई ब्लू कलर की जींस पहने इस लड़के ने कंधे पर एक rucksack बैग डाल रखा था .
      कमरे में आकर उसने कहा "मेरा नाम मोहम्मद आतिफ है प्लीज़ मुझे मेरा रूम नंबर बता दीजिये.( फिर थोडा रुक कर)am a person with special needs.मैं ठीक से पढ़ नहीं सकता, मेरी आँखों की रौशनी सिर्फ 40% है .क्या आप मुझे एक writer भी available करा देंगे?"ये कहते हुए उसने अपने हाथ में पकड़ी लम्बी सी अलमुनियम की छड़ी को कस कर दबाया.
Authorities ने मेरा नाम पुकारा और मो.आतिफ का टेस्ट पेपर और आंसर शीट पकडाते हुए इस student के साथ रूम नंबर-5 में जाने को कहा.
रूम नंबर-5 दूसरी मंजिल पर था,जिस पर सीढ़ीयो से जाना था.आतिफ ने बिना मेरी मदद लिए, आहिस्ता-आहिस्ता खुद सीढ़ीया चढ़ी.पेपर शुरू होने में सिर्फ15 मिनट बाक़ी थे.उसने फुर्ती से अपना बैग खोला और एक एक्सटेनशन कॉर्ड ,टेबल लेम्प, बहुत मोटे लेंस का चश्मा,ब्लाइंड स्टिक और Magnifying lens निकाल कर मेज़ पर रख दिया ... फिर मुझसे पूछा.......
              ''क्या यहाँ कही Extension cord लगाने की लिए socket है? मुझे टेबल लेम्प का प्लग लगाना है कमरे में रौशनी कम है ... मुझे ठीक से दिखेगा नहीं." 
मैंने इधर उधर देखा,स्विच बोर्ड मुझे कही नज़र नहीं आया,किसी fault की वजह से AC भी नहीं चल रहा था.इसलिए गर्मी की वजह से हाल और भी ज़्यादा बेहाल हो गया था.शिकायत करने पर बिजली वाला आया लेकिन वोAC की fault नहीं ढूढ सका हाँ उसने इतनी मेहरबानी ज़रूर की कि उसने हम लोगो को,उसी हाल नुमा कमरे के दूसरे हिस्से में बैठा दिया जहांACचल रहा था.
    यहाँ आते ही गर्मी से थोड़ी राहत मिली. मैंने जल्दी जल्दी उसका सामान दूसरी टेबल पर रखवा कर टेबल लेम्प का प्लग सामने लगे सोकेट में लगा दिया.आतिफ ने मुस्कुरा कर थैंक्स कहा और मुझसे अपनी Answer sheet  में उसका नाम,रोल नंबर वगेहरा भरने की request की.आतिफ का admit card देख कर मैंने उसकी सारी details कॉपी में भर दी.इन सारी formalities को पूरा करने में15मिनट और लग गए.पेपर शुरू हो चुका था और आतिफ ने पेपर लिखना अभी शुरू भी नहीं किया था.
        पहला पेपर objective question-answer का था.आतिफ ने कहा 
"मैम आप पहले मेरे लिए question पढ़ें  और फिर नीचे लिखे उसके answer,मैं जो answer बताऊ  ... आप उसे  आंसर शीट में टिक कर दीजिये.''
मैं उसके लिए invigilator/writer दोनों की तरह काम कर रही थी.वो मुझे आंसर  बता रहा था और मैं टिक करती जा रही थी.कई बार तो वो मेरे आंसर  के options पढने से पहले ही झट से जवाब  बता देता,फिर चाहें वो सब्जेक्ट General-knowledge का हो,Reasoning का हो या फिर हो English,हर Subject की उसने ज़बरदस्त तैयारी कर रखी थी.वो भी आँखों के साथ दिए बिना! उसने15 min.देर से पेपर शुरू करने के बाद भी तय वक़्त में पेपर पूरा कर लिया था.जो वाकई क़बीले तारीफ़ था
         पहले पेपर के बाद एक घंटे का ब्रेक था.मैंने आतिफ से पूछा कि
 "क्या आप 2nd पेपर शुरू होने तक यहीं रूम में बैठ कर इन्तिज़ार करेंगे"?
 "नहीं मैं इस ब्रेक में सबसे पहले मस्जिद जाऊँगा,नमाज़ पढूंगा तब कुछ खाऊँगा"उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया. 
  M.Com में गोल्ड मेडलिस्ट रह चुका ये लड़का अब P.hd कर रहा था न  वो मायूस था और न ही हताश .... बस थी तो कुछ बन जाने की लगन और जूनून.उसका ये Never Give Up वाला positive attitude कही न कही मुझे भी inspire कर रहा था.
