29 Dec 2012

A tribute to her............

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                     बुझती  आखों  का सुलगता  पैग़ाम 


 गैंग  रेप  के हादसे  की  शिकार   वो   मासूम लड़की  आज  12 दिन  के  बाद ज़िन्दिगी  की  लड़ाई  हार गयी  और  सिंगापुर   के  माउंट   एलिज़ाबेथ  अस्पताल  में  उसने  दम  तोड़  दिया। सुबह -सुबह  मिली  इस खबर ने  पूरे  देश को  हिला कर   रख दिया  है ....  आज  हर  हिन्दुस्तानी की  आखों में आँसू  है. इस वक़्त  ऐसा लग रहा  है  की  जैसे हर  घर  से एक बेटी,  एक  लड़की  की मौत  हुई है .....  
होश में आते  ही  उसने  अपनी  माँ  से  एक ही सवाल  पूछा  था ...... क्या  उन दरिंदो को  सज़ा  मिली ?   इस  हादसे  के बाद  मौत  से जूझते हुए शायद  कुछ  ऐसे  जज़्बात  रहे होंगे.......


नक़ाब  चहेरो  से  ए  ज़ालिमो  उठाऊंगी 

दरिंदगी  की  कहानी  भी  मैं   सुनाउंगी.

मैं  हिन्दुस्तान  की  बेटी  हूँ,  इसलिए सुन लो 
मैं  बुझती  आखों  से  भी  इंकलाब  लाउंगी .

तुम्हारी  सोंच  को  लोगो  बदल  भी  सकती हूँ 

मैं  इस  समाज  में  गिर  कर  संभल  भी  सकती  हूँ .

तुम्हें  भी न्याय  मिले  इसलिए  मेरी  बहनों 

मैं  मर  के  देश  की सूरत  बदल  भी  सकती हूँ. (Written by  Mr. Hilal Ali Zaidi)
अरशिया  ज़ैदी 

22 Dec 2012

insaaf ka intizaar


                                   इंसाफ  का इन्तिज़ार 

फिछले  हफ्ते  वो  गैंग  रेप  का शिकार हुई  और अब  हॉस्पिटल में  जिंदगी  और मौत  के बीच जंग  लड़  रही  हैबेहद  तकलीफ़  में  है ,उसके पेट और चेहरे पर  गहरी  चोटे आयी  है .पाँच सर्जरी के बाद भी  उसकी हालत नाज़ुक  बनी  हुई  है। 
उसे  और उसके दोस्त  की बहादुरी  को  हमारा  सलाम  जिन्होंने  आख़िर  तक  उन  हैवानों  का मुक़ाबला  किया। आज  उनके  साथ  हुई  हैवानियत   के  खिलाफ   पूरा  देश  उनके  साथ  खड़ा है , इंडिया  गेट , राज पथ ....पर  हज़ारों  की  भीड़   इकठ्ठा  होकर  उनके  लिए  इंसाफ मांग रही हैं    
सब  उसके  ठीक  होने  के लिए  दुआ  कर रहे है ,.....   वो एक  fighter  है,  ठीक  होकर  इज्ज़त और  शान  के  साथ  अपनी ज़िन्दगी  जियेगी.....उसकी  ज़िन्दिगी  पहले से ज़्यादा  ख़ूबसूरत  और  कामयाब हो .... यही  हम सब की दुआ है .
जो  उसके  साथ हुआ  वो बेहद  दर्द नाक  और दिल को हिला  देने वाला हादसा  है, जिसके  लिए कोई  सज़ा  काफी  नहीं . ऐसे   गुनाहगारों  को  हर  दिन  तिल - तिल   मरने की सजा मिलनी   चाहिए. इन्हें इस  लायक  ही  नहीं  छोड़ना चाहिए  की  ये  फिर  किसी  लड़की  से sexual relationship  बना  सकें। इनको  मिलने  वाली सज़ा  इतनी दर्द  नाक होनी  चाहिए  जो  लोगो  को  हिला  कर  रख  दे  और एक ऐसा डर  पैदा  कर  दे  की  कोई भी  ऐसी   हरक़त  करने   की सोंच  भी न सके . जब तक लोगो के अंदर  डर  नहीं होगा ....  ऐसे क्राइम   बार  - बार  होते रहेंगे  और  गुनाह गार  बेखौफ़  होकर सड़को  पर  घूमते  रहेंगे 

 सबसे   बड़ी  कमी  तो हमारे   सिस्टम की  है  जिसमे  सरकार , प्रशाशन  और  पुलिस   जो  अपनी   ज़िम्मेदारी  ठीक  से  नहीं  निभाते .... और पब्लिक  की  हिफाज़त  करने में पूरी तरह  नाकाम है .     वही  हमारी  सोंच  भी  कोई  कम ज़िम्मेदार  नहीं  है क्योकि  हम हर हाल  में  औरत को  ही  दोष  देते  है , उसकी  ही  ग़लती  निकालते है .... रेप  केस  में   हादसे  की शिकार   लड़की को  बेहद  insensitivity  से  डील  करते  है।..... जैसे  गुनहागार  वो  लड़की  ही हो . यहाँ  हमें भी   अपनी  सोंच बदल कर  ऐसे केस  में  औरतों  के साथ बेहद प्यार, इज्ज़त और हमदर्दी  भरा  सुलूक  करने  की  ज़रुरत  है .... ताकी वो  जल्दी  से  जल्दी उस trauma से बाहर  आ  सकें 
 ये  पहला  रेप  केस  है  जिस  पर  इतनी  तवज्जो  दी जा रही है..... औरतो  की हिफाज़त  के  लिए ठोस   क़दम  और  कड़े  कानून बनाने  की  बात  चल रही है .....( काश  अमल भी हो !)..अब  देखना  ये  है  की अमल  कैसे  और  कितना  किया जाता है  जिससे   देश  भर  की  लडकियां  महफूज़  हो  सकें  और बेफिक्र  होकर ... बिना किसी  डर  के सड़को  पर निकल  सकें .
अरशिया  ज़ैदी







11 Dec 2012

aage bhi jaane na tu peeche bhi jaane na tu

        
आगे भी  जाने  न   तू , पीछे भी जाने न तू .....
  जो  भी  है  ....बस  यही  एक पल है...

कितनी  बड़ी सच्चाई   छुपी है  फ़िल्म  वक़्त  के  इस  गीत में , जिसे साहिर  लुधियानवी  ने  फिल्म  वक़्त के लिए 1965 में लिखा था. ये सदा बहार  गीत  हर दौर  में  जीने  का  सही  तरीक़ा  बताता  है।

अपने  आस -पास  नज़र  दौड़ाइए  आपको ऐसे   कई लोग दिख जायेंगे  जो  हर  पल  अपनी  ज़िंदगी  में   ताज़गी   और  नएपन  को बरक़रार रखते  हुए , नई- नई  activities  करते  रहते है,  अपने  अंदर  कुछ न  कुछ  नया  शौक़  तलाश  कर  उन्हें  पूरा  करते रहते  है  और  ख़ुश  रहने  की वजह  ढूँढ  लेते  हैं। 

हर  दिन  अपने अंदर  कुछ  नया  ढूँढने  का  नाम  ही तो  है..... ज़िंदगी . बहते  पानी की तरह   ज़िंदगी    के  हर मुकाम  पर  चलते रहना  और  अपने  अंदर नई - नई    खूबियों  और सलाहियतों  को   तलाश  कर उन को  निखारने  की  कोशिश  करते  रहना   ही  एक  कामयाब जिंदिगी  का  मकसद होता  है। जो  जिंदिगी  को जीने  के सही  मायने  देता है . 

