15 Jul 2012

Bheege Bheege Mausam Me Main Aur Meri Pari

           भीगे-भीगे  मौसम में ....मैं  और मेरी परी


 beege beege mausum me main aur meri pari
      


आज  सुबह  मैं  अपनी तीन साल की  भतीजी परी को बालकॉनी  में लिए खड़ी थी. छोटी सी बच्ची गर्मी  से बहुत परेशान  हो रही थी ... अचानक मौसम  का मिज़ाज  ख़ुशनुमा होने  लगा. गर्मी से राहत मिलने के आसार नज़र  लगे .... ठंडी -ठंडी हवाएं  चलने  लगी ,  नीले  आसमान  को  काले- काले  बादल  बड़ी तेज़ी  से ढकने लगे थे . 
beege beege mausam me main aur meri paribeege beege mausam me main aur meri pariकुछ देर  पहले गर्मी से परेशान  परी अब मुस्कुराने लगी थी ..... हवा  उसके बालो से खेल  रही थी ... उसने  अपनी आखें  बंद कर  रखी  थी और   वो  अपनी छोटी- छोटी  बाहें  हवा  में  फैलाकर  अपने आप को बारिश  में भिगोने  की  कोशिश  कर  रही थी.  मेरी  नज़रे  उस  पर जा कर  ठहर  गईं थी . ये नटखट शैतान लड़की  इस वक़्त बेहद   मासूम  लग रही थी.
इस  नन्ही परी को  भीगने  का बेहद  शौक  है  ... अक्सर  मैंने  उसे  अपने  दादा  से  कहते हुए  सुना  है  अददा ....हमें भिगोइए   हमें भिगोइए- . अब  तो सच-मुच  बारिश   की मोटी  मोटी  बूदें  हम दोनों  को  भिगोने  लगी थी .
बारिश  का खुश नुमा मौसम  है ही ऐसा ...जो  सबको मस्ती  में शराबोर कर दे . भीगना मुझे  भी  बेहद पसंद  है ...और अब  हम  दोनों  फूफी-भतीजी  पूरी तरह  मस्ती  करना  चाहते थे. 
लिहाज़ा  हम  छत  पर चले  लगे .... छत  पर से  नज़ारा और भी  ज्यादा ख़ूबसूरत  दिख  रहा था .....  बारिश  इतनी  तेज हो रही थी  की  दूर  दूर तक  धुंद  ही धुंद  नज़र  आ रहा था ....हम दोनों  बारिश के पानी में   नहाये जा  रहे थे . ... खूब  शोर  मचा  रहे थे... खेल रहे थे.
 वो  मुहं  पर हाथ  रख कर  कभी  खिलखिला  कर  हंस  पड़ती, तो कभी मेरी गोद में  चढ़ जाती  और कस  के चिपट जाती  ..... उसको  इस तरह  हँसता - खिलखिलाता  देख कर  ऐसा लग रहा था की सारी कायनात  मुस्कुरा रही  हो.
beege beege mausam mein main aur meri pariमैं  उन ख़ूबसूरत लम्हों को  पूरी  तरह जी रही थी और कुछ वक़्त के लिए अपनी  ज़िन्दिगी की उलझने और परेशानियो  को भूल गयी थी. हम अक्सर  बड़ी बड़ी खुशियों को हासिल करने के चक्कर में  छोटी छोटी खुशियों की  अहमियत  को नहीं समझ  पाते...और  सुनहरे  लम्हों को खो देते है.   
 जिंदिगी  हमें  ऐसे अनगिनत  ख़ूबसूरत  लम्हों से नवाज़ती  है जो हमारी रूह को भी सुकून पंहुचा देते  हैं .ये  ख़ूबसूरत  लम्हा उन्ही  लम्हों  में से एक था....  जिसे मैंने भरपूर जिया.

