4 Oct 2012

                                           सन्डे का दिन 

हाल  में  ही  ब्रिटेन  में किये  गए  एक   सर्वे   से पता चला है  की   ...75 % लोग  सन्डे  में  कही  बाहर जाना पसंद  नहीं करते , और  घर  पर रह कर  आराम  करना  चाहते  है. इस  सर्वे  को  पढ़  कर  मुझे........ लगा  जैसे  इन्होने  मेरे   दिल की  बात कह  दी  हो .क्योकि  मैं  भी ऐसे ही  लोगो में  शामिल हूँ....जो  सन्डे   को घर  से बाहर  निकलना  नहीं  चाहते  और घर  पर  रह  कर relax करना  पसंद  करते है .... कुछ  पढना चाहते  है ... टी वी देखना   चाहते  हैं .. और   रात का खाना  भी   खुद  बनाने  के मूड  में  नहीं होते, बाहर जाकर  खाना चाहते है .... या ऑर्डर  पर ..... घर पर ही खाना  मग़ा  लेना  पसंद  करते  हैं.

 जैसे-जैसे saturday नज़दीक आता  जाता है , वैसे वैसे  excitement  भी  बढ़ने  लगता  है . . सन्डे  की  सुबह देर  तक  सोने  को मिलेगा .  और  अच्छी नींद  लेने के बाद  जब  आँख खुलेगी  तो इत्मीनान से न्यूज़ पेपर    पढेंगे ...... ऑफिस भागने की जल्दी नहीं होगी,  उस  वक़्त ये  अहसास  ही  दिल में  एक  गुदगुदी  सी  पैदा कर  देता है।  

आखिर  इंतज़ार  ख़त्म होता है  और  सन्डे  आ जाता  है  सुबह देर तक  मीठी  नींद  में  सोने के बाद  जब  आख़  खुलती  है  तो  पहला ख़याल  यही आता है .... आज तो  सन्डे  है ...... पूरा  दिन  खूब  relax  करेंगे ....  इस खुमार में   नाश्ता  ख़त्म करते- करते  कब दो पहर  हो जाती है  पता ही   नहीं चलता .घर  के  हल्के फुल्के काम निपटाते हुए..... धीरे- धीरे  आने वाले हफ्ते के  सारे काम याद  आने लगते है जिन्हें निपटाने की फ़िक्र  सताने लगती है और एक- एक  करके  सारे  काम निपटाते  हुए  पूरा दिन   कहां  निकल जाता है.... पता ही  नहीं चलता और  सन्डे  का  दिन   पूरे  हफ्ते  का  सबसे व्यस्त   दिन  बन जाता है।

शायद   आप  भी  मेरी बात से इत्तिफाक रखते होंगे .... क्यों  है ना !!! 

अरशिया  ज़ैदी 

  




            


23 Sept 2012

chadhawa

                                         चढ़ावा 

बीबीसी   न्यूज़  ने   कुछ  दिनों  पहले  रिपोर्ट दिखाई थी  जिसके  मुताबिक  दान  करने में हिन्दुस्तान  का 93  वां  स्थान  है . इस  में  कोई  दो राय  नहीं,  की हमारे मुल्क में  लोग  खुले दिल  से  मस्जिद - मंदिर बनवाने  के लिए  लाखो रूपए  दान कर  देते  है  लेकिन  जब  स्कूल   कॉलेज, या  अस्पताल  के  लिए   दान   करने  की  बारी   आती  है . तो  लोग  क़दम  आगे  नहीं बढ़ाते . ऐसा  नहीं  है की  हमारे देश  में लोगो के पास पैसा  की कमी   है। जहां   एक  तरफ , हमारे  देश  में  अमीर  लोग  अमीर होते जा रहे है ... तो  वही    ग़रीब लोग  और   ज़्यादा  ग़रीबी  के  बोझ  से  दबते जा रहे  हैं ।

अरे  जनाब , इंसानियत  भी  एक  तरह की  इबादत है  बस  इसके लिए   आपको  अपना   बड़ा  दिल करने की ज़रुरत है। देश में हॉस्पिटल  की  कमी है , बच्चो के  पढने के  स्कूल कम है. पैसे न होने की वजह से  बच्चे  अपनी  पढ़ाई  पूरी  नहीं कर पाते। लोग  बीमारियों का इलाज़  इसलिए नहीं करवा पाते  क्योकि  उनके  पास  इलाज  के पैसे  नहीं है,  गरीबी  औरतों के  बच्चे यूं  ही  सड़को  पर पैदा  हो जाते है.....  और  इंसानियत  शर्म सार हो जाती है .

यहाँ  मैं  उत्तर  प्रदेश  के  ऐतिहासक  शहर  मेरठ    की  तारीफ़   ज़रूर करना  चाहूगी  जहां मुझे ये  देख  कर,   बहुत  अच्छा  लगा  था , की   आम लोगो   की  सहुलियतों  के  लिए अमीर  और पैसे  वाले  लोगो ने   ,  दिल  खोल कर  दान  दिया  है।   बेहेतरीन   charitable   अस्पताल  स्कूल,  कॉलेज , सराए  जैसी बुनियादी  सहूलियतें आम - ग़रीब  लोगो के  लिए    मुहैया  कराई  है। जिसका  भरपूर  फ़ायदा   उन्हें  मिल  रहा  है  . वहाँ  इंसानियत और  समाज  के  हक़  में  दान करना  एक  परंपरा  रही  है। जो  की  देश  के   हर  ग़ाव  और  हर   शहर  में  कराये    जाने  की   ज़रूरत  है .

हमारी  कामयाबी   में   हमारे  समाज  का  भी  बहुत  बड़ा  हाथ  होता  है।  यहाँ  की  मिटटी  में   परवरिश   पाकर   हमें  नाम  और पहचान मिलती  है  बुनियादी  सहूलियते  हमारी  जिंदिगी   को आसान  बनाती  हैं।और हम आगे  बढ़ पाते हैं ........ तरक्क़ी  कर पाते हैं , और इसके  बाद  बारी  आती है  हमारी .... समाज को  वापस  करने की , और  तब   हमें  बड़े  खुले  दिल से,  इंसानियत  के  हक़  में  चढ़ावा  देना  चाहिए। ताकी  बाक़ी लोगो  तक   आम  बुनयादी सहूलियतें   पहुँच सके  और  उनकी जिंदिगी   बेहतर  बन सके .
                       
