10 May 2012

100 saal ki jawaan ....ZOHRA SEHGAL

                 100 साल की  जवान ......जोहरा सहगल 

"अभी  ना जाओ छोड़  कर,  
  के  दिल अभी  भरा नहीं .....
  के केक अभी कटा नहीं ....".ये  लाइने  गुनगुना रही थी मशहूर  थिऐटर  और  फिल्म  एक्टर  जोहरा सहगल..... अपनी 100 वी  साल गिरह  पर एक  बड़ा  सा  केक   काटते  हुए.
27 अप्रैल 1912 को उत्तर  प्रदेश  के  रामपुर  जिले  में  पैदा  हुई  और  सहारन पुर के  रूहेला पठान  ज़मीदार  खानदान  से ताल्लुक़  रखने वाली  जोहरा  सहगल बीती 27 अप्रैल को 100 साल की हो गयी.उनका ज़िक्र आते ही ऐसी  खुश मिज़ाज,अल्ल्हड़ , नटखट  और बिंदास   बुज़ुर्ग  अदा कारा  का चेहरा सामने आता है  जो अपनी  बेमिसाल   एक्टिंग  के लिए तो जानी ही जाती है....  साथ  ही जानी जाती है  जिंदिगी  के लिए अपने जोश  और प्यार  के  लिए .

एक  एक्टर  बनने  के लिए,उन्होंने अपने अंकल  के साथ ,इंग लैंड  तक  का  सफ़र सड़क  के रास्ते,अफगानिस्तान  और इरान  होते  हुए  तय  किया था .जोहरा ने अपने  लम्बे करियर में  Indian People's Theatre और प्रथ्वी राज थिएटर  के साथ  14 साल  तक काम  किया,और आठ  साल  तक  अपने गुरु  उदय  शंकर से   डांस  क्लासेस  ली.फिल्मो में उनका  करियर  धरती के लाल  से  शुरू  हुआ   ....Bhaji on the beach (1992) हम  दिल  दे चुके  सनम , Bend it like Beckham (2002),दिल  से ...(1998),चीनी कम  और  सावरियां उनकी  यादगार  फिल्में हैं   
इसके अलावा  छोटे परदे  पर The Jewel in the crown,(1984),Tandoori Nights (1985-87),Amma & Family(1996) जैसे  मशहूर  टी वी  सीरियल स  में  भी अपने काम से लोगो  के दिलो  पर  अपनी  छाप  छोड़ने  में  कामयाब  रही.

जोहरा  नास्तिक  ख़यालात  की  रही है.ख़ुदा  में  यकीन  न  रखने  वाली जोहरा  ने  जब  मजहब  और जात -पात  से ऊपर उठ  कर अपने से  8 साल  जूनियर .... 'साइंटिस्ट ,डांसर  और  पेंटर'  कामेश्वर  नाथ  सहगल  से  शादी  का  फैसला  किया  तो शुरू  में  माँ - बाप की  रज़ा मंदी  नहीं  मिली  लेकिन  कुछ  वक़्त  के बाद  वो मान  गए  और उन्होंने  शादी  की इज़ाज़त  दे दी. 14  अगस्त  1942 को  उन्होंने  कामेश्वर  नाथ  सहगल  से  शादी कर ली .उनकी शादी के  reception  में  पंडित  जवाहर  लाल  नेहरु  भी शामिल  होने वाले  थे  लेकिन  उन्ही दिनों 'भारत  छोड़ो  आन्दोलन'  में  महात्मा गाँधी  का  साथ  देने  की वजह से  उन्हें  कुछ  दिनों के लिए  गिरफ्तार   कर  लिया और  वो  जोहरा  की  शादी में शामिल   नही  हो सके  थे .

जोहरा  की शख़्सियत  शुरू से ही  रोबदार  और  दूसरो पर  धोंस  जमाने  वाली  थी.1945 में जब वो और  उनकी  बहन  उज़रा  साथ -साथ  प्रथ्वी  थियेटर  में काम  कर रही थी  तो वो  अक्सर ओपरा हाउस  का एक  कोना पकड़  लिया  करती .... और फिर  किसी की मजाल ....की कोई उनका  छोटा सा भी  मेंकअप  का सामान  ले  सके.... यहाँ तक  की छोटी  बहन उज़रा  भी  नहीं ... हालांकि,सब उनकी बेहद  इज्ज़त  करते  थे  और  उनका  मुकाम  बहुत ऊंचा था फिर भी उन्हें .... ये लगता था की उज़रा बेहद गोरी और हसीन  है इसलिए सब उसे ज्यादा प्यार करते है.

वो खूबसूरत  दिखने  और  लोगो  का ध्यान  अपनी  तरफ  खींचने  के लिए  काफी  मशक्कत   करती.....और  उनकी ये चाहत  आज  भी  बरक़रार है . 
"आज  भी वो एक  ऐसी  खूबसूरत  औरत  दिखने की  ख़्वाहिश  अपने दिल में रखती है.जो अंग्रेजो  की तरह  बेहद  गोरी  हो और  जिसकी  आखों का रंग  नीला हो ." 
उनकी जिंदिगी तब थम सी गयी, जब 1959 में उनके शोहर कामेश्वर  सहगल  ने, हमेशा  के लिए  अपनी  आँखें  बंद  कर ली ...और  बेटी किरण   सहगल  और बेटा पवन  सहगल  की  ज़िम्मेदारी अकेली जोहरा सहगल  पर आ गयी.अपनी इस  ज़िम्मेदारी  को  भी उन्होंने  बखूबी निभाया और  बच्चो  की  बेहेतरीन   परवरिश  की .  


जिंदिगी के  उतार - चढाव  उन्हें  कभी हरा  नहीं  पाए  उन्होंने .... अपने  अंदर की  आग  को जलाये  रखा .... बस  आगे चलती गयी ... कभी पीछे  मुड़  कर नहीं  देखा ,अपनी Creativity को बरक़रार रखते  हुए  हमेशा  कुछ  नया ... कुछ  अच्छा  करती गयी .जिसके लिए उन्हें अब तक  पद्म श्री(1998),काली दास  सम्मान ,(2001) जैसे  बड़े खिताबो से नवाज़ा  जा चुका  है.2004  में संगीत  नाटक  अकादमी से  उन्हें Life time achievements  के लिए  fellow ship  दी गयी और  2010  में  पदम् विभूषण  सम्मान  दिया  गया. 
जोहरा  सहगल  की बेटी  किरण  सहगल  ने  अपनी माँ की 100 वी साल  गिरह  पर  पहली Biography "जोहरा सहगल  फैटी"  निकाली  है जिसमे  उन्होंने  जोहरा सहगल   की जिंदिगी के  अन छुये पहलुओं पर  रौशनी  डाली है और  ख़ास तौर  पर "फैटी "लव्ज़  इसलिए  इस्तेमाल  किया है  क्योंकि  उनकी  माँ  अपने  वज़न  को लेकर आज भी  ऐसे ही ऐतिहात  बरतती  हैं ..... जैसे 16 साल  की लड़की ... हर हफ्ते अपना वज़न  तौलने वाली जोहरा सहगल  को अगर ज़रा सा भी  अपना वज़न  बढ़ा हुआ   लगता है,तो वो  फौर न अपनी diet  कम  कर  देती  हैं और दो टोस्ट के बजाये एक टोस्ट  ही लेना  पसंद करती  है. 
जोहरा सहगल वक़्त की बड़ी पाबंद हैं और अपनी घडी को पांच  मिनट  आगे रखती  हैं .....शायद  इसी लिए  वो वक़्त  से  कही आगे हैं, उन्होंने  उम्र  को अपने  ऊपर  कभी  हावी  नहीं होने  दिया....  और  आज  भी मस्ती में गुनगुनाती  हैं .. "अभी तो मैं जवान हूँ ...अभी तो मैं जवान  हूँ " 
अरशिया   ज़ैदी  
    

  












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25 Apr 2012

Ye Kaisa Craze.......