जिस लम्हा  हम   रुक  जाते है   और   ये  मान  बैठते  है .... अब   नया  करने  या सीखने के लिए कुछ नहीं बचा है   तो समझ  लीजिये  वही से    डिप्रेशन  में  जाने की शुरुवात  हो जाती  है..... बोरियत  हमें  घेरने  लगती है,  और  वक़्त  काटे  नहीं कट  पाता .शायद  यही  वजह है  की  आज  लोग  अपने शौक़  को  अपना  प्रोफेशन बना रहे है , लगी -लगाई  अच्छी - भली   नौकरियाँ  छोड़  कर वो   काम   कर रहे हैं जो  वो  करना चाहते है .... जिसको करने से उन्हें ख़ुशी  मिलती है। जब आपका  शौक़   आपका  प्रोफेशन  बन  जाता  है  तब  काम करने  में  एक अलग ही मज़ा आता है।

आज दुनिया  में वही लोग सबसे  ज्यादा  कामयाम  हैं   जिन्होंने  वक़्त  और  हालात  के साथ  खुद को बदलने  की   हिम्मत  दिखाई  है   चाहें  वो  लेटेस्ट  टेक्नोलॉजी   को सीखने  की लगन और  जोश  हो .... या रिश्तो  और रोज़ मर्रह  की ज़िन्दिगी  में  वक़्त और हालात  के साथ  ख़ुद  को ढाल  लेने का हुनर!

आपको  पता  है  अपनी जिंदिगी  की रोज़ - मर्रह की  उलझनों और परेशानियों  से बचने का भी  ये  बेहद  कारगर नुस्खा  है  अगर  आप  अपने  आप को  कामो में बिज़ी  रखते  है  और  अपने दिमाग को  इतनी फुर्सत  नहीं लेने देते  की  वो  फुज़ूल की  बातें  सोच सके ...  तो समझ लीजिये की आप ने   सही  राह  पकड़ी  हुई  है .
अक्सर  हम   अपने  प्लान्स को आगे  के लिए मुल्तवी  करते  है .... की जब ये हो जायगा तो  वो  करेंगे ... और वो हो जाएगा तो ये करेंगे .... हम  सही वक़्त का इन्तिज़ार करते रहते  है  जो  की कभी नहीं  आता ..... सही वक़्त  "आज" और "अभी" है  जिसे  हमें  हमेशा  याद रखना  चाहिए।  

माँ - बाप  अक्सर  अपने  बच्चों   के  सेटल  होने  का इन्तिज़ार  में  अपने  प्लान्स  को  पीछे   रखते  है , हो सकता है  की  कुछ  ख़ास  चीज़े  या  कुछ ख़ास काम  करने  के लिए सही वक़्त न  आया  हो  लेकिन उसका ये मतलब बिल्कुल  भी नहीं  होना चाहिए  की आप अपने अंदर  ख़ुआबो  और   ख़ु हाहिशो  को  न  पलने  दें  बल्कि  अच्छा   यही  होगा  की  आप उन्हें  हर लम्हा  जिंदा  रखें  ताकी वक़्त आने पर उन्हें  पूरा  किया जा सके।

"आज"  और "अभी"  में  जी  कर  आप  अपनी एक छोटी  सी  लव  स्टोरी  में  अपने  पार्टनर  के साथ   बिताये गए,  कुछ लम्हों में  एक उम्र  जी लेते  है  ... ...वक़्त  और हालात  भले  ही  आपको   ज़्यादा  दूर तक  साथ  न चलने  दे  , लेकिन तब आपको ये  तसल्ली  तो  होती  है   की आपने  अपने दिल के  बेहद  क़रीब  एक रिश्ते को  बहुत थोड़े  से  वक़्त  में  बेहद ख़ूबसूरती  से  जी लिया।  अपने   फुर्सत  के  लम्हों  में  आप  उन  अनमोल लम्हों  को याद  करके थोडा  सा  सुकून  तो  महसूस  कर  पाएंगे  की..... आपने   उन  चंद   हसीन  लम्हों में  ही  अपने  ... . प्यार  भरे रिश्ते  को   उम्र  भर  के  लिए  जी लिया  जो  एक ख़ुश नुमा याद बन कर  ताउम्र  आपके  साथ  रह  सकता  है . 
  
अपनी जिंदिगी को  बासी  पन  से  हमेशा  दूर  रखें ..... उस तरह से  ना  जीते   रहे  जैसे जीते  आयें है और न ही  एक  ही तरीक़े  से  काम करते  रहने की  कोशिश  करें .अपनी जिंदिगी में  आ रहे बदलाव  को खुली  सोच  और खुली  बाहों   से कुबूल  करें। हमारी  जिंदिगी हमें   बार बार इशारे करती है .....समझाती   है  की  हम  अपनी  सोंच  और  काम करने के  तरीकों  में   नया पन लाएं और  उसे  अपनाने  के लिए  अपने अंदर सलाहियत पैदा  करें।  हर दिन    बढती उम्र  और  नज़दीक  आते बुढ़ापे  में अगर एक स्टाइल  हो .... एक अंदाज़ हो .... तो क्या बात है!!!

अरशिया  ज़ैदी 








6 Nov 2012

Manoj Baajpai

                मनोज  बाजपाई....एक बेमिसाल  एक्टर  




एक्टर मनोज बाजपाई  की एक्टिंग  की मैं  तब से  फैन रही  हूँ  जब से मैंने उन्हें  महेश  भट्ट के टी-वी  सीरियल  स्वाभिमान  में  सुनील का किरदार  निभाते हुए देखा था , हमेशा  से एक  अलग   छाप  छोड़ी है   उन्होंने , अपने  निभाए  हर किरदार  में,  आज उनकी   फिल्मे .... गैंग ऑफ़ वासेपुर  और  चक्रविहू   देश  विदेश  में  खूब तारीफें  बटोर रही हैं .   
अपने   पसंदीदा एक्टर  की   ये   कामयाबी,  ये  शोहरत   मुझे  भी   बेहद  अच्छी  लग रही  है   लेकिन दिल  में  इस  बात  का  मलाल  ज़रूर है  की  मनोज बाजपाई जैसे   बेहेतरीन  एक्टर   को   काफी  देर से  नोटिस  किया  गया है  जो अहमियत  उन्हें आज मिल रही है  वो  काफी  पहले   मिल  जानी  चाहिए थी  जबकी  वो  सत्या, शूल (1999) ,दिल पे मत ले  यार 2000, ज़ुबैदा , अक्स 2001  रोड 2002, पिंजर 2003 ,वीर ज़ारा 2004, राजनीति 2010  जैसी  फिल्मो में... एक  के बाद  एक. बेहतरीन  पर्फोर्मंसस   देते रहे   हैं  और  जिसके  लिए उन्हें कई   बड़े - छोटे अवार्ड  से  लगातार नवाज़ा  जाता  रहा  है।     