                       चढ़ावा 

मंदिर - मस्जिद  बनवाने में खूब  चढ़ावा  देते हो
मन्नत  पूरी  कर  दे मौला ,यही  मांगते  रहते हो।

ऊपर  वाले  ने  क्यों  तुमको,  दिया है  इतना, ये सोचो
इंसानियत  का  एक  क़र्ज़ है  तुम पर, जिसे तुम्हे   चुकाना है

बीमारों को  राहत  देने  तुम्हें  अस्पताल  बनवाने  हैं
स्कूलों को  खोल  के  उसमें बच्चों को पढ़वाना  है।

समाज से  तुमको  मिला  बहुत  कुछ,  अब देने  की बारी  है,
सुनो  ध्यान से , इस समाज  ने फिर  से तुम्हे पुकारा है।

हम  सब के,  कुछ- कुछ करने से,  देश  तरक्क़ी  कर  लेगा  
लोग  सुखी  हो  जायें  देश के, ख़ुआब  यही हमारा  है। 

अरशिया  ज़ैदी 



5 Sept 2012

A Day With My Teacher


                       एक  दिन अपनी टीचर  के साथ 



A day  with my Teacher
अगर  आपके  स्कूल  - कॉलेज टाइम  की आपकी favourite टीचर  आपके  घर  आ  जाएं   और आपके साथ   कुछ  घंटे  गुज़ारे तो आप कैसा महसूस  करेंगे ....  ?  बहुत  excited,  बहुत  ख़ुशी  महसूस  करेंगे  न ,कुछ  ऐसा   ही  बीते  सन्डे  में  मैंने  महसूस किया था । 
पता  है  आपको ,बीते सन्डे  मैं  मेरे  कॉलेज टाइम की favorite  टीचर  और  मेरी  रहनुमा  मिसेज़ वसुमती अग्निहोत्री  अपने   बच्चों  के  साथ  हमारे  घर आयी थीं . तक़रीबन  10-15 साल के बाद मैं  उनसे मिल रही  थी .....बहुत  खुश  थी  मैं . 
उनसे  मेरा  रिश्ता  तब  का है  जब  मैं  11th  क्लास  में  पढ़ती  थी और  वो  हमारी  हिस्टरी टीचर  थी . उन्हें   हम  वसु  दीदी  कहते    थे  क्योंकि   हमारे  कॉलेज  में  टीचर  को  दीदी  बुलाया जाता  था .

एक  सुलझी हुए सोच , निडर और बिंदास  अंदाज़  और हमेशा  अपने  स्टुडेंट्स को  सुनने -समझने और  मदद  करने  को तैयार  रहने  वाली  रौबदार  शक्सियत   रही   हैं  वसु  दीदी  । उन्हें  शेरो -शायरी  का  भी  शौक़  था , गाती  भी  अच्छा  थी, इसलिए  कॉलेज में  होने वाली Extra  Curricular  Activities  में  उनकी   सुरीली   आवाज़ में  गीत  और  गज़ले  भी  सुनने  को  मिलते  थे।

 वो  अपने  स्टुडेंट्स  का बहुत  ख़याल  रखती  थी ,बात  उन  दिनों  की  है  जब  हमारे 12th के  बोर्ड   के  इम्तिहान  हो रहे थे .....  मैं  इम्तिहान दे रही थी .... और  मुझे   ठण्ड  लग रही थी .... वसु  दीदी  क्लास में  स्टुडेंट्स  को  चेक  करने  आयी   थी, उन्होंने  मुझे  देखा ...और  बिना  कुछ  कहे  अपनी   शाल  उड़ा  दी.  हॉल  में   बैठी  बाक़ी  लडकियाँ  तिरछी  निगाहो  से   मेरी  तरफ  देखने  लगी  थी . क्योकि  वसु दीदी  की  रौबदार  शक्सियत  से  लड़कियां  जल्दी  उनसे  बात  करने  में  झिझकती  थी . मुझे  भी  अपनी  पसंददीदा  टीचर  से  मिला  ये  प्यार  और  अहमियत  बहुत  अच्छी  लग  रही  थी  और  इस  वाक़ये  के  बाद  मैं  जज़्बाती  तौर  पर  उनसे  जुड़ने  लगी  थी .
   
उनकी  जिंदिगी  का  एक  पहलु  ये  भी  है  की  वो   इंसानियत  के  नाते  हमेशा  दूसरो की  मदद करने  को तैयार  रहती थी। इंसानियत  की  एक मिसाल  उन्होंने  तब   क़ायम  की, जब  उन्होंने Muscular  Dystrophy  जैसी  बीमारी ,(जिसमे  मरीज़  हिलडुल  भी  नहीं  पाता) की  एक  Patient  पदमा  अग्रवाल  की लम्बे  वक़्त  तक   ख़िदमत  की   और  उनका  ख़याल  रखा. उनके  दर्द  को  कम  करने  और  उनका  हक़  दिलवाने  के लिए  न  जाने  कितने  लोगो  से लड़ी , दुश्मनी  मोल ली ... लेकिन  पीछे  नहीं   हटी.

वसु दीदी  ने पदमा दीदी  को  कमरे  की  चार  दिवारी  से निकाला,  और  उन्हें  हरे - भरे  पार्क  की  सैर  से  लेकर  पहाड़ो तक की सैर  करवायी. वसु  दीदी  ने  उन्हें  ख़ुश  रखने  और उनके  होटो पर मुस्कराहट लाने की  हर मुमकिन  कोशिश  की .जिसमे  वो कामयाम रही .

वसु  दीदी  ने  ही मेरी  मुलाक़ात  पदमा  दीदी  से करवाई  थी,जो उम्र  में  मुझसे  काफी  बड़ी  थी, मेरा  मानना  है की दोस्ती के लिए उम्र नहीं  बल्कि  सोच  और ख़याल मिलना  ज़रूरी  होता है. पदमा दीदी  मेरी  मुलाक़ात कब  दोस्ती  के गहरे  रिश्ते  में बदल गयी  मुझे  पता  ही नहीं  चला , पद्मा दीदी  का  दर्द  मुझे  भी  बहुत  दुःख  देता था ... और मैं  दिल  से  उनके  लिए  कुछ  करना चाहती थी। यहाँ  मेरे मम्मी - डैडी  से,  विरासत  में  मिली  इंसानियत   और  वसु - दीदी की  Inspiration ने   मेरे  हौसले  बुलंद किये  .... जिसकी  वजह  से  मैं  भी  पदमा  दीदी  की  थोड़ी  बहुत  ख़िदमत  कर  सकी.

पदमा  दीदी  की  बारे  में  क्या  बताऊ , बस  इतना  ही  कह सकती हूँ  की  उन  जैसे  लोग  ख़ुदा  बहुत कम  ही बनाता  है ,उनकी Death  से  एक  दिन  पहले  ही  मैं  उनसे  मुलाक़ात  करने  गयी  थी  और अगले दिन ही पता चला था की वो इस  दुनिया से चली गयी  हैं . उनका  नाम  आते  ही  आज  भी  आखें  नम हो जाती है . उनसे वो आख़री  मुलाक़ात  और  उनके  प्यार का अहसास  आज  भी  मेरे  साथ  है .   