                                                              ये कैसा क्रेज़ !

एक माँ अपनी 14 साल की बेटी  को एक  Educational Institute में ले गयी और काउंसलर से  बोली.... मेरी बेटी को आप किसी ऐसे कोर्स  में admission  दे दीजिये ....जिसमे  ये  ज्यादा से ज्यादा busy रहे.और इसे फेस  बुक और मोबाइल फ़ोन से चिपके रहने का ज़रा भी  वक़्त  न मिले .  
ये तो थी एक माँ की बात ...लेकिन आज आप जिस तरफ नज़र घुमाएँ वहाँ आपको यही हाल मिलेगा ...... कोई मोबाईल पर बातें करते करते घंटो निकाल देता है तो कोई  सोशल नेटवर्किंग साइट्स  पर  चेट करते करते   अपना सारा वक़्त  बर्बाद कर लेता है. 
 कई बार नयी  नवेली-दुल्हन अपने मियाँ से इसलिए खफा  हो जाती  है क्योकि उसका मियाँ उनसे ज़्यादा अपने कंप्यूटर को वक़्त देता  है और ऑफिस  से आकर  भी अपने कंप्यूटर पर गेम खलने  बैठ जाता है.बड़े क्या... बच्चे क्या...  कंप्यूटर गेम का चस्का एक ऐसा चस्का बन गया है जिसके  बाद तो फिर किसी को किसी चीज़ का होश नहीं रहता .
 बेशक  नई-नई technologies और gadgets  ने हमारी जिंदिगी में connectivity को काफी आसान कर दिया है जिससे हम व्यस्त जिंदिगी और वक़्त की कमी के चलते  भी एक- दुसरे से जुड़े रह पाते है.
पर कहते है न ... हद से ज्यादा कोई भी चीज़ बुरी होती है .ये बात अब  मोबाइल  फोन  और सोशल  नेटवर्किंग  साईटस के बारे में भी लागू होने लगी  है.ऐसा लगने लगा है की इन  technologies का इस्तेमाल लोगो के लिए  एक लत .... एक चस्का बनती जा रही है.
 हाल में ही आयी रिसर्च कहती है.....  की ज़रुरत से ज्यादा  मोबाइल फोन के इस्तेमाल से कुछ लोगो के कान भी बजने लगे है....उन्हें बिना फ़ोन की घंटी बजे ही फ़ोन की घंटी सुनायी देती है.  और अगर थोड़ी देर तक उनका फ़ोन न बजे या कोई SMS न आये तो वो बैचेन  होने लगते  हैं . ..... उनके दिल की धड़कने बढ़  जाती है और  वो बार -बार अपने फोन को check करते रहते है.  

लोगो को Mobile Phone को लेकर इतना    obsession होता जा रहा है की वो एक मिनट के   लिए भी अपने फ़ोन को  खुद  से अलग नहीं कर पाते...  और तो और उनका फोन Bath Room में भी उनके साथ  जाता है.कई लोगो को तब तक नींद नहीं आती जब तक उनके ताकिये के पास उनका  मोबाइल  फ़ोन  नहीं रखा होता है .सोते- सोते तक  वो ये चेक करते रहते है की कही उनका कोई  मेसेज तो नहीं आया  ....और इस चक्कर में उनकी वो देर रात तक जागते रहते  है.
रिसर्च में आये ताज़ा आकडे बताते है की मोबाइल फ़ोन और सोशल  नेटवर्किंग साईटस पर बहुत ज्यादा वक़्त गुज़ारने और इन पर  ग़ैर ज़रूरी dependent रहने की  वजह  है ....लोगो के अंदर का अकेलेपन और आत्म सम्मान की कमी.
कई बार जब लोग जिंदिगी के बुरे दौर से गुज़र रहे होते है .... या अकेले रहते हुए अपने आप को Unwanted और lonely महसूस  करने लगते है तब  ऐसे में उनका  मोबाइल फोन उनका एक ऐसा दोस्त बन जाता है जिसका ज्यादा साथ उनके लिए नुकसानदेह  साबित हो सकता है.

इसका असर Offices में .Employees की performance पर भी देखने को मिल रहा है.फेस बुक  और ट्विट्टर जैसी  साइट्स पर ज्यादा वक़्त बिताने  से,उनका out put घटने लगा है.जिसे रोकने के लिए अब Offices में इन साईटस को  block किया जाने लगा है.
अच्छा होगा की हम  इनgadgets को अपनी सहूलियत के लिए इस्तेमाल करके इनका भरपूर फायदा उठाएं और किसी भी हालत में अपनी जिंदिगी पर इसका बुरा असर न पड़ने दे ..इसके लिए कुछ बातों का ख़याल रखा जा सकता  है. 
 खाना खाने से पहले फ़ोन  की  रिंग टोन को हल्का या बंद कर दे ताकी इत्मीनान से खाना खाया जा सके  ..... आपके खाने से ज्यादा ज़रूरी नहीं है  ...बात करना... बात.... खाना खाने के बाद भी की जा सकती है.
अगर आपको लोगो से आमने- सामने बात करते हुए बीच- बीच में फ़ोन पर बात करने और SMS चेक  करने की आदत है तो  अच्छा होगा की आप  ऐसा करने से खुद  को रोके और फोन को switched off कर दें .
मोबाइल के obsession से  छुटकारा पाने के लिए फ़ोन को  दुसरे कमरे में  recharge करे ... ताकी वहाँ तक जाते-जाते  आपका मेसेज पढने का जोश कुछ  कम हो सके.
सोने से पहले फ़ोन को  बंद कर के उसे Good Night ज़रूर कह दें ताकी  आपकी नींद में ख़लल न पड़े और आप चैन से सो सकें . 
फ़ोन पर लम्बी-लम्बी  बात करने से अच्छा होगा की आप अपने दोस्त से रुबरु मुलाक़ात करे और फुर्सत के लम्हे उनके साथ गुज़रें... यकीनन  आपको अच्छा लगेगा.
   अरशिया ज़ैदी  

9 Apr 2012

cake


          केक 

 केक  कटेगा  सब  में बटेगा 
 तुमको मिलेगा हमको मिलेगा 
 जिसने केक को  काटा होगा 
 कुछ  उसके  मूँह  पर भी मलेगा 

 cake  katega sab me batega
 tumko milega  hum ko milega 
 jisne cake ko kata hoga 
 kuch  uske moohn  par bhi malega

 हम सब देख के ललचायेंगे 
 और  केक पर झपट  पड़ेंगे 
 जो  ज़यादा   केक  गटक  जायेगा
 मज़े  तो बस  उसके आयेंगे 

 hum sab dekh ke lalchayenge
 aur cake par  jhapat  padenge
 jo zyada cake  gatat  jayega
 maze to bas uske aayenge