  हिंदी  फिल्मों  में  लीक  से  हट कर  बेहेतरीन  किरदार  निभाने वाले   मनोज  बाजपाई को   वो तवज्जो   नहीं   दी गयी  जो उन्हें देनी चाहिए थी . देश - विदेश  में  धूम  मचाने  वाली  उनकी  फिल्म  गैंग  ऑफ़   वासेपुर  जैसी   क़ामयाब  फिल्म देने के बाद  जब  वो  Wills Indian  Fashion Week  में    रैंप  पर  चले तो हर कोई उन्हें अपने  कैमरे  में  कैद  करने को बेताब हो रहे  था  जबकि   एक वक़्त  वो था  की जब वो मुंबई में  ऐसिड  फैक्ट्री   के लिए, और दिल्ली  में  फिल्म  जेल के लियें   रैंप  पर  चले  थे तब न तो किसी ने उन्हें  नोटिस  किया  और न ही किसी ने  किसी ने  उन्हें   क्लिक  करना चाहा  था।

  लेकिन कुछ  लोग  पैदाइशी   एक्टर  होते हैं जिन्हें  कामयाबी  के आसमान  पर  चमकने  से कोई  नहीं रोक  सकता . मनोज  बाजपाई  ऐसे ही लोगो में से  एक हैं . दिल्ली  के   नेशनल स्कूल ऑफ़  ड्रामा  से   चार बार रिजेक्ट  होने  के बाद   उन्होंने   बेरी  ड्रामा ऑफ  स्कूल में   बेरी  जॉन  के  साथ  थियेटर   किया ....  जहां   सुपर स्टार  शाहरुख़  खान   उनके  क्लास मेट थे . खुद  के टैलेंट  पर   यक़ीन  रखने वाले मनोज बाजपाई  को बेरी  जॉन  ने  हमेशा  एक  बेहतर एक्टर  और बेहतरीन  शागिर्द  क़रार  दिया था . 
अपने करियर  में  उन्हें,  फ़िल्मी दुनिया की कई  कड़वी  हक़ीक़तो  का सामना  करना  पड़ा जहां  उन्हें  ये पता चला  की  अवार्ड  परफॉरमेंस  के लिए नहीं  बल्कि   रसूक  वाले   लीडिंग  एक्टर्स  को,  जीताने  के  लिए  भी  दिए  जाते  है  . एक  बार  उन्हें  बेस्ट एक्टर  अवार्ड के लिए  चुना  गया  था,  उसमे  एक  दूसरे  लीडिंग  एक्टर का   नॉमिनेशन  भी  था .जूरी  ने एक तरफ़ा  फैसला   सुनाते  हुए  उनसे  कहा    ......"की  आपको तो पता है की विनर  कैसे चुना गया है। मनोज  आप विनर नहीं हो ..... और जूरी  ने ये  तय  किया है की  अवार्ड  मेन   स्ट्रीम   के उसी एक्टर  को  दिया  जायेगा . क्योकि उसे पहली बार  एक्टिंग  के लिए  अवार्ड मिल रहा  है....इसलिए उसे  ये मौक़ा दिया जाना चाहिए,  उसने  इस फिल्म में बड़ी  मेहनत  से काम किया है . मनोज तो एक्टर है , एक्टिंग करेगा ही .....आज नहीं तो कल उसे अवार्ड मिल ही  जायेगा " इस वाक़ये  ने  उनके  अवार्ड  लेने  की ख़ुशी को  कही न कही  कम ज़रूर  कर  दिया . 

  इसी  तरह  सालों  पहले,  उनकी  फिल्म,  सत्या  को ऑस्कार अवार्ड  में न भेज कर जींस जैसी फिल्म को ऑस्कर  के लिए  नॉमिनेशन  दे  दिया  गया  था, इसलिए  अब,  जब  उनकी फिल्म  गैंग ऑफ़ वासेपुर  के  ऑस्कर  अवार्ड्स के लिए  nominate  किये  जाने  की  ख़बरे  ज़ोरों  पर  हैं  तब  वो कोई  ख़ास  उम्मीद  नहीं  रख   रहे हैं।   



बिहार  के  छोटे से  ग़ाव  बेलवा  से ताल्लुक़  रखने वाले   इस  बेमिसाल   एक्टर  ने  अपनी  शुरू वाती  दौर की   पढ़ाई   बेतिया  के,  के . आर  कॉलेज से  पूरी की  और  फिर दिल्ली  के   रामजस  कॉलेज से  इतिहास   में  ग्रेजुएशन  करके  कुछ  वक़्त के लिए दिल्ली  के सलाम बालक  ट्रस्ट में  पढाया।  फिल्मो में  अपने  करियर  के शुरुवाती दौर  में  उन्होंने  फिल्म  द्रोह काल  और बेंडिट  क्वीन(1994 ) में    छोटे छोटे  रोल  किये .1996  में  वो  फिल्म दस्तक में  मुकुल देव और सुष्मिता सेन के साथ एक छोटे से रोल  में  नज़र  आये .फिल्म  सत्या  के  बाद   वो कामयाबी  की सीढियां  चढ़ते  चले गए। आज  मनोज  बाजपाई  की फिल्मो को  न  सिर्फ अपने देश में बल्कि  विदेश  में भी बेहद  तारीफ  और  शोहरत  मिल रही है..... जो इंशाल्लाह  आगे  भी  जारी रहेगी 




मनोज  बाजपाई ने  अपनी  पहली  शादी  नाकाम  होने के  बाद  2005 में  फिल्म  एक्ट्रेस   नेहा  उर्फ़ शबाना रज़ा को अपनी जिंदिगी का  हमसफ़र  बनायाजिनके साथ  वो  खुश हाल  शादी शुदा  जिंदिगी बिता रहे है। अब वो  एक  नन्ही   सी  परी  के  पापा भी  हैं जिसे  यकीनन अपने एक्टर  पापा  पर  नाज़  रहेगा ..... हमेशा ... हमेशा !!!    

अरशिया  ज़ैदी 







 










4 Oct 2012

                                           सन्डे का दिन 

हाल  में  ही  ब्रिटेन  में किये  गए  एक   सर्वे   से पता चला है  की   ...75 % लोग  सन्डे  में  कही  बाहर जाना पसंद  नहीं करते , और  घर  पर रह कर  आराम  करना  चाहते  है. इस  सर्वे  को  पढ़  कर  मुझे........ लगा  जैसे  इन्होने  मेरे   दिल की  बात कह  दी  हो .क्योकि  मैं  भी ऐसे ही  लोगो में  शामिल हूँ....जो  सन्डे   को घर  से बाहर  निकलना  नहीं  चाहते  और घर  पर  रह  कर relax करना  पसंद  करते है .... कुछ  पढना चाहते  है ... टी वी देखना   चाहते  हैं .. और   रात का खाना  भी   खुद  बनाने  के मूड  में  नहीं होते, बाहर जाकर  खाना चाहते है .... या ऑर्डर  पर ..... घर पर ही खाना  मग़ा  लेना  पसंद  करते  हैं.

 जैसे-जैसे saturday नज़दीक आता  जाता है , वैसे वैसे  excitement  भी  बढ़ने  लगता  है . . सन्डे  की  सुबह देर  तक  सोने  को मिलेगा .  और  अच्छी नींद  लेने के बाद  जब  आँख खुलेगी  तो इत्मीनान से न्यूज़ पेपर    पढेंगे ...... ऑफिस भागने की जल्दी नहीं होगी,  उस  वक़्त ये  अहसास  ही  दिल में  एक  गुदगुदी  सी  पैदा कर  देता है।  

आखिर  इंतज़ार  ख़त्म होता है  और  सन्डे  आ जाता  है  सुबह देर तक  मीठी  नींद  में  सोने के बाद  जब  आख़  खुलती  है  तो  पहला ख़याल  यही आता है .... आज तो  सन्डे  है ...... पूरा  दिन  खूब  relax  करेंगे ....  इस खुमार में   नाश्ता  ख़त्म करते- करते  कब दो पहर  हो जाती है  पता ही   नहीं चलता .घर  के  हल्के फुल्के काम निपटाते हुए..... धीरे- धीरे  आने वाले हफ्ते के  सारे काम याद  आने लगते है जिन्हें निपटाने की फ़िक्र  सताने लगती है और एक- एक  करके  सारे  काम निपटाते  हुए  पूरा दिन   कहां  निकल जाता है.... पता ही  नहीं चलता और  सन्डे  का  दिन   पूरे  हफ्ते  का  सबसे व्यस्त   दिन  बन जाता है।

शायद   आप  भी  मेरी बात से इत्तिफाक रखते होंगे .... क्यों  है ना !!! 