    2nd paper descriptive था जिसमे लम्बे answers लिखने थे.उस वक़्त आतिफ को देख कर मैं यही सोच रही थी की अब ये कैसे लिखेगा लम्बे answers! . ..मुझे ही लिखने होंगे....तेज़ी से.अभी मैं अपने सवालो में ही उलझी थी कि मैंने उसको एक magnifying lens लगा कर पेपर पढने की कोशिश करते हुए देखा. 
"इस से मेरी नज़र का धुंधलापन कुछ कम हो जायेगा और आसानी से पेपर लिख लूँगा" मेरे अनकहे सवाल का जवाब देते हुए उसने कहा.फिर  बेहद मोटे लेन्स का चश्मा अपनी आखों पर चढ़ा कर मुझसे सवाल पढने को कहा.
मैंने आतिफ को question पढ़ कर सुनाया जिसे उसने दोहराते हुए समझने की कोशिश की फिर दोबारा मुझसे सवाल पढ़ने को कहा,इस तरह मैंने उसके हर सवाल को रुक-रुक कर कई-कई बार पढ़ा.सवाल को अच्छी तरह समझने के बाद उसने कॉपी खोलते हुए मुझसे पूछा...
."मैंम कॉपी के पेज पर लाइन कहा से शुरू हो रही है".
.मैंने उसकी उंगली पेज की लाइन पर रख दी....उसने पूरे पेज को हाथ से छु कर अंदाज़ा लगाया. 
फिर अगला सवाल किया-"एक answer लिखने के लिए कितने पेज की जगह दी गयी है"?और मेरे बताते ही बिना देर किये उसने तेज़ी से लिखना शुरू कर दिया.
 आम तौर पर लोगो की hand writing जल्दी जल्दी लिखने में अक्सर टेडी मेढ़ी और गन्दी हो जाती है. मुझे इस बात की curiosity थी की कि आतिफ कैसे लिखेगा? ...और ये देख कर मैं हैरान रह गयी की वो बड़े आराम से लिख पा रहा था.उसकी handwriting शुरू से लेकर आख़िर तक एक सी थी,एक दम साफ़-सुथरी, ना तो कोई लव्ज़ लाइन के बाहर निकला था और न ही कोई लाइन टेढ़ी -मेढ़ी हुई थी.
    आतिफ लिखते-लिखते बीच-बीच में टाइम भी पूछता जा रहा था ताकी पेपर छूटे नहीं  ...वो सर झुकाए तेज़ी से लिखता जा रहा था.और बीच-बीच में बातें करके अपना दर्द भी बांटता जा रहा था.
     "मैम मेरी नज़र बचपन में कमज़ोर नहीं थी पर धीरे धीरे कमज़ोर होने लगी और चश्मा लग गया फिर कुछ वक़्त के बाद चश्मे से भी दिखना बंद हो गया,अब मैं magnifying lens से पढ़ता हूँ.मेरी इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है ... इस बीमारी में नज़र धीरे धीरे कमज़ोर हो जाती है और कुछ वक़्त के बाद पूरी तरह से दिखना  बंद हो जाता है"
ये कह कर उसने एक आह भरी और चुप हो गया ..... कुछ लम्हों तक माहौल में ख़ामोशी की बर्फ सी जमी रही......
  फिर कुछ देर बाद उसने ख़ामोशी तोड़ते हुए आगे बताया   .... 
    "पता है मैम,मेरे 'सर' जिनके अंडर मैं Ph.d कर रहा हूँ उन्हें भी same problem है मेरी तरह .... अब उन्हें दिखाई देना बिलकुल बंद हो गया है मेरे साथ भी ऐसा ही होगा.पर सोचता हूँ कि तब-तक मैं settle हो जाऊ.Net का इम्तेहान तो मैं पहले भी पास कर चुका हूँ अब दुबारा Junior Research fellowship(JRF) के लिए ये exam दे रहा हूँ ... ताकि मुझे scholarship  मिल सके और मैं आगे की पढाई कर सकू. .."
 मैं दुःख और बेबसी से उसकी दर्द भरी दास्तान सुनती जा रही थी. मेरे पास लव्ज़ नहीं थे जिनसे मैं उसको तसल्ली देती ....और अगर तसल्ली देती भी तो क्या कहती ?
     ये पेपर भी उसने तय वक़्त में पूरा कर लिया.कॉपी मुझे दे कर उसने  धीरे धीरे एक-एक करके अपना सामान बैग में रखा और हम नीचे आ गए.जब मैं उसकी कॉपी जमा कराने कंट्रोल-रूम जाने लगी तो उसने कहा....
"मैम आपने मेरी अच्छी help की.पूरे question paper को अच्छी तरह से explain किया ... प्लीज़ आप मेरे लिए दुआ करिएगा कि मैं इस एक्साम  को पास कर लूं."
मैंने मुस्कुरा कर"आमीन" कहा ... और कंट्रोल रूम की तरफ बढ़ गयी.