अरशिया  ज़ैदी  


 













29 Jun 2012

Poem- Peshani


                पेशानी

आज सुबह  जब मैंने अपनी  पलकें खोली 
उसने  झांक के देखा  मेरी  आखों  में 
और  कहा   चुपके  से मेरे कानो में.

aaj  subah jab maine apni palkein  kholi
 usne jhaak ke dekha meri aakhon mein 
 aur kha chupke se mere kano mein 

क्यों  चेहरे  पे  हैं  इतने  दर्द के  साए 
होटों  की मुस्कान  है जैसे खोयी सी 
मैंने कहा..... ख़फा  हूँ अपने माज़ी से.

 kyon  chehre pe hain itne dard  ke saye 
 honto ki muskaan hain jaise khoyee see
Maine kaha .... khapha hoon apne maazi se 

उसने मुझे  बाहों  में अपनी भर  लिया 
और प्यार से पेशानी को मेरी  चूम लिया 
मैं  हूँ ना .....माँ ने  ख़ामोशी से  कहा .

usne mujhe bhaoon mein apni bhar liya
 aur pyaar  se peshani ko meri choom liya
 main hoon  na ..... maa ne khamoshi se kha 

अरशिया  ज़ैदी (Arshia Zaidi)


15 Jun 2012

Shikast ke Phayede


                                                      शिकस्त के फायदे 


हाल  में  ही  मुझे हैरी पौटर सिरीज़ से, ....दुनिया  के नौजवान  बच्चो  के बीच अपनी  ख़ास  जगह  बना लेने वाली जे .के रौलिंग  की जिंदिगी के कुछ अनछुए पहलुओ को पढने   का मौका  मिला...... बहुत  अच्छा  लगा  साथ  ही  इस  बात  का  अहसास  भी बड़ी  शिद्दत  से   हुआ .... की  जिंदिगी  में  कुछ  भी मुफ्त  में  हासिल नहीं   होता ..... बड़े  सख्त  और  मुश्किल  हालात  से  भी गुज़रना  पड़ सकता  है  जिंदिगी  की जंग   जीतने के लिए .....जैसे -जैसे  मैं  उनके  बारे  में  पढ़ती  जा  रही थी ......वैसे -वैसे  मुझे  अपने  अंदर  एक   excitement  महसूस  होता  जा रहा  था ......... सोचा  की क्यों  न  आप  सब  के  साथ,  उनकी सोच ... उनका नज़रिया  शेयर  किया  जाए  !.

 जैसा  की  हम  सब  जानते  है ....  मशहूर ब्रिटिश  राइटर जे . के रौलिंग   उस  हस्ती  का   नाम  है .... जिन्होंने  हैरी पौटर  सिरीज़ लिख  कर  पूरी दुनिया  के नौजवान बच्चो को अपना दीवाना  बना रखा है .अब तक हैरी पौटर सिरीज़ 67 भाषाओ   में translate  की जा चुकी  है. 

कामयाबी  की ये  दास्ताँ  सुन  कर  कितना  अच्छा  लगता  है  ना ...! लेकिन  हमारे  लिए यहाँ  इस  बात  को  समझना  बेहद ज़रूरी  है  की  ये  ऊचाईयां  उन्हें  रातो -रात  हासिल नहीं  हुई है, .......उन्हें तमाम  ऊचें - नीचें  रास्तो  से  गुज़ारना पड़ा  तब जाकर  उन्हें  ये कामयाबी मिल सकी.

उनका  मानना  है  की हर  इंसान  की  जिंदिगी  में  एक ऐसा  वक़्त  आता  है ....जब  उसे  शिकस्त  का सामना करना  पड़ता  है ..... . चाहे  किसी के  पास  कितना भी  पैसा  हो , बड़ी - से  बड़ी  डिग्रीयां  हो  या  कितना  भी अच्छा करियर  क्यों न  जा रहा हो. 