 अरशिया ज़ैदी 
( written on my brother's (Ali) birthday)
  

Meri Inspiration Rekha.........Vidhya baalan

मेरी Inspiration  रेखा .....विद्या बालन 
Vidhya Baalan 
विद्या बालन की ताज़ा- तरीन फिल्म "कहानी "आज कल बड़ी सुर्खियों में है. हर कोई फिल्म के डारेक्टर सुजोय घोष के Direction और विद्या बालन की बेहतरीन    अदाकारी की तारीफ कर रहा है. 
 हम भी काफी दिनों से विद्या बालन की फिल्म कहानी की तारीफ सुन  रहे थे इसलिए ऑफिस से आने के बाद  प्रोग्राम बना लिया Night Show जाने का.
'घर के सामने  महागुन माल में  ही तो जाना  है....5 मिनट में पहुच जायेंगे...'. ये सोच कर इत्मिनान से खाना -वाना खा के निकले,जब हम जब PVR Cinema पहुचे  तो फिल्म शुरू हुए 5 मिनट हो चुके थे ... मूड तो वही ऑफ हो  गया था क्योकि फिल्म का एक सीन भी छूटे ये  हमें गवारा  नहीं... खैर अपनी झुन्ज्लाहट पे क़ाबू करते हम आगे बढ़ने लगे. 
सुजय घोष की फिल्म  कहानी शुरू से ही काफी  दिलचस्प लग रही थी ....7 month  pregnant विद्या बागची ( विधा बालन) अपने  खोये पति को लन्दन  से इंडिया आकर ढूँढ रही थी. इस  suspense thriller देखने के लिए हम इतने excited थे की सिनेमा हॉल की सीढियां चढ़ते  हुए  भी  अँधेरे में स्क्रीन पर अपनी आखें गडाए हुए थे.

सुजोय घोष ने कोलकाता की तंग गलियों में एक बेहेतरीन फिल्म शूट करके ये बता दिया है की एक अच्छी फिल्म को बनाने के लिए फिल्म की  दमदार कहानी के साथ अच्छा direction  भी ज़रूरी है.ज़रूरी नहीं है की फिल्म का बजट आसमान को छुए,फिल्म की शूटिंग विदेशो की  हसीन लोकेशन पर ही हो,या फिल्म में ज्यादा से ज्यादा गाने डाल कर दर्शको को रिझाने की नाकाम कोशिश  की जाएँ .
विद्या बालन अपनी ज्यादा तर फिल्मो में  अलग-अलग तरह के यादगार किरदारों को निभाती  रही है .परिणीता,लगे रहो मुन्ना भाई, नो वन किल्ड जेसिका,गुरु ,पा,इश्किया, द डर्टी पिक्चर ,या  हाल में आयी उनकी नई फिल्म कहानी इसकी मिसाल है. हर फिल्म में उन्होंने एक से बढ़ कर एक Performances दी हैं और हर फिल्म में कुछ नया करके दिखाया है.  
रेखा और विद्या बालन जब एक साथ दिखाई देती है,तो दोनों की शख्सियत काफी हद तक एक-दुसरे से मिलती-जुलती नज़र आती  है फिर चाहे वो इन दोनों के Indian looks हो,कांजीवरम  साड़ी पहेनने का शौक़ हो या फिर,हो इनकी......boldness.विद्या बालन का कहना है की वो  रेखा से बेहद inspired है,जब कोई उन्हें रेखा से मिलाता है तो ये उनके लिए सबसे बड़ा Compliment होता है.    

स्क्रीन अवार्ड्स 2012 में जब  रेखा ने विद्या   बालन की सुपर हिट फिल्म Dirty Picture के मशहूर गाने ऊ ला ला.... ऊ ला ला पे ...अपने बेहेतरीन डांस की झ लक दिखाई  और एक साथ स्टेज शेयर  किया तो ऐसा लगा की ख़ूबसूरत रेखा की बे मिसाल विरासत   को अगर कोई आगे लेकर जा सकता है तो वो है विद्या बालन और सिर्फ ......विद्या बालन

अरशिया  ज़ैदी









27 Mar 2012

                         अजब फ़साना  (Ajab Phasana)

दर्द से हर एक दिल का
रिश्ता बड़ा पुराना है, 
न कोई समझ सका जिसे 
ये वो अजब फ़साना है. 

 Dard se har ek dil ka 
 Rishta bada purana hain 
 na koi samajh saka  jise 
 ye vo  ajab  phasana  hai 

हर शख्स सिलवटो में 
लिपटा सा नज़र आता है, 
अपने दर्द की अलग    
एक दांस्ता सुनाता है 

Har shakhs , silwato mein 
lipta sa nazar aata hai . 
apne dard ki alag
ek daastaan  sunata hai 

उलझी सी जिंदिगी को 
सुलझाने की जुस्तुजू में,  
हसरतो के जाल में 
उलझता ही चला जाता है. 

 Uljhi  see zindigi ko 
suljhane ki  justujo main
hasrato ke jaal main 
ulajhta hi chala  jata hai 

आँसू पलकों से निकलने को 
बेचैन  हुए जाते है 
फिर भी खुश होने का अहसास
 हम दुनिया  को दिए जाते हैं  

 Aansoo palkon se nikalne  ko 
 bechain hue jate hain 
 phir bhi khush  hone ka ahsaas 
 hum duniya  ko diye jaatein  hain 
   
अरशिया ज़ैदी  ( Arshia Zaidi)   

16 Mar 2012

Ek yaad bachpan ki

                            एक याद बचपन की

  आज कुछ फुरर्सत के लम्हे मेरे पास हैं .....सोच रही हूँ की यादो के झरोको से अपने बचपन में झाँकू .... बचपन में झाकते ही कई खट्टी-मीठी यादें,किसी किताब के पन्नो की तरह मेरी नजरो के सामने से गुज़रने लगती है.एक यादगार पन्ना, जहां आकर मेरी सोच कुछ ठहर सी जाती है ,और मुझे उस वक़्त में वापस ले जाती है जब मैं तक़रीबन दस साल की और मेरा भाई रुफी आठ साल का रहा होगा.