अरशिया  ज़ैदी

1 Jan 2012

Shayari



                          मशाल

बदलते साल में पिछले बरस के देखे हुए 
अधूरे खुआब हक़ीक़त में ढल भी सकते है.
 अगर लगन हो,य़की और प्यार का जज़्बा 
तुम्हारे सामने पत्थर पिघल भी सकते है.
                
 मशाल इल्मो जुनूं की जला के हम सब लोग 
 कुरीतियों की फनो को कुचल भी सकते है. 
  गरीब बस्ती में फैले हुए अंधेरो को 
 चमकते इल्म के सूरज निगल भी सकते है. 

हमारे प्यार की झप्पी से ही फ़क़त ऐ दोस्त 
सिसकते भूख से बच्चे बहल भी सकते है.  
अगर हम मिलके कुछ कुर्बानियों का अहद कर ले 
तो इस समाज की किस्मत बदल भी सकते है.

वो तपती रेत,अगर कर्बला की जहन में हो 
दहकती आग पे इंसान चल भी सकते है.
छिपा है दर्द हर एक क़ेह्क्हे के दामन में 
हर एक आँख से आंसू निकाल भी सकता है.
             
नाकामयाबी को जोड़ो न अपनी क़िस्मत से 
 सितारे चाल को अपनी बदल भी सकते है. 
 तू अपने हाथो की मेहनत पे ऐतबार तो कर 
 के तेरे हाथ की रेखा बदल भी सकते है. 
  