इसके  बाद  जब  वसु  दीदी   पहली बार  हमारे  घर  आयी  थी , उससे   जुडी  ख़ूबसूरत   याद  आज  भी  मेरे  ज़हन  में  ताज़ा  है  , उन्हें  अपने   घर  में   देखकर  मेरी  ये  समझ  में   नहीं  आ  रहा  था  की उन्हें कहां  उठाऊ .... कहाँ  बिठाऊ . जब  वो  मेरे  मम्मी - डैडी   से  मिली  तो उन्हें  और भी  ज़्यादा  अच्छा  लगा  और   फिर  हमारे  घरेलु   ताल्लुक़ात  हो  गए थे  और  हम  अक्सर  एक  दुसरे  के  घर  आने -जाने  लगे ,इसके  बाद  हम  सब  अपनी- अपनी  ज़िन्दिगियो  में  मसरूफ होते  चले गए ... मैं  अपनी  पढ़ाई   में  .... और   वसु  दीदी  कामयाबी  की  ऊचाईयों  को  छूती  चली गयी, इंटर  कॉलेज  की टीचर   से  वो   प्रिंसिपल  बनी  प्रिंसिपल  से  District  Inspector Of  School  बनी  और  फिर लखनऊ   में Deputy  Director  Of  Education  की  पोस्ट  को  बाख़ूबी  संभाला  और  जुलाई  2011 को  Deputy Director  की  पोस्ट  से  रिटायर  हुई .

इतने  लम्बे  अरसे के बाद  हम  मिल रहे थे .....  यक़ीन  जानिये ,मिल कर  ये  बिल्कुल  भी नहीं  लगा  की  जैसे  हमें  15  साल  के बाद  मिल  रहे  हैं । वसु  दीदी   आयी..... आराम  से  बैठी, अपनी  तजुर्बेकार  नज़रों  से  हमारे  चहेरों  को  पढ़ती   रही ---- प्यार  से  मुस्कुराती  रही  . वो  लखनऊ  से मशहूर  चिकन  के   कुर्तो  के  रूप  में ,  हम सब  के  लिए  अपना  प्यार  समेट  कर  लाई  थी  जो  हम  सब  को   पसंद  आया , और हमने  सर  झुका कर  क़ुबूल किया  . उनके  बच्चे  और  मेरा  भाई  शैली (अली ) और  मेरी  बहन  सिम्मी  (हिना), हम  सभी  एक- दुसरे से  मिल कर  बेहद  खुश थे. 
मैंने  उनके  लिए  अच्छा  सा लंच  तैयार  किया  जिसे  हम  सब  ने  साथ  खाया  खाने के बाद  गरमा - गरम  चाय  और शेरो -शायरी  का  भी  दौर चला  जिसे   देख  कर पुराने  दिनों  की यादें  ताज़ा  हो गयी  बातो - बातो  में  ये  पता  ही  नहीं  चला  कब  तीन  घंटे  बीत  गए ..... फिछले कई  सालो का  स्टॉक था .... बातो  का ... इसलिए  दिल  किसी  का  भी  नहीं  भरा  था  न  उन लोगो का .... न ही हमारा  ....फिर  भी  उन्हें जाना था  इसलिए फिर मिलने  का  वायदा  करके  भारी  दिल  से  उन्हें  खुदा  हाफ़िज़  कहा .
कुछ  रिश्ते  ऐसे  होते  है   जिनमे  बेहद  अपना  पन  होता  है  जहां  आपकी  सोच  और  ख़याल  इतने  मिलते  होते  है,  की  आपको किसी  तसन्नो , किसी बनावट या  किसी  शो ऑफ   की  ज़रुरत  नहीं होती, कुछ  समझाने  की ज़रूरत  नहीं  होती, बिना कहे  बाते  समझ  ली  जाती हैं .
 a day with my teacher, on teacher's day
A day  with my Teacher
तब ....उस  रिश्ते  की अहमियत  और भी ज्यादा बढ़ जाती है  जब  रिश्ता एक " टीचर  और एक स्टुडेंट" का  हो मै उन   ख़ुशकिस्मत  स्टुडेंट्स  में  से एक हूँ .जिसे अपनी टीचर मिसेज़  वसुमती   अग्निहोत्री  के रूप  में  एक  ऐसा  गाइड  मिला  है , जिन्होंने  एक  रहनुमा बन  कर  मुझे  हमेशा  सही  रास्ता दिखाया  और   आगे  बढ़ने  का   हौसला  दिया .
अरशिया  ज़ैदी










15 Aug 2012

Udaan...a freedom of expression...1st Birthday

    "उड़ान "की  पहली  सालगिरह  आप  सब  को  मुबारक
उड़ान  ...a freedom of expression

आज का  दिन  मेरे लिए  बहुत  ख़ास  है  क्योकि  आज   उड़ान ....a freedom of expression  अपनी  पहली साल गिरह  मना  रहा है. पिछले  साल  आज  ही के दिन  मैंने  अपना  नज़रिया , अपने ख़यालात , और अपनी  सोच  की  उड़ान  भर  कर  आप तक पहुँचने  की एक छोटी  सी कोशिश की थी ..... ये  कोशिश  कामयाब रही......आपके  साथ  ने  मेरा ये  सफ़र  बेहद  ख़ूबसूरत  बना दिया है. 
उड़ान  के  इस  एक  साल   के  सफ़र  में   मेरा  हम सफ़र  बनने  और   मेरा साथ  देने  का बहुत-बहुत शुक्रिया .

मुझे  नहीं पता कि  मैं  सही  हूँ  या  नहीं..... जिन  मुद्दों  को  मेरे दिल ने  छुआ  ........जो  मुझे  सही  लगा  उसे मैंने  आप के साथ बांटा ...आगे  भी मेरी यही  कोशिश  होगी  की... मैं  जो लिखूं  वो  पहले से  बेहतर  हो...जब भी आप  उड़ान....a freedom of expression  पढ़े,  तो आप को  अच्छा  लगे .....दिलचस्प  लगे !!!  
अपना ख़याल  रखियेगा  
 ख़ुदा  हाफ़िज़ 
 अरशिया ज़ैदी 

                       