हर भाई-बहन की तरह हम भी बहुत झगड़ा करते थे.बात तू-तू मै-मै से शुरू हो कर अक्सर मार-पिटाई पर जाकर ख़त्म होती थी.मेरा प्यारा शैतान-भैया रुफी जो उम्र में मुझसे दो साल छोटा ज़रूर था लेकिन हर बार बाज़ी मार ले जाता था.हमारी लड़ाईयों से अगर कोई सबसे ज्यादा परेशान था .... तो वो थीं हमारी मम्मी.वो मुझे बार बार भइया से दूर रहने और लड़ाई न करने की हिदायत देती लेकिन मैं उनकी एक न सुनती.....और बार-बार झगड़ा करने के बाद भी अपने भैया के आस-पास ही रहना पसंद करती .... शायद इसलिए .....की मुझे उसके बिना ज़रा भी चैन नहीं था और मैं  उससे ज्यादा देर तक नाराज़ भी नहीं रह सकती थी. 
एक शाम  ... घर में सब लोग किसी पार्टी में जाने की तैयारी कर रहे थे. मम्मी ने हमेशा की तरह मुझे और रुफी  को पहले ही तैयार कर दिया था.खेल-खेल में हम दोनों की लड़ाई हुई और बात घूसों-लातो तक पहुच गयी.उस लड़ाई में मेरा पडला भरी रहा और मैने रुफी की पिटाई कर ली.
  मैं जानती थी कि मेरा नटखट  भैया मुझसे बदला ज़रूर लेगा,क्योंकि अक्सर ऐसी लडाई के बाद वो मुझे मारने भागता.... और मैं जल्दी से कमरे में जाकर छुप जाती,दरवाज़े को अंदर से बंद कर लेती....इस पर उसे और भी  ज़्यादा गुस्सा आता था.वो ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़े को धक्का देकर दरवाज़ा खोलने की  कोशिश करता  .... जब कभी  दरवाज़ा नही खुल पाता तो वो मुझे बहकाने के लिए  झूट-मूठ कहता अरे मेरी उंगली पिच गयी".जल्दी से दरवाज़ा खोलो.और मैं  झट से दरवाज़ा खोल देती...(इस डर से,कही सच में उसकी उंगली न पिच जाये) और दरवाज़ा खोलते ही रुफी को अपने सामने,शरारत से मुस्कुराता हुआ खड़ा पाती और फिर तो,मेरी ख़ैर नहीं होती थी.
उस दिन भी कुछ ऐसा  ही हुआ था .... दरवाज़ा बंद रखने के लिए मैंने  अपने दोनों हाथो की ताक़त लगा रखी थी ....दरवाज़े पर लगी चटख़नी भी कमज़ोर थी. 2-3 बार जोर से धक्का देने पर खुल जाती थी.उधर दरवाज़ा न खुल पाने की वजह से रुफी का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था ....वो दरवाज़े को जोर जोर से धक्का दे रहा था.अचानक उसने चिल्ला कर कहा ....  मेरी उंगली पिच गयी"....रेनी जल्दी से दरवाज़ा खोलो "..मैंने दिल ही दिल में सोचा ....
"अच्छा बच्चू....फिर एक बार तुम  मुझे बेवकूफ़ बना रहे हो  .....लेकिन इस बार मैं  तुम्हारी  बातो में नहीं आने वाली".
ये सब बातें दिल ही दिल में सोचते हुए मैंने और कस के दरवाज़ा बंद कर लिया.
अभी मैं अपने ख़यालो में उलझी हुई थी की,बाहर से मेरी अतिया फुप्पो  की आवाज़ आयी ....."रेनी जल्दी से दरवाज़ा खोलो....... रुफी की उंगली सच में, दरवाज़े के बीच में आ गयी है ."ये सुनते ही मैंने झट से दरवाजा खोल दिया और सामने  जो देखा......उसे देख कर मेरे तो होश उड़ गए  ....मेरा प्यारा भैया दर्द से बेहाल हो रहा था,उसका भोला-भाला मासूम चेहरा आँसूओ से तर था.उंगली से बुरी तरह खून बह रहा था,खाल आपस में चिपक गयी थी और नाख़ून उंगली से अलग हो चुका था. 
इतने में शोर सुन कर मम्मी बाहर आ गयी,और रुफी की यह हालत देख सन्न रह गयी ...लेकिन जल्दी ही उन्होंने खुद को सभाल लिया.बिना घबराये रुफी के हाथ पर डिटोल लगा कर पट्टी बाधी और मुझे पड़ोस में रहने वाले अज़ीज़ मामू को बुलाने भेज दिया.
 अज़ीज़ मामू एक बेहद नेक दिल और हमदर्द इंसान थे,जिन्हें हम प्यार से 'मामू' कहते थे.मैने जल्दी-जल्दी उन्हें सारी बात बतायी.वो घर आ गए और रुफी को फ़ौरन डॉक्टर चड्डा के पास ले जाकर  मरहम पट्टी करवा दी.
    घर में सब मुझसे बेहद नाराज़ थे.उसके बाद जो मेरी क्लास लगी है...उसके बारे में क्या बताऊ ? रुफी हमारे ताया-जानी(बड़े अब्बा) का बहुत लाडला भतीजा था. अपने लाडले की ये हालत देख कर ताया-जानी को मुझ पर बहुत ग़ुस्सा आया था ... मुझे अभी भी याद है ... उस वक़्त वो कघी से अपने बाल बना रहे थे... जैसे ही उन्होंने मुझे देखा... उन्हें और ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने उसी कघी से मेरी पिटाई कर दी थी,उस बेचारे कंघे को भी थोड़ी बहुत चोट आयी थी और वो टूट गया था. 
ऐसा लग रहा था की शायद भेड़िया आया-भेड़िया आया,वाली कहानी सच हो गयी थी.खेल ही खेल में एक बड़ा हादसा हो गया था,जिसकी वजह से मेरे भैया को बहुत दर्द सहना पड़ा था.जो कुछ हुआ वो अनजाने में हुआ ... लेकिन बेहद बुरा हुआ था.. 
रुफी की उंगली को ठीक होने में कई दिन लग गए थे...उसकी उंगली तो ठीक हो गयी लेकिन उस उंगली पर पूरा नाख़ून कभी न आ सका.जिसको देख कर आज भी मुझे अफ़सोस होता है..
अरे आप किस सोच में डूब गए ....क्या आप को भी अपने बचपन की कुछ शरारते याद आ गयी ? अगर आप ये सोच रहे है कि इस हादसे के बाद   हम सुधर गए होंगे और हमने झगड़ा करना बंद कर दिया होगा ... तो आप गलत समझ रहे है.उसके बाद भी हम झगड़ा करते रहे..... आज भी करते है लेकिन थोड़ी तमीज़ से !!!
 अरशिया  ज़ैदी



25 Feb 2012

A New Dawn.......