अरशिया  ज़ैदी

22 Dec 2011

Ek House Wife ki Ahmiyat

                  एक हाउस वाइफ की अहमीयत 


आज वसुंधरा जब इंग्लिश स्पीकिंग का क्लास करने आई तो कुछ उदास सी लग रही थी,मैंने वजह पूछी तो अपना दर्द बया करते हुए कहने लगी कि "क्या बताऊ,एक House Wife होने की सज़ा भुगत रही हूँ.सुबह से लेकर रात तक घर के लोगो के लिए तमाम जिम्मेदारियों को निभाने में लगी रहती हूँ .....अपनी थकान की परवाह किये बगैर सब की छोटी से छोटी ज़रुरत का ख्याल रखती हूँ लेकिन इसके बावजूद भी मेरी मेह्नत और कोशिशो को पूरी तरह से नकार दिया जाता है,जबकि मेरी देवरानी,जो एक Working Woman' तो है लेकिन घर और घर के लोगो के लिए बिल्कुल  लापरवाह है फिर भी घर के सभी लोग उसे अपने सर पर बैठा कर रखते है और उसका खास ख्याल रखते हैं. 
              बात तो सही है वसुंधरा की,पता नहीं क्यों, हमारी सोच इतनी baised हो गयी है.जहा हम Working Women को ज़रुरत से ज्यादा अहमियत देने लगे है, वही हम घर की Life Line कही जाने वाली  house wives की अहमियत को सिरे से नकार रहे है .....जैसे घर में रहने वाली औरते कुछ करती ही नहीं ऐश करने के अलावा !
           बेशक,आज के दौर में औरतों का financially independent होना और अपनी शक्सियत को पहचान देना बेहद ज़रूरी है लेकिन जनाब,घर-गृहस्थी की देख भाल करना भी कोई बच्चो का खेल नहीं है,बहुत हुनर मंदी का काम है ये ..... जिसे बिल्कुल भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.घर परिवार को ताख़ में रखकर सिर्फ करियर और पैसा कमाने को ही अपनी ज़िन्दगी का मकसद समझ लेना एक सेहत मंद सोच की निशानी नहीं कही जा सकती है .
                    ज़रा उन लोगो से पूछिए,जिन्हें रोज़ घर लौटने पर दरवाज़े  पर लगा ताला मुह चिढ़ाता हुआ मिलता है और घर के अंदर दाखिल होते ही तन्हाई और अकेलापन उनका स्वागत करता है .....एक गिलास पानी देने वाला भी कोई नहीं होता,खुद ही पानी लेकर,सूखा गला तर करना पड़ता है.खुशनसीब है आप.... अगर आपके घर लौटने पर कोई आपका इन्तिज़ार करता हुआ मिलता है.   
            एक 'घरेलू औरत',या 'होम मेकर' किसी भी घर के लिए एक वरदान होती है,जो घर के लोगो को सुख और आराम देने के लिए दिन-रात घर के कामो में लगी रहती है.और अपनी नेक कोशिशो से ईंट-पत्थर के मकान को ख़ूबसूरत घर में बदल देती है.जिन बेशकीमती जज्बातों और feelings के रहते वो यह सब करती है,उसकी कोई भी कीमत नही लगायी जा सकती है.
             जो जायका घर के बने खाने में होता है वो जायका आपको दुनिया के किसी होटल के खाने में नहीं मिल सकता,और रोज़ रोज़ जंक फ़ूड खा-खा के तो गुज़ारा भी नहीं किया जा सकता.अच्छे-अच्छे लज़ीज़ खाने पकाना भी एक आर्ट है,जिसमे अच्छा खासा वक़्त लग जाता है और एक House Wife बड़े जतन और प्यार से घर के सभी लोगो की पसंद-नापसंद का ख़याल रखते हुए लज़ीज़ खाना तैयार करती है.जिसे हम चट्खारे ले ले कर खाते हैं. 
 छोटे बच्चे जो कच्ची मिटटी की तरह होते है,जैसे ढालो ढल जाते है.माँ बच्चे की सबसे पहली और सबसे बेहतरीन टीचर होती है जो न सिर्फ बच्चो की सबसे अच्छी देखभाल और परवरिश कर सकती है बल्कि उसे अच्छे संस्कार भी सिखाती है.अगर माँ ही घर पर नहीं रहेगी तो बच्चो की अच्छी परवरिश कैसे होगी,उन्हें अच्छा-बुरा,सही-गलत का फर्क कौन समझाएगा?  वो भी आज के दौर में जब joint family ख़त्म हो चुकी हैं और nuclear family का ज़माना है.
     ऐसा पैसा किस काम का,जब आपकी नन्ही सी बेटी को आपकी सबसे ज्यादा ज़रुरत हो,उस वक़्त आप उसे रोता बिलखता छोड़ कर काम पर चली जायें,अपने बच्चो को बड़ा होता हुआ न देख सके ......उनकी  किल्कारिया ना सुन सके और आपके होते हुए भी आपके मासूम बच्चो की परवरिश creche या नौकरों के हाथो में हो.
             घर में माँ की नामौजूदगी कई बार बच्चो को चिडचिड़ा,जिद्दी और बत्तमीज़ बना देती है.छोटे बच्चो को creche और नौकरों के भरोसे छोड़ना  कई बार कितना खतरनाक हो जाता है,उनके साथ कैसे कैसे संगीन हादसे हो जाते है इसकी ख़बरे तो आये दिन अखबारों की सुर्खियाँ बनती ही रहती है.
            इसके अलावा आज कल स्कूल जाने वाले बच्चो को भी तरह तरह के assignment करने को दिए जाते है जिसमें बच्चो को guidance और help की ज़रुरत होती है.ऐसे में अगर माँ ही घर पर नहीं होगी .... हेल्प के लिए,तो बच्चो की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ सकता है.
            एक House Wife के घर पर रहने से घर के दरवाजे हर वक़्त मेहमानों के लिए खुले रहते है.मेहमानों को घर में आने के लिए वक़्त की पावंदी नहीं झेलनी पड़ती,और चाय की चुस्कियो के साथ एक-दुसरे से मिलना-जुलना और गपशप के मज़े लेना भी आसान हो जाता है.उनके घर में रहने से नौकरों पर भी निगरानी बनी रहती है और वो अपने काम को करने में लापरवाही नहीं कर पाते,नहीं तो घर के सामान को बेदर्दी से इस्तेमाल करने और तोड़ने फोड़ने में इन्हें ज़रा भी हिचक नहीं होती.  
         घर में रहने वाली एक घरेलू औरत की अहमियत का अहसास उस वक़्त सबसे ज्यादा होता है जब,ख़ुदा न खास्ता घर में कोई बीमार पड़ जाता है,मरीज़ को देखभाल और तीमारदारी की ज़रुरत होती है.ऐसे में वो न सिर्फ प्यार से मरीज़ की तीमारदारी करती है बल्कि बिस्तर पर बीमार पड़े होने की बोरियत और अकेलेपन से भी बचाती है.जो एक महगी नर्स कभी नहीं कर सकती.
                        चाहे कोई कुछ भी कह ले,और कितनी भी दलीले क्यों न दे दी जाये लेकिन सच तो यह है कि,House Wives की अहमियत को Working Women के मुक़ाबले किसी भी लिहाज़ से न तो कम आकां जा सकता है और न ही उसकी शख्सियत को हलके में लिया जा सकता है.