1 Aug 2012


     दूसरे  सफ़र  की   हसीं  शुरुवात 



   आख़िरकार  कल  उसने फैसला ले  ही लिया .... अपनी  घुटन भरी  शादी  के  रिश्ते से आज़ाद होने का ... और  छोड़ आयी सब कुछ  पीछे ..... बहुत पीछे. कल  ये  हिम्मत  दिखाई   मेरी एक बहुत प्यारी दोस्त  किरन ने... जिसने  अपनी  सात  साल  शादी  को ..ख़त्म  कर  दिया.
 हर किसी की  तरह  मुझे  भी  उसकी शादी  के टूटने  का अफ़सोस था....लेकिन इससे  कही  ज़्यादा  ख़ुश  थी  मैं  उसके लिए... और  उसके इस  फैसले से सहमत  भी  थी ... क्योकि  मैं  उसके  दर्द  की  गवाह  बनी  थी, मैंने  उसे  हर  रोज़  दिल  ही  दिल में  घुटते हुए  देखा  है..... बिना  आँसू  बहाये  रोते  हुए देखा है. 
 कल  जब  मैं  किरन  से  मिली  तो  उसे  एक लम्बे  अरसे  के  बाद   उसका  चेहरा खिला  हुआ  देखा,  उदासी  भरी  मुस्कराहट  के  बजाये  दिल  से  मुस्कुराते हुए देखा  उसे ... ऐसा लगा  जैसे  बहुत  हल्का  महसूस  कर रही  हो  वो . और   दुबारा अपनी  ख़ूबसूरत  जिंदिगी  को  नए सिरे  से शुरू  करने को  तैयार हो  .
ज़ज्बाती  तौर  पर उसे  इतना फिट  देख  कर  अच्छा लगा था मुझे . ये सच  है  की  ये  ख़ूबसूरत  जिंदिगी  हमें  बार- बार नहीं मिलती..... एक बार ही मिलती है.  और सबसे  कीमती  चीज़  होती है  वक़्त.... अगर हमने  वक़्त  रहते  अपने  रिश्तो की  अहमीयत को  नहीं   समझा  तो समझ लीजिये ... की  रिश्ते की उम्र ज्यादा  नहीं  है.
जब कोई अपनी  शादी   को ख़त्म करने का फैसला लेता है ....तो इसका  मतलब है .... की  अब  रिश्ते  के बेहतर  होने  की  कोई  उम्मीद नहीं  रह गयी है ....उसको ,क्योकि  कोई  भी ये  नहीं  चाहता की, उसकी  शादी  टूटे  या  बसा - बसाया  घर  बर्बाद  हो  जाए.अगर  किसी का  घर  ही ना बसा हो! .... रिश्ते में  महसूस  करने  के लिए कुछ  बचा  ही  न हो  तो  ऐसे  हालात में  रास्ते  अलग कर  लेना  ही बेहतर  होता है। जिस  वक़्त  भी ये अहसास   हो जाए ... की   अब  सर  से  पानी  ऊपर जाने लगा है ...और अब इससे  ज्यादा  सहना  हमें  कही का  नहीं   छोड़ेगा  तो बस  वही   थोड़ा   ठहर जाने की  ज़रुरत है  और  रुक  कर  रास्ता  बदल लेना  ही  समझदारी  है.
     आज   भी  हमारे  समाज  में  किसी  की  शादी  टूट  जाने  की  ख़बर  से  लोगो के  माथे  की त्योंरिया  चढ़  जाती  है.  और  हम  लोग  क्या  कहेंगे .... इस  डर  से... कई  बार  बेमायने  हो  चुके रिश्ते  को  ढोते  रहते  है.  अगर  आप  एक  औरत  है , तो  तरह - तरह सवाल  पूछे  जाने  लगते है ,आपके  अपनी  शादी  को  ख़त्म करने के  फैसले  को  ग़लत  ठहराया जाने  लगता  है ......लोग  अपने -अपने नज़रिए से  रिश्ते  को  दुबारा  जिंदा  करने के  तरीक़े  सुझाते  है , .आपको  अकेले पन  से भी  खौफ़  दिलाया  जाता  है ,आपको  समझाया  जाता है  की  अकेले  रह  कर जिंदिगी नहीं  कटती . बुढ़ापे  में  आपका  ख़याल कौन  रखेगा ? .
और तब एक सवाल  ज़हेन  में  बड़ी  शिद्दत  से  उभरता है  की  अगर  शादी  के बाद  भी  आप बेहद   तन्हा महसूस  करते  हो, उसके साथ होने के   बावजूद  भी  आपको ज़ज्बाती  तौर पर  ये न  महसूस हो सके ... की आपका  हम सफ़र  आप के साथ  है .... तब  उसका  क्या ?. 
क़ब्र  का हाल  तो मुर्दा  ही जानता है  इसलिए तब बिना  confuse  हुए  ये सोचना  होता है  की  अगर हमने  अपने  बारे  में कम  और  लोगो के बारे में  ज्यादा सोचा  तो  हम  अपने दर्द  से कभी  बाहर  नहीं  निकल  पायेंगे .

जब  हम  ज़ज्बाती   तौर  पर  बुरे  दौर से  गुज़र  रहे  होते   है ..तो कई बार  दिलो  दिमाग में  एक अजीब  सी  कशमकश  चलती रहती है .... जिससे  निकलना  अपने आप में एक  challenge   होता  है .आपके  हालात  के बारे में आपसे ज्यादा  बेह्तर कोई  और नहीं जान सकता. इसलिए  फैसला  भी आपको ही करना  होगा . हमें  इस  बात  को  भी  समझना  होगा  की  हमारे  दर्द  में  होने  पर  लोग  हमसे  हमदर्दी तो रख  सकते है .... पर  हमारा  दर्द  नहीं  बाँट सकते....अपने  हिस्से  का दर्द  हमें  ही  सहना  है  इसलिए बेह्तर है ... थोडा  सा अपने बारे  में  सोचते  हुए ..... हम  वो करे जिस के लिए  हमारा  दिल  और ज़मीर गवाही  देता है .
जिंदिगी  बेहद   ख़ूबसूरत  है  बस एक मकसद ... एक मायने मिलने की देर होती है ... जिस  दिन जिंदिगी  का  मक़सद मिल  जाता है ...वही से बात बननी शुरू हो जाती है.  और  तब हमें  जिंदिगी  बहुत सारे  मौकों पर  सच्ची  ख़ुशी  का अहसास  कराती है 
 जिंदिगी ना मिलेगी  दोबारा .....   ये  चार लफ्जों की  छोटी सी लाइन  मुझे बहुत  पसंद  है  देखा  जाये  तो  इसमें  जिंदिगी का  हसीन सच  छुपा है जो  हमें  बताता  है  की  जिंदिगी  सिर्फ  एक  बार  ही  मिलती  है  जिसे  हमें  भरपूर  जीना  चाहिए  नहीं  तो   इसी पछतावे  में  उम्र गुज़र जाएगी....की ."काश  हमने  अपनी जिंदिगी  को  पहले ही जीना  सीख  लिया होता". हमें  पहले अपने -आप को खुश रखना  सीखना  होगा  तब जाकर  हम  दूसरो को  ख़ुशी दे पायेंगे.

मैंने  कही  पढ़ा था  और शिद्दत  से  ये महसूस भी किया है  की  अगर  हम  किसी के लिए अपने दिल में  कड़वाहट और गुस्सा रखते है.... तो  उसका सबसे ज्यादा  बुरा  असर हम  पर पड़ता है... हम  अंदर  ही  अंदर  जलते  रहते है  और  गुस्से और  नाराजगी  की  ये  आग  अगले  बन्दे  को बाद   में जलाती है  ... पहले आप जल जाते है .इसलिए  जिन्होंने  आपको  चोट  पहुचाई  ..... आपका बुरा किया...  उन्हें  माफ़ कर दे... उनके लिए अपने दिल में कोई  कड़वाहट  न  रखें , उनकी बेहतरी  के लिए  दुआ  करे और  उनके  बारे  में  अच्छा ही  सोचे. तब आप  देखिये ... आपके  दिल  को  कितना  सुकून मिलेगा और  कितनी  अच्छी  नींद आएगी.
यक़ीन  कीजिये  यही  से  आपकी  जिंदिगी  का  अगला  बेहद  हसीं  सफ़र शुरू होगा ....जिसका लुत्फ़  आप  हर लम्हा  उठा  सकेंगे  .
अरशिया ज़ैदी  
 