                                       एक नई सुबह 
 शादी मुबारक...ये मुबारकबाद है गुजरात के वाडिया गावं की उन लड्कियो के लिए,जो 11 मार्च 2012 को एक नया इतिहास रचने वाली है.Prostitution के लिए बदनाम इस गावं की 15 मासूम लड्कियो को Prostitution के पुश्तैनी कारोबार से निकाल कर उनकी शादी करवाई जा रही है.... वो भी एक साथ....एक ही  मंडप में. इस नेक काम को अंजाम दिया है विचार्थी जाति समुदाय समर्थन मंच नाम की एक NGO ने...जिसने उन लाखो लडकियों को एक उम्मीद की किरण दी है जो इस अँधेरे भरी जिंदिगी  से निकलना चाहती है.
यूं तो भारत की आज़ादी के 65 बरस बीत चुके है. लेकिन इस गावं  की लड़कियों को  सही माएने  में आज़ादी अब नसीब हो रही है.कहा जाता है  की सालो से,इस ग़ाव की लड़कियों को ज़बरदस्ती Prostitution के  कारोबार में धकेला जाता रहा है.इनकी कमाई से इनके घर के चूल्हे जलते रहे है और इनके घर के मर्द ठाट से अपनी जिंदिगी गुज़ारते रहे है.
Red Light Zone,Prostitution .....ये लफ्ज़ ऐसे है जिनके बारे में आम तौर पर  हम बात नहीं करना चाहते .. या फिर करते भी है तो बेहद ढके छुपे अंदाज़ में.उन लड़कियों को बेहद गिरी हुई नज़र से देखा जाता है जो जिस्म फरोशी के इस कारोबार में रहकर अपनी रोज़ी रोटी कमा रही हैं.  
एक लम्हे के लिए भी हम रुक कर.........ये नहीं सोचते की इस तरह की जिंदिगी जीने के पीछे उनकी क्या मजबूरियां रही होंगी? 
आम तौर पर कोई भी लड़की जान बूझ कर तो इस गन्दी दलदल में नहीं आना चाहेगी...जिस पर बीतती है,शायद वही जान पाता है.इसके लिए कई बार तो उनके घर के हालात,माँ-बाप का बर्ताव ज़िम्मेदार होते है तो कभी जानलेवा भूखमरी और ग़रीबी उन्हें तोड़कर रख देती है जिसके चलते वो कुछ ऐसे लोगो की झूटी हमदर्दी के शिकार हो जाती हैं जो उनकी मजबूरी का फायदा उठाना चाहते है.और जब उन्हें असलियत का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
कही न कही इनके लिए हमारा रवैया और हमारी सोच भी ज़िम्मेदार रही  है.अगर इस ज़िल्लत भरी जिंदिगी से निकलने के लिए कोई लड़की हमारी तरफ हाथ बढ़ाये, तो हम पहले तो उसकी मदद ही नहीं करते और कभी मदद करना भी चाहें तो बदनामी का डर हमें रोक देता है.
शुक्र है इस NGO का,जिसने एक बेहद अच्छी पहल की है उम्मीद की जानी चाहिए की बाक़ी prostitutes की  जिंदिगी को भी बेहतर बनाने के लिए कुछ और ठोस कदम उठाये जायेंगे ताकी उनकी जिंदिगी मुस्कुराहटो से भर सके और वो एक अच्छी जिंदिगी जी सके.
   
    अरशिया  ज़ैदी




15 Feb 2012

Are We Civilized ?

   .
                               क्या हम civilized हैं ?

मॉरिशस के साफ़-सुथरे ख़ूबसूरत बीच पर किसी tourist ने सिगरेट पी कर फेक दिया था... जिसे वहाँ के लोगो ने फौरन नोटिस किया और उस बन्दे को उसकी ग़लती का अहसास कराते हुए सिगरेट का टुकड़ा वहाँ न फेकने की हिदायत की.ये क़िस्सा बताया....मेरी दोस्त अनु ने,जो हाल ही में मॉरिशस घूम कर आयी है.
दूसरी तरफ अब ज़रा अपने देश का हाल सुनिए...जिसे अभी हाल ही में दुनिया की जानी मानी टॉक शो होस्ट Oprah Winfrey ने अपने  भारत दौरे में महसूस किया,उन्हें ये देख कर बेहद हैरानी हुई की यहाँ पर कुछ लोग सड़को पर रेड लाइट  होने पर भी  नहीं  रुक रहे थे और traffic rules को ताख़ में रख कर अपनी-अपनी गाडियों को दौड़ाए जा रहे थे.
एक भारतीय,एक हिन्दुस्तानी होने के  नाते ये सुन कर मेरा सर तो शर्म से झुक गया.कही कुछ था जो मुझे अपने गिरेबान में झाकने को मजबूर कर रहा था. 
यह Civic Sense, ये तमीज़ हम हिन्दुस्तानियों में क्यों नहीं है ?क्यों हमारे तौर तरीके ऐसे है जिससे दूसरो को परेशानी होती है ... और हमारे सर पर जूं भी नहीं रेंगती . 
हम पब्लिक प्लेसेस और सडको पर कूड़े-करकट के ढेर जमा करने में ज़रा भी नहीं हिचकिताते.बड़े बड़े डस्टबिन रखे होने के बावजूद फलो के छिलके,पोलिथीन बैग,खाने-पीने की चीजों के पैकेट,जहा खड़े होते है वही बड़ी लापरवाही से फेक देते है और तो और,साफ़ -सुथरी दीवारें हमें अच्छी नहीं लगती इसलिए थूक और पान की पीको के निशान से,साफ़ दीवारों को गन्दा करने में भी हम पीछे नहीं रहते .  
 
सब जानते है की पोलीथिन बैग नालियों में डालने से नालियां चोक हो जाती है जिसकी वजह से गन्दा पानी सड़को पर बहने लगता है और लोगो को उस गंदे पानी के ऊपर से फलांग कर जाना पड़ता है.लेकिन फिर भी लोग इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं करते.
हमारी सोच ऐसी हो गयी है कि बस हमें कोई दिक्क़त   नहीं होनी चाहिए.बाकी किसी को हमारे तौर तरीक़े से कोई परेशानी हो...तो हमारी बला से.
सफाई करने वाले आयेंगे...वही साफ़ करेंगे.सारी उम्मीदें सरकार से ही है. . भला क्यों ? आधी ज़िम्मेदारी तो हमारी भी बनती है.अगर सफाई करवाना सरकार का काम है तो गन्दगी न फैलाते हुए सफाई को बनाये रखना हमारी ज़िम्मेदारी है.सरकार और हम मिलकर काम करेंगे,तभी तो बात बन पायेगी.
टिकेट काउंटर हो या बुकिंग विंडो,कुछ लोग क्यू में खड़े होकर अपना नंबर आने का, ज़रा सा भी इन्तिज़ार नहीं करना चाहते,लेकिन अपना काम वो सबसे पहले हो जाने की उम्मीद ज़रूर करते है.इसी बेसब्री और बत्तामीज़ी के चलते जरा सी देर में,हालात बिगड़ जाते है और हाय-तौबा मच जाती है.पुलिस के लिए हालात पर क़ाबू पाना मुश्किल हो जाता है और जनता परेशान होती है वो अलग.