अरशिया  ज़ैदी 

  




            


23 Sept 2012

chadhawa

                                         चढ़ावा 

बीबीसी   न्यूज़  ने   कुछ  दिनों  पहले  रिपोर्ट दिखाई थी  जिसके  मुताबिक  दान  करने में हिन्दुस्तान  का 93  वां  स्थान  है . इस  में  कोई  दो राय  नहीं,  की हमारे मुल्क में  लोग  खुले दिल  से  मस्जिद - मंदिर बनवाने  के लिए  लाखो रूपए  दान कर  देते  है  लेकिन  जब  स्कूल   कॉलेज, या  अस्पताल  के  लिए   दान   करने  की  बारी   आती  है . तो  लोग  क़दम  आगे  नहीं बढ़ाते . ऐसा  नहीं  है की  हमारे देश  में लोगो के पास पैसा  की कमी   है। जहां   एक  तरफ , हमारे  देश  में  अमीर  लोग  अमीर होते जा रहे है ... तो  वही    ग़रीब लोग  और   ज़्यादा  ग़रीबी  के  बोझ  से  दबते जा रहे  हैं ।

अरे  जनाब , इंसानियत  भी  एक  तरह की  इबादत है  बस  इसके लिए   आपको  अपना   बड़ा  दिल करने की ज़रुरत है। देश में हॉस्पिटल  की  कमी है , बच्चो के  पढने के  स्कूल कम है. पैसे न होने की वजह से  बच्चे  अपनी  पढ़ाई  पूरी  नहीं कर पाते। लोग  बीमारियों का इलाज़  इसलिए नहीं करवा पाते  क्योकि  उनके  पास  इलाज  के पैसे  नहीं है,  गरीबी  औरतों के  बच्चे यूं  ही  सड़को  पर पैदा  हो जाते है.....  और  इंसानियत  शर्म सार हो जाती है .

यहाँ  मैं  उत्तर  प्रदेश  के  ऐतिहासक  शहर  मेरठ    की  तारीफ़   ज़रूर करना  चाहूगी  जहां मुझे ये  देख  कर,   बहुत  अच्छा  लगा  था , की   आम लोगो   की  सहुलियतों  के  लिए अमीर  और पैसे  वाले  लोगो ने   ,  दिल  खोल कर  दान  दिया  है।   बेहेतरीन   charitable   अस्पताल  स्कूल,  कॉलेज , सराए  जैसी बुनियादी  सहूलियतें आम - ग़रीब  लोगो के  लिए    मुहैया  कराई  है। जिसका  भरपूर  फ़ायदा   उन्हें  मिल  रहा  है  . वहाँ  इंसानियत और  समाज  के  हक़  में  दान करना  एक  परंपरा  रही  है। जो  की  देश  के   हर  ग़ाव  और  हर   शहर  में  कराये    जाने  की   ज़रूरत  है .

हमारी  कामयाबी   में   हमारे  समाज  का  भी  बहुत  बड़ा  हाथ  होता  है।  यहाँ  की  मिटटी  में   परवरिश   पाकर   हमें  नाम  और पहचान मिलती  है  बुनियादी  सहूलियते  हमारी  जिंदिगी   को आसान  बनाती  हैं।और हम आगे  बढ़ पाते हैं ........ तरक्क़ी  कर पाते हैं , और इसके  बाद  बारी  आती है  हमारी .... समाज को  वापस  करने की , और  तब   हमें  बड़े  खुले  दिल से,  इंसानियत  के  हक़  में  चढ़ावा  देना  चाहिए। ताकी  बाक़ी लोगो  तक   आम  बुनयादी सहूलियतें   पहुँच सके  और  उनकी जिंदिगी   बेहतर  बन सके .
                       
                       चढ़ावा 

मंदिर - मस्जिद  बनवाने में खूब  चढ़ावा  देते हो
मन्नत  पूरी  कर  दे मौला ,यही  मांगते  रहते हो।

ऊपर  वाले  ने  क्यों  तुमको,  दिया है  इतना, ये सोचो
इंसानियत  का  एक  क़र्ज़ है  तुम पर, जिसे तुम्हे   चुकाना है

बीमारों को  राहत  देने  तुम्हें  अस्पताल  बनवाने  हैं
स्कूलों को  खोल  के  उसमें बच्चों को पढ़वाना  है।

समाज से  तुमको  मिला  बहुत  कुछ,  अब देने  की बारी  है,
सुनो  ध्यान से , इस समाज  ने फिर  से तुम्हे पुकारा है।

हम  सब के,  कुछ- कुछ करने से,  देश  तरक्क़ी  कर  लेगा  
लोग  सुखी  हो  जायें  देश के, ख़ुआब  यही हमारा  है। 

अरशिया  ज़ैदी 



5 Sept 2012

A Day With My Teacher


                       एक  दिन अपनी टीचर  के साथ 



A day  with my Teacher
अगर  आपके  स्कूल  - कॉलेज टाइम  की आपकी favourite टीचर  आपके  घर  आ  जाएं   और आपके साथ   कुछ  घंटे  गुज़ारे तो आप कैसा महसूस  करेंगे ....  ?  बहुत  excited,  बहुत  ख़ुशी  महसूस  करेंगे  न ,कुछ  ऐसा   ही  बीते  सन्डे  में  मैंने  महसूस किया था । 
पता  है  आपको ,बीते सन्डे  मैं  मेरे  कॉलेज टाइम की favorite  टीचर  और  मेरी  रहनुमा  मिसेज़ वसुमती अग्निहोत्री  अपने   बच्चों  के  साथ  हमारे  घर आयी थीं . तक़रीबन  10-15 साल के बाद मैं  उनसे मिल रही  थी .....बहुत  खुश  थी  मैं . 
उनसे  मेरा  रिश्ता  तब  का है  जब  मैं  11th  क्लास  में  पढ़ती  थी और  वो  हमारी  हिस्टरी टीचर  थी . उन्हें   हम  वसु  दीदी  कहते    थे  क्योंकि   हमारे  कॉलेज  में  टीचर  को  दीदी  बुलाया जाता  था .