15 Jul 2012

Bheege Bheege Mausam Me Main Aur Meri Pari

           भीगे-भीगे  मौसम में ....मैं  और मेरी परी


 beege beege mausum me main aur meri pari
      


आज  सुबह  मैं  अपनी तीन साल की  भतीजी परी को बालकॉनी  में लिए खड़ी थी. छोटी सी बच्ची गर्मी  से बहुत परेशान  हो रही थी ... अचानक मौसम  का मिज़ाज  ख़ुशनुमा होने  लगा. गर्मी से राहत मिलने के आसार नज़र  लगे .... ठंडी -ठंडी हवाएं  चलने  लगी ,  नीले  आसमान  को  काले- काले  बादल  बड़ी तेज़ी  से ढकने लगे थे . 
beege beege mausam me main aur meri paribeege beege mausam me main aur meri pariकुछ देर  पहले गर्मी से परेशान  परी अब मुस्कुराने लगी थी ..... हवा  उसके बालो से खेल  रही थी ... उसने  अपनी आखें  बंद कर  रखी  थी और   वो  अपनी छोटी- छोटी  बाहें  हवा  में  फैलाकर  अपने आप को बारिश  में भिगोने  की  कोशिश  कर  रही थी.  मेरी  नज़रे  उस  पर जा कर  ठहर  गईं थी . ये नटखट शैतान लड़की  इस वक़्त बेहद   मासूम  लग रही थी.
इस  नन्ही परी को  भीगने  का बेहद  शौक  है  ... अक्सर  मैंने  उसे  अपने  दादा  से  कहते हुए  सुना  है  अददा ....हमें भिगोइए   हमें भिगोइए- . अब  तो सच-मुच  बारिश   की मोटी  मोटी  बूदें  हम दोनों  को  भिगोने  लगी थी .
बारिश  का खुश नुमा मौसम  है ही ऐसा ...जो  सबको मस्ती  में शराबोर कर दे . भीगना मुझे  भी  बेहद पसंद  है ...और अब  हम  दोनों  फूफी-भतीजी  पूरी तरह  मस्ती  करना  चाहते थे. 
लिहाज़ा  हम  छत  पर चले  लगे .... छत  पर से  नज़ारा और भी  ज्यादा ख़ूबसूरत  दिख  रहा था .....  बारिश  इतनी  तेज हो रही थी  की  दूर  दूर तक  धुंद  ही धुंद  नज़र  आ रहा था ....हम दोनों  बारिश के पानी में   नहाये जा  रहे थे . ... खूब  शोर  मचा  रहे थे... खेल रहे थे.
 वो  मुहं  पर हाथ  रख कर  कभी  खिलखिला  कर  हंस  पड़ती, तो कभी मेरी गोद में  चढ़ जाती  और कस  के चिपट जाती  ..... उसको  इस तरह  हँसता - खिलखिलाता  देख कर  ऐसा लग रहा था की सारी कायनात  मुस्कुरा रही  हो.
beege beege mausam mein main aur meri pariमैं  उन ख़ूबसूरत लम्हों को  पूरी  तरह जी रही थी और कुछ वक़्त के लिए अपनी  ज़िन्दिगी की उलझने और परेशानियो  को भूल गयी थी. हम अक्सर  बड़ी बड़ी खुशियों को हासिल करने के चक्कर में  छोटी छोटी खुशियों की  अहमियत  को नहीं समझ  पाते...और  सुनहरे  लम्हों को खो देते है.   
 जिंदिगी  हमें  ऐसे अनगिनत  ख़ूबसूरत  लम्हों से नवाज़ती  है जो हमारी रूह को भी सुकून पंहुचा देते  हैं .ये  ख़ूबसूरत  लम्हा उन्ही  लम्हों  में से एक था....  जिसे मैंने भरपूर जिया.

अरशिया  ज़ैदी  


 













29 Jun 2012

Poem- Peshani


                पेशानी

आज सुबह  जब मैंने अपनी  पलकें खोली 
उसने  झांक के देखा  मेरी  आखों  में 
और  कहा   चुपके  से मेरे कानो में.

aaj  subah jab maine apni palkein  kholi
 usne jhaak ke dekha meri aakhon mein 
 aur kha chupke se mere kano mein 

क्यों  चेहरे  पे  हैं  इतने  दर्द के  साए 
होटों  की मुस्कान  है जैसे खोयी सी 
मैंने कहा..... ख़फा  हूँ अपने माज़ी से.

 kyon  chehre pe hain itne dard  ke saye 
 honto ki muskaan hain jaise khoyee see
Maine kaha .... khapha hoon apne maazi se 

उसने मुझे  बाहों  में अपनी भर  लिया 
और प्यार से पेशानी को मेरी  चूम लिया 
मैं  हूँ ना .....माँ ने  ख़ामोशी से  कहा .

usne mujhe bhaoon mein apni bhar liya
 aur pyaar  se peshani ko meri choom liya
 main hoon  na ..... maa ne khamoshi se kha 

अरशिया  ज़ैदी (Arshia Zaidi)


15 Jun 2012

Shikast ke Phayede


                                                      शिकस्त के फायदे 


हाल  में  ही  मुझे हैरी पौटर सिरीज़ से, ....दुनिया  के नौजवान  बच्चो  के बीच अपनी  ख़ास  जगह  बना लेने वाली जे .के रौलिंग  की जिंदिगी के कुछ अनछुए पहलुओ को पढने   का मौका  मिला...... बहुत  अच्छा  लगा  साथ  ही  इस  बात  का  अहसास  भी बड़ी  शिद्दत  से   हुआ .... की  जिंदिगी  में  कुछ  भी मुफ्त  में  हासिल नहीं   होता ..... बड़े  सख्त  और  मुश्किल  हालात  से  भी गुज़रना  पड़ सकता  है  जिंदिगी  की जंग   जीतने के लिए .....जैसे -जैसे  मैं  उनके  बारे  में  पढ़ती  जा  रही थी ......वैसे -वैसे  मुझे  अपने  अंदर  एक   excitement  महसूस  होता  जा रहा  था ......... सोचा  की क्यों  न  आप  सब  के  साथ,  उनकी सोच ... उनका नज़रिया  शेयर  किया  जाए  !.

 जैसा  की  हम  सब  जानते  है ....  मशहूर ब्रिटिश  राइटर जे . के रौलिंग   उस  हस्ती  का   नाम  है .... जिन्होंने  हैरी पौटर  सिरीज़ लिख  कर  पूरी दुनिया  के नौजवान बच्चो को अपना दीवाना  बना रखा है .अब तक हैरी पौटर सिरीज़ 67 भाषाओ   में translate  की जा चुकी  है. 

कामयाबी  की ये  दास्ताँ  सुन  कर  कितना  अच्छा  लगता  है  ना ...! लेकिन  हमारे  लिए यहाँ  इस  बात  को  समझना  बेहद ज़रूरी  है  की  ये  ऊचाईयां  उन्हें  रातो -रात  हासिल नहीं  हुई है, .......उन्हें तमाम  ऊचें - नीचें  रास्तो  से  गुज़ारना पड़ा  तब जाकर  उन्हें  ये कामयाबी मिल सकी.