हमारे देश में बेहतरीन Tourism होते के बाद भी हमारी Tourism- Industry घाटे में जाती जा रही है.वजह सामने है ....अगर  हम  घर आये मेहमान के साथ अच्छा बर्ताव नहीं  करेंगे तो हमारे घर कौन आएगा ?शायद हम "अतिथि देवो भवा:"का रिवाज भुला बैठे है .कई बार टूरिस्ट हमारे बारे में बहुत बुरा Impression ले कर वापस जाते है.कुछ बेहूदा लोगो की वजह से इन मेहमानों को कई परेशानीयो का सामना करना पड़ जाता  है.... कभी  सामान चोरी हो जाता है तो कभी उनके साथ बदसुलूकी और धोखा-धडी हो जाती है. जो हर हिन्दुस्तानी को शर्म सार करने के लिए काफी है .
कुछ इसी तरह की परेशानिया हमें अपने घर और पास-पड़ोस में भी झेलने को मिलती रहती है.पड़ोसी कोई भी चीज़ ये कह कर ले जायेंगे... कि काम ख़त्म होने के बाद वापस कर देंगे  .... लेकिन उनका 'वो कल' कभी नहीं आता.भले ही आप को आपकी चीज़ की कितनी भी ज़रुरत हो,लिहाज़ और शराफत के मारे आप,अगले बन्दे की मदद करने की नियत से उससे ' न' नहीं कहेंगे और वो आपको वक़्त पर आपकी चीज़ लौटाएगा - नहीं......आखिर परेशान होकर,आपको ही अपनी चीज़ वापस लेने पड़ोसी के पास जाना पड़ेगा. 
    पढ़ने के शौक़ीन लोग अपने पास अच्छी किताबो  का collection रखना पसंद करते है.जिन्हें अक्सर दोस्त लोग पढने के लिए मांग कर ले जाते है.किताबे देना किसी को बुरा नहीं लगता,बल्कि अच्छा लगता है.यहाँ तक तो बात ठीक है,लेकिन बुरा तब लगता है जब आपकी किताब कोई मांग कर ले जाये और पढ़ कर वापस करने की कोई सुध ही न ले,और बार बार तकाज़ा करने पर जब किताब वापस करे तो उस पर या तो हल्दी-तेल के धब्बे लगे हो,या फिर किताब फटी हुई हो.तब ये ज़रूर लगता है की शायद हमने इस बन्दे को किताब दे कर गलती कर दी.और ये ग़लती अब दुबारा नहीं करनी है.
कहते है ज़रुरत पर जो काम आ जाये वो आपका सच्चा साथी होता है और अगर ज़रुरत पैसे की हो,और आपका कोई हमदर्द आपकी उस ज़रुरत को पूरा कर दे तो आप इसे क्या कहेंगे? .....आप उसके अहसान मंद होंगे न .......और दिल ही दिल में जल्दी से जल्दी उसके पैसे लौटने का इरादा करेंगे!
 कई बार हक़ीक़त इसके उलट हो जाती है जनाब .... कुछ लोग पैसे लेने के बाद उसे लौटना याद नहीं रखते, और आज-कल पे टालते रहते है.जबकि अपनी दुनिया भर की सारी ज़रूरते पूरी करते रहते है.उधार देने वाला शख्स तकाज़ा करने में शर्म महसूस  करता है और सोचता  रहता है की ...कब मेरे पैसे वापस मिले और  मैं अपने रुके हुए ख़र्च पूरे करू .

कुछ लोगो का celebration तब तक पूरा नहीं होता जब तक वो अपने घर का शोर लाउड-स्पीकर के ज़रिये पड़ोसियों को न सुनवा दे.किसी बीमार को लाउड-स्पीकर के शोर से तकलीफ हो रही हो,या किसी की नींद खराब हो रही हो उन्हें इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता.अरे भई ...आपके घर कोई celebration है बहुत अच्छी बात है,यक़ीनन आप से प्यार करने वाले आपके दोस्त और रिश्ते दार आप की ख़ुशी में शामिल होंगे क्या इतना काफी नहीं है आपके लिए? ...जो आप लाउड -स्पीकर के शोर से लोगो के कान के परदे फाड़ देने पर तुले हुए है.
    

इस तरह के खट्टे -मीठे तजुरबो से हम सभी को आये दिन दो चार होना पड़ता है.दूसरो में Civic Sense जागने का इन्तिज़ार करेंगे तो सिर्फ इन्तिज़ार ही करते रह जायेंगे. क्यों न इस से निपटने के लिए पहल अपने ही घर से, और अभी की जाये? ...   क्यों न खुद इस बात का ध्यान रक्खा जाये की हमारा कोई भी तौर-तरीक़ा दूसरो की परेशानी का सबब न बन सके और हम अपना देश,अपना शहर, अपनी गलियों को साफ़ -सुथरा बनाये रखने की ज़िम्मेदारी को बखूबी पूरा कर सके. 

अरशिया  ज़ैदी  






















  



















14 Jan 2012

YOG AUR SEHAT


                                              योग और सेहत
आज हम जिस तरह का लाइफ स्टाइल जी रहे है उसमें,ना तो हमारे पास तसल्ली से खाना खाने का वक़्त है और न ही पूरी नींद सोने का, दुनियावी  चमक-दमक और पैसा कमाने का जूनून हम पर इस क़दर हावी हो चला है कि हम अपनी सेहत को भी नज़र अंदाज़ कर बैठे हैं.
आज हम जिस हवा में सांस ले रहे है वो polluted हो चुकी है,जो खाना हम खाते है उसमेpesticidesमिले हुए है यहाँ तक की पीने का पानी भी साफ़ नहीं मिल पाता.ऊपर से स्ट्रेस भरी भाग दौड़ की जिंदिगी ने  लोगो का जीना  मुहाल कर रखा है.तरह-तरह की नई नई बीमारियाँ हमें घेरती जा रही है.महगे इलाज,अस्पताल का खर्च और डॉक्टर की फीस ने आम आदमी की जेब ख़ाली कर दी है.