एक  सुलझी हुए सोच , निडर और बिंदास  अंदाज़  और हमेशा  अपने  स्टुडेंट्स को  सुनने -समझने और  मदद  करने  को तैयार  रहने  वाली  रौबदार  शक्सियत   रही   हैं  वसु  दीदी  । उन्हें  शेरो -शायरी  का  भी  शौक़  था , गाती  भी  अच्छा  थी, इसलिए  कॉलेज में  होने वाली Extra  Curricular  Activities  में  उनकी   सुरीली   आवाज़ में  गीत  और  गज़ले  भी  सुनने  को  मिलते  थे।

 वो  अपने  स्टुडेंट्स  का बहुत  ख़याल  रखती  थी ,बात  उन  दिनों  की  है  जब  हमारे 12th के  बोर्ड   के  इम्तिहान  हो रहे थे .....  मैं  इम्तिहान दे रही थी .... और  मुझे   ठण्ड  लग रही थी .... वसु  दीदी  क्लास में  स्टुडेंट्स  को  चेक  करने  आयी   थी, उन्होंने  मुझे  देखा ...और  बिना  कुछ  कहे  अपनी   शाल  उड़ा  दी.  हॉल  में   बैठी  बाक़ी  लडकियाँ  तिरछी  निगाहो  से   मेरी  तरफ  देखने  लगी  थी . क्योकि  वसु दीदी  की  रौबदार  शक्सियत  से  लड़कियां  जल्दी  उनसे  बात  करने  में  झिझकती  थी . मुझे  भी  अपनी  पसंददीदा  टीचर  से  मिला  ये  प्यार  और  अहमियत  बहुत  अच्छी  लग  रही  थी  और  इस  वाक़ये  के  बाद  मैं  जज़्बाती  तौर  पर  उनसे  जुड़ने  लगी  थी .
   
उनकी  जिंदिगी  का  एक  पहलु  ये  भी  है  की  वो   इंसानियत  के  नाते  हमेशा  दूसरो की  मदद करने  को तैयार  रहती थी। इंसानियत  की  एक मिसाल  उन्होंने  तब   क़ायम  की, जब  उन्होंने Muscular  Dystrophy  जैसी  बीमारी ,(जिसमे  मरीज़  हिलडुल  भी  नहीं  पाता) की  एक  Patient  पदमा  अग्रवाल  की लम्बे  वक़्त  तक   ख़िदमत  की   और  उनका  ख़याल  रखा. उनके  दर्द  को  कम  करने  और  उनका  हक़  दिलवाने  के लिए  न  जाने  कितने  लोगो  से लड़ी , दुश्मनी  मोल ली ... लेकिन  पीछे  नहीं   हटी.

वसु दीदी  ने पदमा दीदी  को  कमरे  की  चार  दिवारी  से निकाला,  और  उन्हें  हरे - भरे  पार्क  की  सैर  से  लेकर  पहाड़ो तक की सैर  करवायी. वसु  दीदी  ने  उन्हें  ख़ुश  रखने  और उनके  होटो पर मुस्कराहट लाने की  हर मुमकिन  कोशिश  की .जिसमे  वो कामयाम रही .

वसु  दीदी  ने  ही मेरी  मुलाक़ात  पदमा  दीदी  से करवाई  थी,जो उम्र  में  मुझसे  काफी  बड़ी  थी, मेरा  मानना  है की दोस्ती के लिए उम्र नहीं  बल्कि  सोच  और ख़याल मिलना  ज़रूरी  होता है. पदमा दीदी  मेरी  मुलाक़ात कब  दोस्ती  के गहरे  रिश्ते  में बदल गयी  मुझे  पता  ही नहीं  चला , पद्मा दीदी  का  दर्द  मुझे  भी  बहुत  दुःख  देता था ... और मैं  दिल  से  उनके  लिए  कुछ  करना चाहती थी। यहाँ  मेरे मम्मी - डैडी  से,  विरासत  में  मिली  इंसानियत   और  वसु - दीदी की  Inspiration ने   मेरे  हौसले  बुलंद किये  .... जिसकी  वजह  से  मैं  भी  पदमा  दीदी  की  थोड़ी  बहुत  ख़िदमत  कर  सकी.

पदमा  दीदी  की  बारे  में  क्या  बताऊ , बस  इतना  ही  कह सकती हूँ  की  उन  जैसे  लोग  ख़ुदा  बहुत कम  ही बनाता  है ,उनकी Death  से  एक  दिन  पहले  ही  मैं  उनसे  मुलाक़ात  करने  गयी  थी  और अगले दिन ही पता चला था की वो इस  दुनिया से चली गयी  हैं . उनका  नाम  आते  ही  आज  भी  आखें  नम हो जाती है . उनसे वो आख़री  मुलाक़ात  और  उनके  प्यार का अहसास  आज  भी  मेरे  साथ  है .   

इसके  बाद  जब  वसु  दीदी   पहली बार  हमारे  घर  आयी  थी , उससे   जुडी  ख़ूबसूरत   याद  आज  भी  मेरे  ज़हन  में  ताज़ा  है  , उन्हें  अपने   घर  में   देखकर  मेरी  ये  समझ  में   नहीं  आ  रहा  था  की उन्हें कहां  उठाऊ .... कहाँ  बिठाऊ . जब  वो  मेरे  मम्मी - डैडी   से  मिली  तो उन्हें  और भी  ज़्यादा  अच्छा  लगा  और   फिर  हमारे  घरेलु   ताल्लुक़ात  हो  गए थे  और  हम  अक्सर  एक  दुसरे  के  घर  आने -जाने  लगे ,इसके  बाद  हम  सब  अपनी- अपनी  ज़िन्दिगियो  में  मसरूफ होते  चले गए ... मैं  अपनी  पढ़ाई   में  .... और   वसु  दीदी  कामयाबी  की  ऊचाईयों  को  छूती  चली गयी, इंटर  कॉलेज  की टीचर   से  वो   प्रिंसिपल  बनी  प्रिंसिपल  से  District  Inspector Of  School  बनी  और  फिर लखनऊ   में Deputy  Director  Of  Education  की  पोस्ट  को  बाख़ूबी  संभाला  और  जुलाई  2011 को  Deputy Director  की  पोस्ट  से  रिटायर  हुई .

इतने  लम्बे  अरसे के बाद  हम  मिल रहे थे .....  यक़ीन  जानिये ,मिल कर  ये  बिल्कुल  भी नहीं  लगा  की  जैसे  हमें  15  साल  के बाद  मिल  रहे  हैं । वसु  दीदी   आयी..... आराम  से  बैठी, अपनी  तजुर्बेकार  नज़रों  से  हमारे  चहेरों  को  पढ़ती   रही ---- प्यार  से  मुस्कुराती  रही  . वो  लखनऊ  से मशहूर  चिकन  के   कुर्तो  के  रूप  में ,  हम सब  के  लिए  अपना  प्यार  समेट  कर  लाई  थी  जो  हम  सब  को   पसंद  आया , और हमने  सर  झुका कर  क़ुबूल किया  . उनके  बच्चे  और  मेरा  भाई  शैली (अली ) और  मेरी  बहन  सिम्मी  (हिना), हम  सभी  एक- दुसरे से  मिल कर  बेहद  खुश थे. 
मैंने  उनके  लिए  अच्छा  सा लंच  तैयार  किया  जिसे  हम  सब  ने  साथ  खाया  खाने के बाद  गरमा - गरम  चाय  और शेरो -शायरी  का  भी  दौर चला  जिसे   देख  कर पुराने  दिनों  की यादें  ताज़ा  हो गयी  बातो - बातो  में  ये  पता  ही  नहीं  चला  कब  तीन  घंटे  बीत  गए ..... फिछले कई  सालो का  स्टॉक था .... बातो  का ... इसलिए  दिल  किसी  का  भी  नहीं  भरा  था  न  उन लोगो का .... न ही हमारा  ....फिर  भी  उन्हें जाना था  इसलिए फिर मिलने  का  वायदा  करके  भारी  दिल  से  उन्हें  खुदा  हाफ़िज़  कहा .
कुछ  रिश्ते  ऐसे  होते  है   जिनमे  बेहद  अपना  पन  होता  है  जहां  आपकी  सोच  और  ख़याल  इतने  मिलते  होते  है,  की  आपको किसी  तसन्नो , किसी बनावट या  किसी  शो ऑफ   की  ज़रुरत  नहीं होती, कुछ  समझाने  की ज़रूरत  नहीं  होती, बिना कहे  बाते  समझ  ली  जाती हैं .
 a day with my teacher, on teacher's day
A day  with my Teacher
तब ....उस  रिश्ते  की अहमियत  और भी ज्यादा बढ़ जाती है  जब  रिश्ता एक " टीचर  और एक स्टुडेंट" का  हो मै उन   ख़ुशकिस्मत  स्टुडेंट्स  में  से एक हूँ .जिसे अपनी टीचर मिसेज़  वसुमती   अग्निहोत्री  के रूप  में  एक  ऐसा  गाइड  मिला  है , जिन्होंने  एक  रहनुमा बन  कर  मुझे  हमेशा  सही  रास्ता दिखाया  और   आगे  बढ़ने  का   हौसला  दिया .
अरशिया  ज़ैदी