अरशिया  ज़ैदी

16 Dec 2011

Dream(khuaab)

                                         ख़ुआब
                 बनाऊ मुकाम और पहचान अपनी 
                 ये एक ख़ुआब बचपन से मैंने है देखा, 
                 हो ख़ुद फैसला करने का, हौसला भी 
                 बनू एक अच्छा, सहारा मैं ख़ुद का .

                 तमन्ना है मुझको खुले आसमा की 
                 जहां मेरी परवाज़,हो इतनी ऊची, 
                 मैं खुद्द्दार हू मेरी दौलत यही है 
                 न मुझपे उठे नज़रे बेचारगी की.

                  अरशिया  ज़ैदी 

3 Dec 2011

Park

                                         पार्क 



 जिंदिगी के सफ़र में कुछ खुशनुमा यादें ऐसी होती है जो हमेशा हमारे साथ रहती है.मेरी,ऐसी ही एक याद उस पार्क से जुड़ी  हुई है,जहां मैं रोज़evening walk के लिए जाया करती थी,वहां बाक़ी लोगो के अलावा,आस पास की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चे भी municipality के नल से पीने का पानी भरने आया करते थे.इन बच्चो में,किसी के तन पर पूरे कपड़े नहीं थे तो किसी के नन्हे पैर बिना चप्पल के थे ... लेकिन फिर भी,उनके माथे पर शिकन का  नामो- निशान  नहीं था.

पार्क में आते ही,ये बच्चे सबसे पहले अपने साथ लाये छोटे- बड़े डिब्बो को एक किनारे रख देते और दौड़ कर झूले पर चढ़ जाते....झूला झूलते,फिर पकड़न-पकडाई खेलते हुए एक दुसरे के पीछे भागते रहते. शाम ढलने से पहले,अपने साथ लाए डिब्बो में नल से,पीने का पानी भर के अपने घर ले जाते.जो डिब्बे पानी के वज़न से भारी हो जाते,और जिन्हें उनके छोटे- छोटे हाथ नहीं उठा पाते तो वो उन्हें घसीट कर अपने घर ले जाने की कोशिश करते थे .    