उनका  मानना  है  की हर  इंसान  की  जिंदिगी  में  एक ऐसा  वक़्त  आता  है ....जब  उसे  शिकस्त  का सामना करना  पड़ता  है ..... . चाहे  किसी के  पास  कितना भी  पैसा  हो , बड़ी - से  बड़ी  डिग्रीयां  हो  या  कितना  भी अच्छा करियर  क्यों न  जा रहा हो. 

ऐसा  ही  एक  दौर  उनकी  जिंदिगी  में तब  आया, जब  उनकी  शादी  टूट रही थी , उनके  ऊपर एक  बेटी की ज़िम्मेदारी थी, रहने के लिए अपना घर नहीं  था ,वो एकदम  बेरोजगार  और  अकेली थी . उस वक़्त  उन्हें  लगा था  की  वो अपनी जिंदिगी  की सबसे  बड़ी शिक़स्त  का  सामना कर  रहीं  है .
लेकिन  उस  मुश्किल  वक़्त  में   भी...... नाकामी  और  शिक़स्त  उनके  लिए  क्या  मायने रखती है.... ये  तय करने  का  हक़  उन्होंने  अपने  पास ही रखा .... हांलाकि   लोगो ने  उन  पर  अपने  -अपने नज़रिए से   शिकस्त  के  मायने   थोपने की  कोशिश  ज़रूर  की, लेकिन  उन्होंने   किसी  की बात  का कोई  असर  नहीं  लिया ... लोगो  की बातो  से बिना  confuse  हुए  हार  की अहमियत   को  समझा  .... और दिलचस्प  बात ये है.... उन्हें  अपनी जिंदिगी की  सबसे  बड़ी हार  में भी  बेशुमार फायदे  नज़र  आये. 

अपनी  हार  में पहला  फायदा  उन्हें  ये   नज़र  आया  की  वो ज़मीनी हकीक़त  से रूबरू   हुई .... उन्होंने  इस सच्चाई  को  क़ुबूल  किया की उनकी  शादी-शुदा  जिंदिगी खुशहाल  नहीं थी...इसलिए उनकी  शादी  का टूट जाना ही  बेहतर था. और  उसके  बाद  उन्होंने  कभी   पीछे मुड़  कर  नहीं देखा ... और अपनी  सारी  energy अपने  काम में लगा दी ... उन्होंने  वो करने  की ठानी जो वो  हमेशा  से करना  चाहती थी .... और  यही  वो  लम्हा  था जब उनके  दिल के सारे  डर   निकल  गए .....उनके  पास उनकी  बेटी  थी जिसे  वो बेहद प्यार करती थी.... एक  अपना  टाइप  राइटर था ... जिसकी  मदद से उन्होंने  दिमाग़  में  आये  एक  शानदार  आईडिया... को  पन्नो  पर उतारना  शुरू कर  दिया... और  तब उन्हें    अपनी  इस  खूबी  का अहसास  हुआ  की  की उनके  अंदर  शिद्दत  से  अपना  काम करने  की  सच्ची लगन है , discipline  है...   और वक़्त  की   कीमत   का  अहसास  है .

दूसरा, उन्हें  इस  बात  का  भी  अहसास  हुआ  की  उनके पास  फॅमिली  और  अच्छे  दोस्तों  का  ज़बरदस्त  moral  support  है जिसकी  वजह  से  उस बुरे  दौर में   भी उनका  आत्म विश्वास  कभी नहीं डगमगाया  और  वो  अच्छे  से अच्छा  काम  करती  रहीं .


उनका  कहना  है -
"हार  हमें   खुद  को  पहचान  पाने  का  सुनहरा  मौक़ा  देती है..... इसलिए   जब - जब जिंदिगी  में  हार का सामना  करना पड़े  तब  घबराएं  नहीं  और  अपने  अंदर  झाँक कर  अपनी  असली  ताक़त  को पहचाने  और उसका  भरपूर  फायदा  उठाएं." 
 अरशिया  ज़ैदी 






   


 


     


  

4 Jun 2012

lakkerein

          लकीरें 
आज हाथ की लकीरों को 
देखा ये सोच कर मैंने 
शायद  खुशियों  का हुजूम 
कही, मेरे लियें छुपा हो 

aaj  hath ki lakero ko 
dekha ye soch kar maine 
shayad khushiyon ka hujoom
 kahin mere liye chupa  ho.


तन्हा  सी  जिंदिगी में 
ठहरा सा  हो कोई रिश्ता 
अपना लगे जो मुझ को 
हर ग़म  में और ख़ुशी में

 tanha se zindigi mein 
 tehra sa ho koi rishta
 apna lage jo mujh ko 
 har gum mein aur khushi mein 

एक  अनजानी सी तलाश 
बरसो से रही है मुझ को 
शायद किसी सुबह 
मेरे दरवाज़े पे खड़ी हो 

Ek anjani se talash 
barson se rahi hai mujhko
sayad kisi subah 
 mere darwaze pe khadi ho 

अरशिया  ज़ैदी( Arshia zaidi)

27 May 2012

satya mave jayate....ek aam aadmi ka show

       सत्य मेव जयते...एक आम आदमी  का टॉक  शो 
                          
आज  सन्डे  है  दिन  के 9 बज  रहे  है ... और  मुझे दिन  के 11 बजने का इन्तिज़ार है दिन  के 11 बजे ....यानी  आमिर खान के साथ " सत्य मेव जयते " देखने का वक़्त...जिसका  मुझे  बेचैनी  से इन्तिज़ार है.....सोच  रही हूँ  की आज  आमिर  खान  किस   मुद्दे  पर  अपने टॉक  शो में   बात   करेंगे  

एक  लम्बे  अरसे के बाद  ऐसा  रिअलिटी  शो आया है जो  ऐसे  सामाजिक  मुद्दो  और समस्याओ   पर   बात  करता है ...जो  आम     आदमी की  जिंदिगी  पर  सीधा  असर डालते  है ... और कही न  कही .....  हम  सब  की  जिंदिगी  से  ताल्लुक़   रखते  है.  ये  शो लोगो  को एक  नयी   उम्मीद .... नया हौसला  दे रहा है .  
  सत्य  मेव  जयते  को देख  कर लगता है  जैसे  वो  ज़माना  वापस  आ  गया हो ,जब  इतवार  को  दिन  के 11 बजे,  पूरा  घर  एक  साथ  बैठ  महाभारत  और  रामायण  टी वी  सीरियल  देखा  करता  था. तेलगु , कन्नड़ ,बंगाली , मलयालम  जैसी  दूसरी हिन्दुस्तानी भाषाओ   में  डब  किया गया ये  पहला  ऐसा  हिंदी  रिअलिटी शो है जो  प्राइवेट  चैनल  के साथ - साथ  दूर दर्शन  पर  भी  इतवार 11 बजे ही   दिखाया  जा रहा  है. ताकी उसे   भारत   के  सभी  भाषाएँ बोलने और समझने वालो  तक  पहुचाया  जा  सके.