15 Aug 2012

Udaan...a freedom of expression...1st Birthday

    "उड़ान "की  पहली  सालगिरह  आप  सब  को  मुबारक
उड़ान  ...a freedom of expression

आज का  दिन  मेरे लिए  बहुत  ख़ास  है  क्योकि  आज   उड़ान ....a freedom of expression  अपनी  पहली साल गिरह  मना  रहा है. पिछले  साल  आज  ही के दिन  मैंने  अपना  नज़रिया , अपने ख़यालात , और अपनी  सोच  की  उड़ान  भर  कर  आप तक पहुँचने  की एक छोटी  सी कोशिश की थी ..... ये  कोशिश  कामयाब रही......आपके  साथ  ने  मेरा ये  सफ़र  बेहद  ख़ूबसूरत  बना दिया है. 
उड़ान  के  इस  एक  साल   के  सफ़र  में   मेरा  हम सफ़र  बनने  और   मेरा साथ  देने  का बहुत-बहुत शुक्रिया .

मुझे  नहीं पता कि  मैं  सही  हूँ  या  नहीं..... जिन  मुद्दों  को  मेरे दिल ने  छुआ  ........जो  मुझे  सही  लगा  उसे मैंने  आप के साथ बांटा ...आगे  भी मेरी यही  कोशिश  होगी  की... मैं  जो लिखूं  वो  पहले से  बेहतर  हो...जब भी आप  उड़ान....a freedom of expression  पढ़े,  तो आप को  अच्छा  लगे .....दिलचस्प  लगे !!!  
अपना ख़याल  रखियेगा  
 ख़ुदा  हाफ़िज़ 
 अरशिया ज़ैदी 

                       

1 Aug 2012


     दूसरे  सफ़र  की   हसीं  शुरुवात 



   आख़िरकार  कल  उसने फैसला ले  ही लिया .... अपनी  घुटन भरी  शादी  के  रिश्ते से आज़ाद होने का ... और  छोड़ आयी सब कुछ  पीछे ..... बहुत पीछे. कल  ये  हिम्मत  दिखाई   मेरी एक बहुत प्यारी दोस्त  किरन ने... जिसने  अपनी  सात  साल  शादी  को ..ख़त्म  कर  दिया.
 हर किसी की  तरह  मुझे  भी  उसकी शादी  के टूटने  का अफ़सोस था....लेकिन इससे  कही  ज़्यादा  ख़ुश  थी  मैं  उसके लिए... और  उसके इस  फैसले से सहमत  भी  थी ... क्योकि  मैं  उसके  दर्द  की  गवाह  बनी  थी, मैंने  उसे  हर  रोज़  दिल  ही  दिल में  घुटते हुए  देखा  है..... बिना  आँसू  बहाये  रोते  हुए देखा है. 
 कल  जब  मैं  किरन  से  मिली  तो  उसे  एक लम्बे  अरसे  के  बाद   उसका  चेहरा खिला  हुआ  देखा,  उदासी  भरी  मुस्कराहट  के  बजाये  दिल  से  मुस्कुराते हुए देखा  उसे ... ऐसा लगा  जैसे  बहुत  हल्का  महसूस  कर रही  हो  वो . और   दुबारा अपनी  ख़ूबसूरत  जिंदिगी  को  नए सिरे  से शुरू  करने को  तैयार हो  .
ज़ज्बाती  तौर  पर उसे  इतना फिट  देख  कर  अच्छा लगा था मुझे . ये सच  है  की  ये  ख़ूबसूरत  जिंदिगी  हमें  बार- बार नहीं मिलती..... एक बार ही मिलती है.  और सबसे  कीमती  चीज़  होती है  वक़्त.... अगर हमने  वक़्त  रहते  अपने  रिश्तो की  अहमीयत को  नहीं   समझा  तो समझ लीजिये ... की  रिश्ते की उम्र ज्यादा  नहीं  है.
जब कोई अपनी  शादी   को ख़त्म करने का फैसला लेता है ....तो इसका  मतलब है .... की  अब  रिश्ते  के बेहतर  होने  की  कोई  उम्मीद नहीं  रह गयी है ....उसको ,क्योकि  कोई  भी ये  नहीं  चाहता की, उसकी  शादी  टूटे  या  बसा - बसाया  घर  बर्बाद  हो  जाए.अगर  किसी का  घर  ही ना बसा हो! .... रिश्ते में  महसूस  करने  के लिए कुछ  बचा  ही  न हो  तो  ऐसे  हालात में  रास्ते  अलग कर  लेना  ही बेहतर  होता है। जिस  वक़्त  भी ये अहसास   हो जाए ... की   अब  सर  से  पानी  ऊपर जाने लगा है ...और अब इससे  ज्यादा  सहना  हमें  कही का  नहीं   छोड़ेगा  तो बस  वही   थोड़ा   ठहर जाने की  ज़रुरत है  और  रुक  कर  रास्ता  बदल लेना  ही  समझदारी  है.
     आज   भी  हमारे  समाज  में  किसी  की  शादी  टूट  जाने  की  ख़बर  से  लोगो के  माथे  की त्योंरिया  चढ़  जाती  है.  और  हम  लोग  क्या  कहेंगे .... इस  डर  से... कई  बार  बेमायने  हो  चुके रिश्ते  को  ढोते  रहते  है.  अगर  आप  एक  औरत  है , तो  तरह - तरह सवाल  पूछे  जाने  लगते है ,आपके  अपनी  शादी  को  ख़त्म करने के  फैसले  को  ग़लत  ठहराया जाने  लगता  है ......लोग  अपने -अपने नज़रिए से  रिश्ते  को  दुबारा  जिंदा  करने के  तरीक़े  सुझाते  है , .आपको  अकेले पन  से भी  खौफ़  दिलाया  जाता  है ,आपको  समझाया  जाता है  की  अकेले  रह  कर जिंदिगी नहीं  कटती . बुढ़ापे  में  आपका  ख़याल कौन  रखेगा ? .
और तब एक सवाल  ज़हेन  में  बड़ी  शिद्दत  से  उभरता है  की  अगर  शादी  के बाद  भी  आप बेहद   तन्हा महसूस  करते  हो, उसके साथ होने के   बावजूद  भी  आपको ज़ज्बाती  तौर पर  ये न  महसूस हो सके ... की आपका  हम सफ़र  आप के साथ  है .... तब  उसका  क्या ?. 
क़ब्र  का हाल  तो मुर्दा  ही जानता है  इसलिए तब बिना  confuse  हुए  ये सोचना  होता है  की  अगर हमने  अपने  बारे  में कम  और  लोगो के बारे में  ज्यादा सोचा  तो  हम  अपने दर्द  से कभी  बाहर  नहीं  निकल  पायेंगे .