एक दिन पार्क में टहलते हुए मेरी नज़र इन बच्चो पर पड़ी ... मैंने देखा कि एक रिक्शा ठेला, जिस पर,इन बच्चो ने कई पानी से भरे छोटे-बड़े डिब्बे रख लिए है .... और वो ठेला ढलान भरे गेट से नीचे नहीं उतर पा रहा है.इन्ही बच्चो में से एक 8-10 साल का लड़का,उस रिक्शा ठेला को पार्क के ढलान भरे रास्ते से उतारने की कोशिश कर रहा है और पीछे से नन्हे नन्हे 5-6 बच्चे उस रिक्शे को धक्का लगा  रहे है ... मैं जल्दी से गयी और 'रिक्शा ठेला' को उस ढलान भरे रास्ते से उतरवा दिया ..... बच्चे मुस्कुरा दिए और   "थैंक यू आंटी" कह कर चले गए .
अब इन बच्चो को जब भी मदद की जरूरत होती .... वो मुझे आवाज़ लगा देते ....कभी कहते कि"आंटी... मेरा डिब्बा... ठेले पर रखवा दो" .......
तो कभी कहते कि आंटी ....."ठेला ढलान से नहीं उतर पा रहा है ..... आ कर धक्का लगवा दो न".
 इस तरह अब हमारी अच्छी-ख़ासी जान-पहचान हो गयी थी.
उस पार्क के सामने 'सबका बाज़ार' नाम का एक किराना स्टोर था जहां से मैं अक्सर घर की ज़रुरत का सामान खरीदा करती थी.इसलिए  कभी-कभी अपने साथ एक छोटा सा पर्स भी ले जाती थी.एक दिन उन्ही बच्चो में से, एक नन्ही से लड़की ने मेरे हाथ में पर्स देखा तो कहने लगी .....
 'आंटी पैसे दो न' ....'आंटी पैसे दो न' ... 
और ये कह कर मेरे पीछे पीछे चलने लगी ...... मैंने भी चलते चलते उसे जवाब दिया.
"नहीं अच्छे बच्चे पैसा नहीं मागते,हाँ .....अगर तुम्हे कुछ चाहिए तो बताओ .... मैं  तुम्हे खरीद दूंगी".
अभी हमारी बात-चीत चल ही रही थी कि उस लड़की के बाक़ी साथी भी आ गए .... और बड़े ग़ौर से हमारी बात सुनने लगे  ...... क्यूंकि मुझे उन की फरमाइश पूरी करनी थी इसलिए मैंने वहां खड़े सभी बच्चो से मुख़ातिब होकर उनसे अपनी फरमाइश बताने को कहा ....
अब इन बच्चो ने शर्माना शुरू कर दिया...  मेरे काफी पूछने पर इनमें से कुछ बच्चो ने तो"मैदा की बनी मठरियां" खाने की फरमाइश की लेकिन  कुछ बच्चे अभी भी खामोश खड़े थे ..... शायद कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन झिझक की वजह से कह नहीं पा रहे थे.मैंने भी हार नहीं मानी और कोशिश करती रही.आखिर मेरी कोशिश रंग लायी और मुझसे जवाब में कहा गया कि -
"हमें नारंगी  रंग का पानी पीना है"यानि वो कोल्ड ड्रिंक पीना चाहते थे.
"चलो तुम्हारी फरमाइश पूरी करते है ."
अभी मैंने ये कहा ही था कि, सभी बच्चे खुश होते हुए पार्क के बाहर लगी खोके नुमा दूकान पर जा पहुचे.बच्चो ने जैसे ही वहां सजे शीशे के जार में मठरियां देखी .... तो चिल्ला पड़े.....और उस तरफ इशारा करते हुए बोले "वो रहीं मठरियां...... हमें तो वो खानी है".
मैंने दूकानदार से इन बच्चो को मठरियां देने को कहा .... दुकानदार ने पहले तो हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा कर सब बच्चो को मठरियां पकड़ा दी.मठरियां देते वक़्त उस दुकानंदार के चेहरे पर भी तसल्ली झलक आयी थी.
अब 'उन' बच्चो को अपनी फरमाइश पूरी होने का इन्तिज़ार था जिन्होंने "नारंगी रंग का पानी"(कोल्ड ड्रिंक)पीने की खुआइश ज़ाहिर की थी.लिहाज़ा अब,हम सब,सामने के किराना स्टोर में घुस गयी.चमचमाते स्टोर में जा कर पहले तो ये बच्चे ज़रा.... झिझके.फिर वहा सजी खाने पीने की चीजों को ताकने लगे.अचानक उनमे से एक बच्चे की नज़र फ्रिज में रखी कोल्ड ड्रिंक पर पड़ी .. जिसे देखते ही वो ख़ुशी से चिल्ला पड़ा ...
." अरे..... वो रही नारगी रंग की बोतल ...  मैं तो यही पियूँगा".
मैंने फ्रिज से उनकी पसंदीदा "नारंगी रंग की बोतलें "निकाल कर उनके हाथो में थमा दी 
बिल का पेमेंट करके, हम सब दूकान के बाहर आ गए.बाहर आते ही उन सब ने बिना देर किये कोल्ड ड्रिंक की बोतले खोल कर "नारंगी रंग का पानी"  पीना शुरू कर दिया.