आमिर खान  जो काम  भी करते है ... वो "ज़रा हट के "होता है ... ये एक  बार  फिर उन्होंने  साबित   कर   दिखाया  है .सत्य जीत  भटकल  के  निर्देशन  में Amir khan Production Company  ने  इस  सीरियल  को  बनाया  है. जिसमे  आमिर खान  ने  अपनी  स्टार  पॉवर  का इस्तेमाल  करके समाज  के कुछ  ऐसे अहम  अनछुए  मुद्दों और  समस्याओं पर रौशनी डालने की कामयाब  कोशिश  की है  जिन के  बारे  में  गहराई से सोचने और  उनका हल  .... निकालने की ज़रुरत है। 
पिछले तीन एपीसोड़ में आमिर  खान  ने  जो  topic  चुने  और जिस  तरह  उन्हें positive  approach के  साथ  conduct किया  वो क़बीले तारीफ़  है...  
6  मई  20 12 को  सत्य  मेव  जयते  के  पहले एपीसोड़  में हिन्दुस्तान  में  तेज़ी  से हो रहे  female  foeticide   की  शिकार  औरतो  की  आप -बीती  हम  तक  पहुचाई गयी . 
और  sting operation (2005)  करने  वाले   पत्रकार  श्रीपाल  शेक्तावत  और मीना  शर्मा  की  बहादुरी  को   ना  सिर्फ    सराहा  गया ....बल्कि  सात  साल  से  लटके  उनके  sting operation  केस  को  फास्ट  ट्रैक  पर चलाने  की गुजारिश  भी  की  गयी... जिसे   राजिस्थान  के मु ख्य  मंत्री अशोक  गहलोत  ने  मान  लिया 
Female  foeticide   के  खिलाफ  छिड़ी  इस  मुहीम का  अच्छा  असर  देश   के कई  शहरों  में  देखने  को  मिला, बड़ी तादाद   में ऐसे maternity और sonography  clinics  के  licenses  रद्द   कर   किये  जा रहे है जहां Female foeticide के  केस   हो रहे थे.
सत्य मेव  जयते  के  दूसरे  एपीसोड  में  आमिर  खान  ने एक  ऐसे  नाज़ुक  मुद्दे को  छुआ  जिसे  हम  child  sexual  abuse  कहते है, जिसके  बारे में   लोग   आज  भी  बात  करने से  कतराते  है .
इस   एपीसोड़े में  सिंड्रेला प्रकाश , हरीश  अय्येर   जैसे  victim से मुलाक़ात  करवाई गयी, जिन का  बचपन child  sex  abuse के खौफ़  नाक  अँधेरे  में  कहीं  गुम  हो गया था.  
आखें  खोलने  वाले  इस  एपीसोड़  ने   आम  लोगो को  child  sex  abuse के  बारे  न  सिर्फ  alert  रहने  की  सीख   दी  बल्कि उन्हें  इस  सच्चाई  से  भी वाकिफ  कराया  ... की  करीबी  दोस्त  और  रिश्तेदारो  पर  भी नज़र रखना  ज़रूरी है क्योकि  ज़्यादा तर  दोस्त और रिश्तेदार ही ऐसा कर बैठते है  इसके  अलावा आमिर  खान  ने  बच्चो  को  sex abuse  से
बचाने के लिए  एक  वर्क-शॉप   की
और  उन्हें  good touch / bad touch 
 का  फर्क  समझाया  ताकी  बच्चे  खुद को  sex abuse से बचा सके .
इस  एपीसोड़ ने  वो कर  दिखाया ,जो अब तक  नहीं हो सका था. हाल  में ही लम्बे वक़्त  से संसद में रुका हुआ  Protection of children  against sexual offences bill  पास  हो  गया है  जो  वाक़ई  बेहद  ख़ुशी  की  बात  है ,गौर  तलब  बात  ये है की  अब  तक, हमारे देश  में sex  abuse  को लेकर कोई  कानून  नहीं  था.
अब  लोग खुल  कर रेडियो और  मीडिया  में  child  sex  abuse के बारे  में बात  करने लगे है .बच्चो की  हेल्प  लाइन  और NGO  के  पास  भी अब बड़ी तादाद  में  मदद के लिए  फ़ोन  आ  रहे है 
त्य  मेव जयते  के   तीसरे  एपीसोड़  में  आमिर  खान ने दहेज़  के side effect को  आम  जनता तक पहुचाया....... लेकिन   कुछ   अलग  अंदाज़ से ...   
उन्होंने  अपने शो में  रानी त्रिपाठी  जैसी   लडकियों  को  बुलाया जिन्होंने "लोग  क्या  कहेंगे " इस  बात  की परवाह  न  करते हुए दहेज़  के  खिलाफ   अपने  सुसराल  वालो  की dowry demands को रिकॉर्ड  करके  मीडिया  और पब्लिक  के सामने ला खड़ा किया, जिसमे  उनके घर वालो ने उनका पूरा साथ  दिया .
आमिर खान  ने  अँधेरे में  रौशनी की  किरण  दिखाते  हुए .. बुरहान  पुर के  "तंज़ीम  खुद्दाम  ए   मिल्लत "  कॉमुनिटी के  मौसिम  उम्मीदी से  मुलाक़ात  करवायी  जो  अपने   शहर  बुरहानपुर में  नो  बैंड... नो  बाजा  ... नो बरात  का  तरीका  अमल  में लाते  हुए बिना दहेज़  और  लेन -देन के, सादगी से  शादियाँ  करवा रहे है ....  उनसे  inspire  होकर  उनका पूरा शहर  इस  तरीके  को  अपना  रहा   है. 
आमिर खान के  जादुई  पिटारे में  और क्या क्या है,  ये  हर नये  एपीसोड़ में पता  चलता  रहेगा   ... उम्मीद है  की  सत्य मेव जयते का हर एपीसोड़  लोगो  की  किसी  न   किसी   उलझन  को सुलझाएगा..... जीने की  राह  दिखायेगा. और  लोगो  को  कुछ  अच्छा करने की inspiration  देता रहेगा      
   अरशिया  ज़ैदी   













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10 May 2012

100 saal ki jawaan ....ZOHRA SEHGAL

                 100 साल की  जवान ......जोहरा सहगल 

"अभी  ना जाओ छोड़  कर,  
  के  दिल अभी  भरा नहीं .....
  के केक अभी कटा नहीं ....".ये  लाइने  गुनगुना रही थी मशहूर  थिऐटर  और  फिल्म  एक्टर  जोहरा सहगल..... अपनी 100 वी  साल गिरह  पर एक  बड़ा  सा  केक   काटते  हुए.
27 अप्रैल 1912 को उत्तर  प्रदेश  के  रामपुर  जिले  में  पैदा  हुई  और  सहारन पुर के  रूहेला पठान  ज़मीदार  खानदान  से ताल्लुक़  रखने वाली  जोहरा  सहगल बीती 27 अप्रैल को 100 साल की हो गयी.उनका ज़िक्र आते ही ऐसी  खुश मिज़ाज,अल्ल्हड़ , नटखट  और बिंदास   बुज़ुर्ग  अदा कारा  का चेहरा सामने आता है  जो अपनी  बेमिसाल   एक्टिंग  के लिए तो जानी ही जाती है....  साथ  ही जानी जाती है  जिंदिगी  के लिए अपने जोश  और प्यार  के  लिए .