जब  हम  ज़ज्बाती   तौर  पर  बुरे  दौर से  गुज़र  रहे  होते   है ..तो कई बार  दिलो  दिमाग में  एक अजीब  सी  कशमकश  चलती रहती है .... जिससे  निकलना  अपने आप में एक  challenge   होता  है .आपके  हालात  के बारे में आपसे ज्यादा  बेह्तर कोई  और नहीं जान सकता. इसलिए  फैसला  भी आपको ही करना  होगा . हमें  इस  बात  को  भी  समझना  होगा  की  हमारे  दर्द  में  होने  पर  लोग  हमसे  हमदर्दी तो रख  सकते है .... पर  हमारा  दर्द  नहीं  बाँट सकते....अपने  हिस्से  का दर्द  हमें  ही  सहना  है  इसलिए बेह्तर है ... थोडा  सा अपने बारे  में  सोचते  हुए ..... हम  वो करे जिस के लिए  हमारा  दिल  और ज़मीर गवाही  देता है .
जिंदिगी  बेहद   ख़ूबसूरत  है  बस एक मकसद ... एक मायने मिलने की देर होती है ... जिस  दिन जिंदिगी  का  मक़सद मिल  जाता है ...वही से बात बननी शुरू हो जाती है.  और  तब हमें  जिंदिगी  बहुत सारे  मौकों पर  सच्ची  ख़ुशी  का अहसास  कराती है 
 जिंदिगी ना मिलेगी  दोबारा .....   ये  चार लफ्जों की  छोटी सी लाइन  मुझे बहुत  पसंद  है  देखा  जाये  तो  इसमें  जिंदिगी का  हसीन सच  छुपा है जो  हमें  बताता  है  की  जिंदिगी  सिर्फ  एक  बार  ही  मिलती  है  जिसे  हमें  भरपूर  जीना  चाहिए  नहीं  तो   इसी पछतावे  में  उम्र गुज़र जाएगी....की ."काश  हमने  अपनी जिंदिगी  को  पहले ही जीना  सीख  लिया होता". हमें  पहले अपने -आप को खुश रखना  सीखना  होगा  तब जाकर  हम  दूसरो को  ख़ुशी दे पायेंगे.

मैंने  कही  पढ़ा था  और शिद्दत  से  ये महसूस भी किया है  की  अगर  हम  किसी के लिए अपने दिल में  कड़वाहट और गुस्सा रखते है.... तो  उसका सबसे ज्यादा  बुरा  असर हम  पर पड़ता है... हम  अंदर  ही  अंदर  जलते  रहते है  और  गुस्से और  नाराजगी  की  ये  आग  अगले  बन्दे  को बाद   में जलाती है  ... पहले आप जल जाते है .इसलिए  जिन्होंने  आपको  चोट  पहुचाई  ..... आपका बुरा किया...  उन्हें  माफ़ कर दे... उनके लिए अपने दिल में कोई  कड़वाहट  न  रखें , उनकी बेहतरी  के लिए  दुआ  करे और  उनके  बारे  में  अच्छा ही  सोचे. तब आप  देखिये ... आपके  दिल  को  कितना  सुकून मिलेगा और  कितनी  अच्छी  नींद आएगी.
यक़ीन  कीजिये  यही  से  आपकी  जिंदिगी  का  अगला  बेहद  हसीं  सफ़र शुरू होगा ....जिसका लुत्फ़  आप  हर लम्हा  उठा  सकेंगे  .
अरशिया ज़ैदी  
 

15 Jul 2012

Bheege Bheege Mausam Me Main Aur Meri Pari

           भीगे-भीगे  मौसम में ....मैं  और मेरी परी


 beege beege mausum me main aur meri pari
      


आज  सुबह  मैं  अपनी तीन साल की  भतीजी परी को बालकॉनी  में लिए खड़ी थी. छोटी सी बच्ची गर्मी  से बहुत परेशान  हो रही थी ... अचानक मौसम  का मिज़ाज  ख़ुशनुमा होने  लगा. गर्मी से राहत मिलने के आसार नज़र  लगे .... ठंडी -ठंडी हवाएं  चलने  लगी ,  नीले  आसमान  को  काले- काले  बादल  बड़ी तेज़ी  से ढकने लगे थे . 
beege beege mausam me main aur meri paribeege beege mausam me main aur meri pariकुछ देर  पहले गर्मी से परेशान  परी अब मुस्कुराने लगी थी ..... हवा  उसके बालो से खेल  रही थी ... उसने  अपनी आखें  बंद कर  रखी  थी और   वो  अपनी छोटी- छोटी  बाहें  हवा  में  फैलाकर  अपने आप को बारिश  में भिगोने  की  कोशिश  कर  रही थी.  मेरी  नज़रे  उस  पर जा कर  ठहर  गईं थी . ये नटखट शैतान लड़की  इस वक़्त बेहद   मासूम  लग रही थी.
इस  नन्ही परी को  भीगने  का बेहद  शौक  है  ... अक्सर  मैंने  उसे  अपने  दादा  से  कहते हुए  सुना  है  अददा ....हमें भिगोइए   हमें भिगोइए- . अब  तो सच-मुच  बारिश   की मोटी  मोटी  बूदें  हम दोनों  को  भिगोने  लगी थी .
बारिश  का खुश नुमा मौसम  है ही ऐसा ...जो  सबको मस्ती  में शराबोर कर दे . भीगना मुझे  भी  बेहद पसंद  है ...और अब  हम  दोनों  फूफी-भतीजी  पूरी तरह  मस्ती  करना  चाहते थे. 
लिहाज़ा  हम  छत  पर चले  लगे .... छत  पर से  नज़ारा और भी  ज्यादा ख़ूबसूरत  दिख  रहा था .....  बारिश  इतनी  तेज हो रही थी  की  दूर  दूर तक  धुंद  ही धुंद  नज़र  आ रहा था ....हम दोनों  बारिश के पानी में   नहाये जा  रहे थे . ... खूब  शोर  मचा  रहे थे... खेल रहे थे.
 वो  मुहं  पर हाथ  रख कर  कभी  खिलखिला  कर  हंस  पड़ती, तो कभी मेरी गोद में  चढ़ जाती  और कस  के चिपट जाती  ..... उसको  इस तरह  हँसता - खिलखिलाता  देख कर  ऐसा लग रहा था की सारी कायनात  मुस्कुरा रही  हो.
beege beege mausam mein main aur meri pariमैं  उन ख़ूबसूरत लम्हों को  पूरी  तरह जी रही थी और कुछ वक़्त के लिए अपनी  ज़िन्दिगी की उलझने और परेशानियो  को भूल गयी थी. हम अक्सर  बड़ी बड़ी खुशियों को हासिल करने के चक्कर में  छोटी छोटी खुशियों की  अहमियत  को नहीं समझ  पाते...और  सुनहरे  लम्हों को खो देते है.   
 जिंदिगी  हमें  ऐसे अनगिनत  ख़ूबसूरत  लम्हों से नवाज़ती  है जो हमारी रूह को भी सुकून पंहुचा देते  हैं .ये  ख़ूबसूरत  लम्हा उन्ही  लम्हों  में से एक था....  जिसे मैंने भरपूर जिया.