उस लम्हा मैंने उन मासूम बच्चो के चहेरों पर  जो ख़ुशी देखी .   उसे देख कर मेरा दिल  सुकून के खुशनुमा अहसास से भर गया.ये खुशनुमा अहसास एक हसीन याद बन कर हमेशा मेरे साथ रहेगा .


 अरशिया ज़ैदी 

24 Nov 2011

Koun Banega Karodpati-Season-5



नया इतिहास बना गया ....कौन  बना करोड़पति  सीजन -5


   . ब्रिटिश टेलीवीज़न के पोपुलर रिअलिटी शो WhoWants To Be A Millionaire की तर्ज़ पर बना "कौन बनेगा करोडपति सीज़न-5"ख़त्म हुए हफ्ता बीत चुका है लेकिन आज भी लोगो की ज़हेन में इसकी यादें ताज़ा है. जहाँ सबको अपने इस पसंदीदा रिअलिटी शो के ख़त्म होने का मलाल है . वही सब, बेसब्री से अगले सीज़न में केबीसी-6 शुरू होने का इन्तिज़ार कर रहे है.  
 
और इन्तिज़ार करे भी क्यों न,आख़िर "केबीसी-5"सैकड़ो लोगो के दिलो पर अपनी ऐसी गहरी छाप छोड़ी है जिसे मिटा पाना आसान नहीं होगा. हिंदुस्तान के आम आदमी को आसमान का सितारा बना कर इस गेम शो ने कामयाबी का नया इतिहास बना दिया है.शो की रूह कहे जाने वाले बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने आखरी एपीसोड में जिस वक़्त गुड बाय कह कर विदाई ली, उस वक़्त लोगो की आखें नम हो गयी थी.


KBC सीज़न-5 में ग्लैमर की चमक दमक के बजाये,हिंदुस्तान के एक आम आदमी की तमन्नाओं को उड़ान भरते देखा गया.इस शो ने ऐसे लोगो के लिए रास्ते बनाये जिसके पास इल्म की दौलत थी,जिंदिगी में कुछ कर गुज़रने का जूनून था लेकिन  अगर कुछ नहीं था तो..... वो था मौक़ा ..... .और ये मौक़ा मुहैया कराया केबीसी ने,जिसने इनके करोड़पति बनने का ख़ुआब हक़ीक़त  में बदल दिया .
इस बार जिस Tag Line  को प्रोमोट करते हुए KBC-5  ने अपना सफ़र शुरू किया ..वो थी ...."कोई इंसान छोटा नहीं होता"और जिन लोगो ने जीत का इतिहास बनाया ... उनकी...... जिंदिगी से, कोई लम्बी- चौड़ी फरमाइशे नहीं थी.बस किसी को सर छुपाने की लिए अपना घर खरीदना था तो कोई अपने घरवालो और बच्चो का "कल" महफूज़ करना चाहता था. 
Sushil Kumar House in Bihar 
केबीसी-5 में,5 करोड़ जीतने का इतिहास रचने वाले 27 साल के सुशील कुमार को आज पूरा हिंदुस्तान जानता है  ..... ये वही सुशील कुमार है जिनके बाबूजी के पास,बीते मानसून में टपकती छत को ठीक कराने के पैसे नहीं थे,आज हर कोई सुशील कुमार के उस घर को देखना चाहता है ... जहा ये माटी का लाल पला बढ़ा,जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में दूसरी बार जूता तब पहना जब वो KBC में हिस्सा लेने आये थे . 


हमारा बदलता भारत,जहा लोगो में बेशुमार क़ाबलियत है लेकिन उनके पास मौक़े नहीं थे  ......ज़रिये नहीं थे,जो उन्हें कामयाबी दिला सके.चार  महीने तक चले केबीसी-5 में, भारत के कोने कोने में छुपी क़ाबलियत और असली टैलेंट देखने को मिला .मध्य प्रदेश का इमली खेडा,उड़ीसा का  लास्ताला,उतराखंड का कुञ्ज बहादुरपुर,उत्तर प्रदेश का उबारपुर जैसे दूरदराज़ इलाके और क़स्बे,जिन्हें बहुत ही कम लोग जानते थे अब ये जगाहें अखबारों की सुर्खियाँ बन कर चमक रहे है .