आज हर किसी को अच्छी सेहत और दिल के सुकून की तलाश है जिसे पाने के लिए योगासन और प्राणायाम से बेहतर तरीक़ा और कोई नहीं है.इस प्रक्टिस को लगातार करते रहने से,जो बीमार है वो अच्छे हो जाते है और जो सेहतमंद है उनके पास सेहत का अनमोल खज़ाना बना रहता है.  
      प्राणायाम साँसों को सही ढंग से लेने की वो टेक्नीक है जिससे बॉडी के हर cell को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है,वो activeऔर healthy  बने रहते  है.यहाँ तक की कई बार dead cells भी एक्टिव होकर सही ढंग के काम करना शुरू कर देते है.साँसों को सही ढंग से लेने और छोड़ने का ये तरीक़ा शरीर के टोक्सिन्स(toxins)को बाहर फेक कर सभी organs को  healthy रखता है.
प्राणायाम में 6 तरह की exercises करवाई जाती है ये है -
1-भस्त्रिका प्राणायाम 2-कपाल भाति प्राणायाम 3-बह्य प्राणायाम 
4-अनुलोम प्राणायाम 5-ब्रह्मरी  प्राणायाम 6-उद्गीत प्राणायाम .
 योगभ्यास और प्राणायाम  करके लोग,0%खर्च,0%साइड एफ्फेक्ट और100 %फायदा उठा रहे है यहाँ तक की,कई बार जब डॉक्टर उम्मीद छोड़ बैठे है और मरीज़ से कह दिया है"की आपकी बीमारी का कोई इलाज नहीं है,आपको  ठीक रहने के लिए जिंदिगी बार दवाएं खानी होंगी"तब योग ने अपना कमाल दिखाया है.अनुलोम-विलोम,कपाल-भाति कर के मरीजों ने नयी जिंदिगी पायी है,और दवाओं को अलविदा कहा है .
     योग करने के लिए किसी ख़ास उम्र की दरकार नहीं है.ये किसी उम्र में भी  शुरू किया जा सकता है.यहाँ तक की छोटे मासूम बच्चे,जिन्हें बोलना भले ही नहीं आता हो पर वो अनुलोम-विलोम और कपाल-भाति का मतलब अच्छी तरह समझते है और कहने पर,एक्टिंग कर के भी दिखा देते है. 
     दूसरी तरफ ऐसे लोगो की तादाद भी कम नहीं है जिन्हें योग से होने वाले सारे फायदों के बारे में पूरी जानकारी तो है पर काहिली की चलते योगाभ्यास करने में टाल मटोल करते रहते है.बीमार पड़ जाने पर,पहले तो दवाईयां खा-खा कर सेहतयाब होने की हर मुमकिन कोशिश करते है लेकिन ख़ुदा न ख़स्ता,सारे इलाज कराने के बाद भी अगर बीमारी ठीक नहीं होती तो ये dialogueबोल कर खुद को तस्सली देने की कोशिश करते है ...."कि क्या करे किस्मत में यही लिखा था" ... या "ऊपर वाले की यही मर्ज़ी थी" .
इस तरह की सोच रखने वाले लोगो को दर्द से करहाते हुए,डॉक्टर के यहाँ चक्कर लगाना और पैसे को पानी की तरह बहाना तो मंज़ूर होता है पर बेहतर सेहत के लिए योग और प्राणायाम करना गवारा नहीं होता.
   योग की बात चले  और बाबा राम देव का ज़िक्र ना आये,ऐसा तो हो ही नहीं सकता.यूं तो योग की खोज महाऋषि पतंजलि ने पांच हज़ार पहले की थी पर आस्था टीवी के ज़रिये इसे घर-घर पहुचने की पहल बाबा रामदेव ने की थी.उन्होंने योग और प्राणायाम को आम लोगो की लिए खास बना दिया है,उनकी कही हुए बातें लोग,बड़े ध्यान से सुनते और समझते थे उनकी मजाक भरी चुटकियाँ लोगो को हसने पर मजबूर कर देती थी.उनकी बात में कितना दम था इसका अंदाज़ा तो इसी बात से लगाया जा सकता है, की जब उन्होंने पेप्सी और कोकाकोला जैसे बड़े ब्रांड के कोल्ड ड्रिंक कोToilet Cleaner का नाम देते हुए,लोगो को,इसे न पीने की हिदायत दी तो लोगो ने इन कोल्ड ड्रिंक्स को पीना तक छोड़ दिया था जिसकी वजह से न सिर्फ इन विदेशी कंपनीयो को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था बल्कि इसका बाज़ार भी उन दिनों  काफी डाउन हो गया था.
    बाबा रामदेव जनता की सेहत को सुधारने में पूरी तरह कामयाब रहे लेकिन जब उन्होंने समाज की सेहत को बेहतर बनाने के लिए हिन्दुस्तान की राजनीती में कदम ज़माने की कोशिश की तो वहाँ बात बिगड़ गयी और वो एक के बाद एक नई controversyमें फसते चले गए इससे उनकी इमेज को ज़बरदस्त धक्का लगा.
   योग करने के फायदे तब ही महसूस हो पाते है जब कोई खुद लगातार प्रक्टिस करता रहता है.अगर आप अपनी जिंदिगी में कुछ करना चाहते  है,कुछ पाना चाहते है तो इसके लिए आपको फिट रहना ज़रूरी है,अच्छी सेहत के बिना आप कुछ हासिल नहीं कर सकते.यूं तो कोई भी,किसी भी उम्र में बीमार हो सकता है,लेकिन अगर अपने आप पर,थोड़ी सी मेहनत करके जिंदिगी को सेहत मंद और चुस्त दुरुस्त और ख़ुशगवार  बनाया जा सकता है तो इसमें हर्ज ही क्या है!  