अरशिया  ज़ैदी  


 













29 Jun 2012

Poem- Peshani


                पेशानी

आज सुबह  जब मैंने अपनी  पलकें खोली 
उसने  झांक के देखा  मेरी  आखों  में 
और  कहा   चुपके  से मेरे कानो में.

aaj  subah jab maine apni palkein  kholi
 usne jhaak ke dekha meri aakhon mein 
 aur kha chupke se mere kano mein 

क्यों  चेहरे  पे  हैं  इतने  दर्द के  साए 
होटों  की मुस्कान  है जैसे खोयी सी 
मैंने कहा..... ख़फा  हूँ अपने माज़ी से.

 kyon  chehre pe hain itne dard  ke saye 
 honto ki muskaan hain jaise khoyee see
Maine kaha .... khapha hoon apne maazi se 

उसने मुझे  बाहों  में अपनी भर  लिया 
और प्यार से पेशानी को मेरी  चूम लिया 
मैं  हूँ ना .....माँ ने  ख़ामोशी से  कहा .

usne mujhe bhaoon mein apni bhar liya
 aur pyaar  se peshani ko meri choom liya
 main hoon  na ..... maa ne khamoshi se kha 

अरशिया  ज़ैदी (Arshia Zaidi)


15 Jun 2012

Shikast ke Phayede


                                                      शिकस्त के फायदे 


हाल  में  ही  मुझे हैरी पौटर सिरीज़ से, ....दुनिया  के नौजवान  बच्चो  के बीच अपनी  ख़ास  जगह  बना लेने वाली जे .के रौलिंग  की जिंदिगी के कुछ अनछुए पहलुओ को पढने   का मौका  मिला...... बहुत  अच्छा  लगा  साथ  ही  इस  बात  का  अहसास  भी बड़ी  शिद्दत  से   हुआ .... की  जिंदिगी  में  कुछ  भी मुफ्त  में  हासिल नहीं   होता ..... बड़े  सख्त  और  मुश्किल  हालात  से  भी गुज़रना  पड़ सकता  है  जिंदिगी  की जंग   जीतने के लिए .....जैसे -जैसे  मैं  उनके  बारे  में  पढ़ती  जा  रही थी ......वैसे -वैसे  मुझे  अपने  अंदर  एक   excitement  महसूस  होता  जा रहा  था ......... सोचा  की क्यों  न  आप  सब  के  साथ,  उनकी सोच ... उनका नज़रिया  शेयर  किया  जाए  !.

 जैसा  की  हम  सब  जानते  है ....  मशहूर ब्रिटिश  राइटर जे . के रौलिंग   उस  हस्ती  का   नाम  है .... जिन्होंने  हैरी पौटर  सिरीज़ लिख  कर  पूरी दुनिया  के नौजवान बच्चो को अपना दीवाना  बना रखा है .अब तक हैरी पौटर सिरीज़ 67 भाषाओ   में translate  की जा चुकी  है. 

कामयाबी  की ये  दास्ताँ  सुन  कर  कितना  अच्छा  लगता  है  ना ...! लेकिन  हमारे  लिए यहाँ  इस  बात  को  समझना  बेहद ज़रूरी  है  की  ये  ऊचाईयां  उन्हें  रातो -रात  हासिल नहीं  हुई है, .......उन्हें तमाम  ऊचें - नीचें  रास्तो  से  गुज़ारना पड़ा  तब जाकर  उन्हें  ये कामयाबी मिल सकी.

उनका  मानना  है  की हर  इंसान  की  जिंदिगी  में  एक ऐसा  वक़्त  आता  है ....जब  उसे  शिकस्त  का सामना करना  पड़ता  है ..... . चाहे  किसी के  पास  कितना भी  पैसा  हो , बड़ी - से  बड़ी  डिग्रीयां  हो  या  कितना  भी अच्छा करियर  क्यों न  जा रहा हो. 

ऐसा  ही  एक  दौर  उनकी  जिंदिगी  में तब  आया, जब  उनकी  शादी  टूट रही थी , उनके  ऊपर एक  बेटी की ज़िम्मेदारी थी, रहने के लिए अपना घर नहीं  था ,वो एकदम  बेरोजगार  और  अकेली थी . उस वक़्त  उन्हें  लगा था  की  वो अपनी जिंदिगी  की सबसे  बड़ी शिक़स्त  का  सामना कर  रहीं  है .
लेकिन  उस  मुश्किल  वक़्त  में   भी...... नाकामी  और  शिक़स्त  उनके  लिए  क्या  मायने रखती है.... ये  तय करने  का  हक़  उन्होंने  अपने  पास ही रखा .... हांलाकि   लोगो ने  उन  पर  अपने  -अपने नज़रिए से   शिकस्त  के  मायने   थोपने की  कोशिश  ज़रूर  की, लेकिन  उन्होंने   किसी  की बात  का कोई  असर  नहीं  लिया ... लोगो  की बातो  से बिना  confuse  हुए  हार  की अहमियत   को  समझा  .... और दिलचस्प  बात ये है.... उन्हें  अपनी जिंदिगी की  सबसे  बड़ी हार  में भी  बेशुमार फायदे  नज़र  आये. 

अपनी  हार  में पहला  फायदा  उन्हें  ये   नज़र  आया  की  वो ज़मीनी हकीक़त  से रूबरू   हुई .... उन्होंने  इस सच्चाई  को  क़ुबूल  किया की उनकी  शादी-शुदा  जिंदिगी खुशहाल  नहीं थी...इसलिए उनकी  शादी  का टूट जाना ही  बेहतर था. और  उसके  बाद  उन्होंने  कभी   पीछे मुड़  कर  नहीं देखा ... और अपनी  सारी  energy अपने  काम में लगा दी ... उन्होंने  वो करने  की ठानी जो वो  हमेशा  से करना  चाहती थी .... और  यही  वो  लम्हा  था जब उनके  दिल के सारे  डर   निकल  गए .....उनके  पास उनकी  बेटी  थी जिसे  वो बेहद प्यार करती थी.... एक  अपना  टाइप  राइटर था ... जिसकी  मदद से उन्होंने  दिमाग़  में  आये  एक  शानदार  आईडिया... को  पन्नो  पर उतारना  शुरू कर  दिया... और  तब उन्हें    अपनी  इस  खूबी  का अहसास  हुआ  की  की उनके  अंदर  शिद्दत  से  अपना  काम करने  की  सच्ची लगन है , discipline  है...   और वक़्त  की   कीमत   का  अहसास  है .

दूसरा, उन्हें  इस  बात  का  भी  अहसास  हुआ  की  उनके पास  फॅमिली  और  अच्छे  दोस्तों  का  ज़बरदस्त  moral  support  है जिसकी  वजह  से  उस बुरे  दौर में   भी उनका  आत्म विश्वास  कभी नहीं डगमगाया  और  वो  अच्छे  से अच्छा  काम  करती  रहीं .


उनका  कहना  है -
"हार  हमें   खुद  को  पहचान  पाने  का  सुनहरा  मौक़ा  देती है..... इसलिए   जब - जब जिंदिगी  में  हार का सामना  करना पड़े  तब  घबराएं  नहीं  और  अपने  अंदर  झाँक कर  अपनी  असली  ताक़त  को पहचाने  और उसका  भरपूर  फायदा  उठाएं." 
 अरशिया  ज़ैदी