इस बार इस रिअलिटी शो के प्रोडूसर ने ग्लैमर और स्टारडम के ज़रिये अपने प्रोडक्ट को बेचने के बजाये आम आदमी पर फोकस रखा,जिसके लिए KBC की टीम ने हिंदुस्तान के दूरदराज़ इलाको की खूब ख़ाक छानी.और असली टैलेंट को ढूँढ निकाला.

ऐसे लोग,जिन्हें ज़िन्दगी में कोई रास्ता नज़र नहीं आता था,उनके लिए केबीसी-5 ने ना सिर्फ रास्ता बनाया,बल्कि एक ऐसी मंजिल पर ला कर खड़ा कर दिया जहां से कई और रास्ते कामयाबी की नयी ऊचाइयों को छूने के लिए खुल गए .
Rukhsana  kouser 
Aparna Maaliker 
 आतंक वादियों से लोहा लेने वाली बहादुर रुखसाना कौसर हो या अपर्णा मालेकर जैसी क़र्ज़ में डूबी .एक विधवा ..... या पेड़ से गिर कर हमेशा के लिए अपनी टाँगे खो देने वाले युसूफ मल्लू .केबीसी ने  इन सबको एक बेहतर ज़िन्दिगी गुजरने के लिए पैसे दिए. इसके अलावा दो दर्जन से ज्यादा लोगो को केबीसी ने लखपति बना कर ख़ुशी ख़ुशी घर रवाना किया  .


केबीसी-5 में 'आम आदमी' पर फोकस करने का 'आईडिया 'बेहद कामयाब रहा.जिसने सबको प्रोफिट पहुचाते हुए,सबकी जेबें नोटों से भर दी, फिर चाहे वो इस प्रोग्राम को बनाने वाले प्रोडूसर हो,या इस प्रोग्राम का हिस्सा बनने आये मेहमान हो,सब इसके प्लेटफ़ॉर्म से खुश होकर अपने घर गए. 
Sushil Kumar & Amitabh  Bachchan 


टी.वी इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस बार केबीसी-5 में10 सेकंड का एक 'एड स्लोट' तक़रीबन साढ़े तीन लाख रूपए में बिका. इस हिसाब से अगर हम देखे तो KBC-5 की हर दिन की आमदनी 2 करोड़ रूपए बनती है.जबकि आमतौर पर रिअलिटी शो पर इतने ही वक़्त का एक 'एड स्लोट' डेढ़ लाख से ढाई लाख रूपए में बिकता है.सुना गया है कि जिस दिन बिहार के सुशील कुमार ने पांच करोड़ रूपए जीते उस दिन TRP 7.2 से लेकर 8 तक पंहुचा गयी थी जो अपने आप में किसी गेम शो का रिकॉर्ड है. इस बेहद मशहूर और कामयाब रिअलिटी शो के ख़त्म होने के बाद बाकी रिअलिटी शो यकीनन चैन की सांस ले रहे होंगे.

Yusuf  Mallu 
केबीसी में जान डालने वाले 'स्टार ऑफ़  द मिलेनियम'  अमिताभ बच्चन के बिना तो इस शो का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता उन्होंने,जिस शानदार तरीक़े से केबीसी-5 को होस्ट किया और शो में हिस्सा लेने आये  हर मेहमान से,जिस हमदर्दी,अपनेपन और इज्ज़त से पेश आये उसकी जितनी भी तारीफ की जाये वो कम होगी.एक एपीसोड़ में जब हॉट सीट पर बैठे युसूफ मल्लू का अपाहिज होने का दर्द उनकी आखों से छलक पड़ा था, तो इस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी हॉट सीट से उठ कर जिस हमदर्दी और अपनेपन से उनके आसूं पोछे थे उसे देख कर हर किसी का दिल भर आया था.


खबर है कि अमिताभ बच्चन ने केबीसी -6 के लिए कांट्रेक्ट साइन कर लिया है जिसे देखने के लिए हम सब को अगले सीज़न तक इन्तिज़ार करना पड़ेगा. उम्मीद है कि केबीसी के नए सीज़न में पुराने रिकॉर्ड टूटेंगे ...  कामयाबी के कुछ नए इतिहास रचे जायेंगे और कई और ज़रूरतमंद  लोगो की ज़िन्दगी बेहतर और खूबसूरत बनेगी .


अरशिया  ज़ैदी