 अरशिया  ज़ैदी





7 Jan 2012

UMEED (HOPE)


                                        
26 जून 2011की बात है.दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में National Eligibility Test(NET) के exam में मेरी ड्यूटी लगी हुई थी.मैं कंट्रोल रूम में authorities से Instructions मिलने का इन्तिज़ार कर रही थी, इतने में एक 26-27 साल का नौजवान कमरे में दाखिल हुआ,गोरा रंग, दरमयाना क़द,चेहरे पर हलकी सी दाढ़ी,और self confidence से दमकता चेहरा..... ब्लू कलर की शर्ट और स्काई ब्लू कलर की जींस पहने इस लड़के ने कंधे पर एक rucksack बैग डाल रखा था .
      कमरे में आकर उसने कहा "मेरा नाम मोहम्मद आतिफ है प्लीज़ मुझे मेरा रूम नंबर बता दीजिये.( फिर थोडा रुक कर)am a person with special needs.मैं ठीक से पढ़ नहीं सकता, मेरी आँखों की रौशनी सिर्फ 40% है .क्या आप मुझे एक writer भी available करा देंगे?"ये कहते हुए उसने अपने हाथ में पकड़ी लम्बी सी अलमुनियम की छड़ी को कस कर दबाया.
Authorities ने मेरा नाम पुकारा और मो.आतिफ का टेस्ट पेपर और आंसर शीट पकडाते हुए इस student के साथ रूम नंबर-5 में जाने को कहा.
रूम नंबर-5 दूसरी मंजिल पर था,जिस पर सीढ़ीयो से जाना था.आतिफ ने बिना मेरी मदद लिए, आहिस्ता-आहिस्ता खुद सीढ़ीया चढ़ी.पेपर शुरू होने में सिर्फ15 मिनट बाक़ी थे.उसने फुर्ती से अपना बैग खोला और एक एक्सटेनशन कॉर्ड ,टेबल लेम्प, बहुत मोटे लेंस का चश्मा,ब्लाइंड स्टिक और Magnifying lens निकाल कर मेज़ पर रख दिया ... फिर मुझसे पूछा.......
              ''क्या यहाँ कही Extension cord लगाने की लिए socket है? मुझे टेबल लेम्प का प्लग लगाना है कमरे में रौशनी कम है ... मुझे ठीक से दिखेगा नहीं." 
मैंने इधर उधर देखा,स्विच बोर्ड मुझे कही नज़र नहीं आया,किसी fault की वजह से AC भी नहीं चल रहा था.इसलिए गर्मी की वजह से हाल और भी ज़्यादा बेहाल हो गया था.शिकायत करने पर बिजली वाला आया लेकिन वोAC की fault नहीं ढूढ सका हाँ उसने इतनी मेहरबानी ज़रूर की कि उसने हम लोगो को,उसी हाल नुमा कमरे के दूसरे हिस्से में बैठा दिया जहांACचल रहा था.
    यहाँ आते ही गर्मी से थोड़ी राहत मिली. मैंने जल्दी जल्दी उसका सामान दूसरी टेबल पर रखवा कर टेबल लेम्प का प्लग सामने लगे सोकेट में लगा दिया.आतिफ ने मुस्कुरा कर थैंक्स कहा और मुझसे अपनी Answer sheet  में उसका नाम,रोल नंबर वगेहरा भरने की request की.आतिफ का admit card देख कर मैंने उसकी सारी details कॉपी में भर दी.इन सारी formalities को पूरा करने में15मिनट और लग गए.पेपर शुरू हो चुका था और आतिफ ने पेपर लिखना अभी शुरू भी नहीं किया था.
        पहला पेपर objective question-answer का था.आतिफ ने कहा 
"मैम आप पहले मेरे लिए question पढ़ें  और फिर नीचे लिखे उसके answer,मैं जो answer बताऊ  ... आप उसे  आंसर शीट में टिक कर दीजिये.''
मैं उसके लिए invigilator/writer दोनों की तरह काम कर रही थी.वो मुझे आंसर  बता रहा था और मैं टिक करती जा रही थी.कई बार तो वो मेरे आंसर  के options पढने से पहले ही झट से जवाब  बता देता,फिर चाहें वो सब्जेक्ट General-knowledge का हो,Reasoning का हो या फिर हो English,हर Subject की उसने ज़बरदस्त तैयारी कर रखी थी.वो भी आँखों के साथ दिए बिना! उसने15 min.देर से पेपर शुरू करने के बाद भी तय वक़्त में पेपर पूरा कर लिया था.जो वाकई क़बीले तारीफ़ था
         पहले पेपर के बाद एक घंटे का ब्रेक था.मैंने आतिफ से पूछा कि
 "क्या आप 2nd पेपर शुरू होने तक यहीं रूम में बैठ कर इन्तिज़ार करेंगे"?
 "नहीं मैं इस ब्रेक में सबसे पहले मस्जिद जाऊँगा,नमाज़ पढूंगा तब कुछ खाऊँगा"उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया. 
  M.Com में गोल्ड मेडलिस्ट रह चुका ये लड़का अब P.hd कर रहा था न  वो मायूस था और न ही हताश .... बस थी तो कुछ बन जाने की लगन और जूनून.उसका ये Never Give Up वाला positive attitude कही न कही मुझे भी inspire कर रहा था.
    2nd paper descriptive था जिसमे लम्बे answers लिखने थे.उस वक़्त आतिफ को देख कर मैं यही सोच रही थी की अब ये कैसे लिखेगा लम्बे answers! . ..मुझे ही लिखने होंगे....तेज़ी से.अभी मैं अपने सवालो में ही उलझी थी कि मैंने उसको एक magnifying lens लगा कर पेपर पढने की कोशिश करते हुए देखा. 
"इस से मेरी नज़र का धुंधलापन कुछ कम हो जायेगा और आसानी से पेपर लिख लूँगा" मेरे अनकहे सवाल का जवाब देते हुए उसने कहा.फिर  बेहद मोटे लेन्स का चश्मा अपनी आखों पर चढ़ा कर मुझसे सवाल पढने को कहा.
मैंने आतिफ को question पढ़ कर सुनाया जिसे उसने दोहराते हुए समझने की कोशिश की फिर दोबारा मुझसे सवाल पढ़ने को कहा,इस तरह मैंने उसके हर सवाल को रुक-रुक कर कई-कई बार पढ़ा.सवाल को अच्छी तरह समझने के बाद उसने कॉपी खोलते हुए मुझसे पूछा...
."मैंम कॉपी के पेज पर लाइन कहा से शुरू हो रही है".
.मैंने उसकी उंगली पेज की लाइन पर रख दी....उसने पूरे पेज को हाथ से छु कर अंदाज़ा लगाया. 
फिर अगला सवाल किया-"एक answer लिखने के लिए कितने पेज की जगह दी गयी है"?और मेरे बताते ही बिना देर किये उसने तेज़ी से लिखना शुरू कर दिया.
 आम तौर पर लोगो की hand writing जल्दी जल्दी लिखने में अक्सर टेडी मेढ़ी और गन्दी हो जाती है. मुझे इस बात की curiosity थी की कि आतिफ कैसे लिखेगा? ...और ये देख कर मैं हैरान रह गयी की वो बड़े आराम से लिख पा रहा था.उसकी handwriting शुरू से लेकर आख़िर तक एक सी थी,एक दम साफ़-सुथरी, ना तो कोई लव्ज़ लाइन के बाहर निकला था और न ही कोई लाइन टेढ़ी -मेढ़ी हुई थी.
    आतिफ लिखते-लिखते बीच-बीच में टाइम भी पूछता जा रहा था ताकी पेपर छूटे नहीं  ...वो सर झुकाए तेज़ी से लिखता जा रहा था.और बीच-बीच में बातें करके अपना दर्द भी बांटता जा रहा था.
     "मैम मेरी नज़र बचपन में कमज़ोर नहीं थी पर धीरे धीरे कमज़ोर होने लगी और चश्मा लग गया फिर कुछ वक़्त के बाद चश्मे से भी दिखना बंद हो गया,अब मैं magnifying lens से पढ़ता हूँ.मेरी इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है ... इस बीमारी में नज़र धीरे धीरे कमज़ोर हो जाती है और कुछ वक़्त के बाद पूरी तरह से दिखना  बंद हो जाता है"
ये कह कर उसने एक आह भरी और चुप हो गया ..... कुछ लम्हों तक माहौल में ख़ामोशी की बर्फ सी जमी रही......
  फिर कुछ देर बाद उसने ख़ामोशी तोड़ते हुए आगे बताया   .... 
    "पता है मैम,मेरे 'सर' जिनके अंडर मैं Ph.d कर रहा हूँ उन्हें भी same problem है मेरी तरह .... अब उन्हें दिखाई देना बिलकुल बंद हो गया है मेरे साथ भी ऐसा ही होगा.पर सोचता हूँ कि तब-तक मैं settle हो जाऊ.Net का इम्तेहान तो मैं पहले भी पास कर चुका हूँ अब दुबारा Junior Research fellowship(JRF) के लिए ये exam दे रहा हूँ ... ताकि मुझे scholarship  मिल सके और मैं आगे की पढाई कर सकू. .."
 मैं दुःख और बेबसी से उसकी दर्द भरी दास्तान सुनती जा रही थी. मेरे पास लव्ज़ नहीं थे जिनसे मैं उसको तसल्ली देती ....और अगर तसल्ली देती भी तो क्या कहती ?
     ये पेपर भी उसने तय वक़्त में पूरा कर लिया.कॉपी मुझे दे कर उसने  धीरे धीरे एक-एक करके अपना सामान बैग में रखा और हम नीचे आ गए.जब मैं उसकी कॉपी जमा कराने कंट्रोल-रूम जाने लगी तो उसने कहा....
"मैम आपने मेरी अच्छी help की.पूरे question paper को अच्छी तरह से explain किया ... प्लीज़ आप मेरे लिए दुआ करिएगा कि मैं इस एक्साम  को पास कर लूं."
मैंने मुस्कुरा कर"आमीन" कहा ... और कंट्रोल रूम की तरफ बढ़ गयी.

अरशिया  ज़ैदी

1 Jan 2012

Shayari



                          मशाल

बदलते साल में पिछले बरस के देखे हुए 
अधूरे खुआब हक़ीक़त में ढल भी सकते है.
 अगर लगन हो,य़की और प्यार का जज़्बा 
तुम्हारे सामने पत्थर पिघल भी सकते है.
                
 मशाल इल्मो जुनूं की जला के हम सब लोग 
 कुरीतियों की फनो को कुचल भी सकते है. 
  गरीब बस्ती में फैले हुए अंधेरो को 
 चमकते इल्म के सूरज निगल भी सकते है. 

हमारे प्यार की झप्पी से ही फ़क़त ऐ दोस्त 
सिसकते भूख से बच्चे बहल भी सकते है.  
अगर हम मिलके कुछ कुर्बानियों का अहद कर ले 
तो इस समाज की किस्मत बदल भी सकते है.

वो तपती रेत,अगर कर्बला की जहन में हो 
दहकती आग पे इंसान चल भी सकते है.
छिपा है दर्द हर एक क़ेह्क्हे के दामन में 
हर एक आँख से आंसू निकाल भी सकता है.
             
नाकामयाबी को जोड़ो न अपनी क़िस्मत से 
 सितारे चाल को अपनी बदल भी सकते है. 
 तू अपने हाथो की मेहनत पे ऐतबार तो कर 
 के तेरे हाथ की रेखा बदल भी सकते है. 
  
अरशिया  ज़ैदी