एक  एक्टर  बनने  के लिए,उन्होंने अपने अंकल  के साथ ,इंग लैंड  तक  का  सफ़र सड़क  के रास्ते,अफगानिस्तान  और इरान  होते  हुए  तय  किया था .जोहरा ने अपने  लम्बे करियर में  Indian People's Theatre और प्रथ्वी राज थिएटर  के साथ  14 साल  तक काम  किया,और आठ  साल  तक  अपने गुरु  उदय  शंकर से   डांस  क्लासेस  ली.फिल्मो में उनका  करियर  धरती के लाल  से  शुरू  हुआ   ....Bhaji on the beach (1992) हम  दिल  दे चुके  सनम , Bend it like Beckham (2002),दिल  से ...(1998),चीनी कम  और  सावरियां उनकी  यादगार  फिल्में हैं   
इसके अलावा  छोटे परदे  पर The Jewel in the crown,(1984),Tandoori Nights (1985-87),Amma & Family(1996) जैसे  मशहूर  टी वी  सीरियल स  में  भी अपने काम से लोगो  के दिलो  पर  अपनी  छाप  छोड़ने  में  कामयाब  रही.

जोहरा  नास्तिक  ख़यालात  की  रही है.ख़ुदा  में  यकीन  न  रखने  वाली जोहरा  ने  जब  मजहब  और जात -पात  से ऊपर उठ  कर अपने से  8 साल  जूनियर .... 'साइंटिस्ट ,डांसर  और  पेंटर'  कामेश्वर  नाथ  सहगल  से  शादी  का  फैसला  किया  तो शुरू  में  माँ - बाप की  रज़ा मंदी  नहीं  मिली  लेकिन  कुछ  वक़्त  के बाद  वो मान  गए  और उन्होंने  शादी  की इज़ाज़त  दे दी. 14  अगस्त  1942 को  उन्होंने  कामेश्वर  नाथ  सहगल  से  शादी कर ली .उनकी शादी के  reception  में  पंडित  जवाहर  लाल  नेहरु  भी शामिल  होने वाले  थे  लेकिन  उन्ही दिनों 'भारत  छोड़ो  आन्दोलन'  में  महात्मा गाँधी  का  साथ  देने  की वजह से  उन्हें  कुछ  दिनों के लिए  गिरफ्तार   कर  लिया और  वो  जोहरा  की  शादी में शामिल   नही  हो सके  थे .

जोहरा  की शख़्सियत  शुरू से ही  रोबदार  और  दूसरो पर  धोंस  जमाने  वाली  थी.1945 में जब वो और  उनकी  बहन  उज़रा  साथ -साथ  प्रथ्वी  थियेटर  में काम  कर रही थी  तो वो  अक्सर ओपरा हाउस  का एक  कोना पकड़  लिया  करती .... और फिर  किसी की मजाल ....की कोई उनका  छोटा सा भी  मेंकअप  का सामान  ले  सके.... यहाँ तक  की छोटी  बहन उज़रा  भी  नहीं ... हालांकि,सब उनकी बेहद  इज्ज़त  करते  थे  और  उनका  मुकाम  बहुत ऊंचा था फिर भी उन्हें .... ये लगता था की उज़रा बेहद गोरी और हसीन  है इसलिए सब उसे ज्यादा प्यार करते है.

वो खूबसूरत  दिखने  और  लोगो  का ध्यान  अपनी  तरफ  खींचने  के लिए  काफी  मशक्कत   करती.....और  उनकी ये चाहत  आज  भी  बरक़रार है . 
"आज  भी वो एक  ऐसी  खूबसूरत  औरत  दिखने की  ख़्वाहिश  अपने दिल में रखती है.जो अंग्रेजो  की तरह  बेहद  गोरी  हो और  जिसकी  आखों का रंग  नीला हो ." 
उनकी जिंदिगी तब थम सी गयी, जब 1959 में उनके शोहर कामेश्वर  सहगल  ने, हमेशा  के लिए  अपनी  आँखें  बंद  कर ली ...और  बेटी किरण   सहगल  और बेटा पवन  सहगल  की  ज़िम्मेदारी अकेली जोहरा सहगल  पर आ गयी.अपनी इस  ज़िम्मेदारी  को  भी उन्होंने  बखूबी निभाया और  बच्चो  की  बेहेतरीन   परवरिश  की .  


जिंदिगी के  उतार - चढाव  उन्हें  कभी हरा  नहीं  पाए  उन्होंने .... अपने  अंदर की  आग  को जलाये  रखा .... बस  आगे चलती गयी ... कभी पीछे  मुड़  कर नहीं  देखा ,अपनी Creativity को बरक़रार रखते  हुए  हमेशा  कुछ  नया ... कुछ  अच्छा  करती गयी .जिसके लिए उन्हें अब तक  पद्म श्री(1998),काली दास  सम्मान ,(2001) जैसे  बड़े खिताबो से नवाज़ा  जा चुका  है.2004  में संगीत  नाटक  अकादमी से  उन्हें Life time achievements  के लिए  fellow ship  दी गयी और  2010  में  पदम् विभूषण  सम्मान  दिया  गया. 
जोहरा  सहगल  की बेटी  किरण  सहगल  ने  अपनी माँ की 100 वी साल  गिरह  पर  पहली Biography "जोहरा सहगल  फैटी"  निकाली  है जिसमे  उन्होंने  जोहरा सहगल   की जिंदिगी के  अन छुये पहलुओं पर  रौशनी  डाली है और  ख़ास तौर  पर "फैटी "लव्ज़  इसलिए  इस्तेमाल  किया है  क्योंकि  उनकी  माँ  अपने  वज़न  को लेकर आज भी  ऐसे ही ऐतिहात  बरतती  हैं ..... जैसे 16 साल  की लड़की ... हर हफ्ते अपना वज़न  तौलने वाली जोहरा सहगल  को अगर ज़रा सा भी  अपना वज़न  बढ़ा हुआ   लगता है,तो वो  फौर न अपनी diet  कम  कर  देती  हैं और दो टोस्ट के बजाये एक टोस्ट  ही लेना  पसंद करती  है. 
जोहरा सहगल वक़्त की बड़ी पाबंद हैं और अपनी घडी को पांच  मिनट  आगे रखती  हैं .....शायद  इसी लिए  वो वक़्त  से  कही आगे हैं, उन्होंने  उम्र  को अपने  ऊपर  कभी  हावी  नहीं होने  दिया....  और  आज  भी मस्ती में गुनगुनाती  हैं .. "अभी तो मैं जवान हूँ ...अभी तो मैं जवान  हूँ " 
अरशिया   ज़ैदी  
    

  












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