ऐसा  ही  एक  दौर  उनकी  जिंदिगी  में तब  आया, जब  उनकी  शादी  टूट रही थी , उनके  ऊपर एक  बेटी की ज़िम्मेदारी थी, रहने के लिए अपना घर नहीं  था ,वो एकदम  बेरोजगार  और  अकेली थी . उस वक़्त  उन्हें  लगा था  की  वो अपनी जिंदिगी  की सबसे  बड़ी शिक़स्त  का  सामना कर  रहीं  है .
लेकिन  उस  मुश्किल  वक़्त  में   भी...... नाकामी  और  शिक़स्त  उनके  लिए  क्या  मायने रखती है.... ये  तय करने  का  हक़  उन्होंने  अपने  पास ही रखा .... हांलाकि   लोगो ने  उन  पर  अपने  -अपने नज़रिए से   शिकस्त  के  मायने   थोपने की  कोशिश  ज़रूर  की, लेकिन  उन्होंने   किसी  की बात  का कोई  असर  नहीं  लिया ... लोगो  की बातो  से बिना  confuse  हुए  हार  की अहमियत   को  समझा  .... और दिलचस्प  बात ये है.... उन्हें  अपनी जिंदिगी की  सबसे  बड़ी हार  में भी  बेशुमार फायदे  नज़र  आये. 

अपनी  हार  में पहला  फायदा  उन्हें  ये   नज़र  आया  की  वो ज़मीनी हकीक़त  से रूबरू   हुई .... उन्होंने  इस सच्चाई  को  क़ुबूल  किया की उनकी  शादी-शुदा  जिंदिगी खुशहाल  नहीं थी...इसलिए उनकी  शादी  का टूट जाना ही  बेहतर था. और  उसके  बाद  उन्होंने  कभी   पीछे मुड़  कर  नहीं देखा ... और अपनी  सारी  energy अपने  काम में लगा दी ... उन्होंने  वो करने  की ठानी जो वो  हमेशा  से करना  चाहती थी .... और  यही  वो  लम्हा  था जब उनके  दिल के सारे  डर   निकल  गए .....उनके  पास उनकी  बेटी  थी जिसे  वो बेहद प्यार करती थी.... एक  अपना  टाइप  राइटर था ... जिसकी  मदद से उन्होंने  दिमाग़  में  आये  एक  शानदार  आईडिया... को  पन्नो  पर उतारना  शुरू कर  दिया... और  तब उन्हें    अपनी  इस  खूबी  का अहसास  हुआ  की  की उनके  अंदर  शिद्दत  से  अपना  काम करने  की  सच्ची लगन है , discipline  है...   और वक़्त  की   कीमत   का  अहसास  है .

दूसरा, उन्हें  इस  बात  का  भी  अहसास  हुआ  की  उनके पास  फॅमिली  और  अच्छे  दोस्तों  का  ज़बरदस्त  moral  support  है जिसकी  वजह  से  उस बुरे  दौर में   भी उनका  आत्म विश्वास  कभी नहीं डगमगाया  और  वो  अच्छे  से अच्छा  काम  करती  रहीं .


उनका  कहना  है -
"हार  हमें   खुद  को  पहचान  पाने  का  सुनहरा  मौक़ा  देती है..... इसलिए   जब - जब जिंदिगी  में  हार का सामना  करना पड़े  तब  घबराएं  नहीं  और  अपने  अंदर  झाँक कर  अपनी  असली  ताक़त  को पहचाने  और उसका  भरपूर  फायदा  उठाएं." 
 अरशिया  ज़ैदी 






   


 


     


  

4 Jun 2012

lakkerein

          लकीरें 
आज हाथ की लकीरों को 
देखा ये सोच कर मैंने 
शायद  खुशियों  का हुजूम 
कही, मेरे लियें छुपा हो 

aaj  hath ki lakero ko 
dekha ye soch kar maine 
shayad khushiyon ka hujoom
 kahin mere liye chupa  ho.


तन्हा  सी  जिंदिगी में 
ठहरा सा  हो कोई रिश्ता 
अपना लगे जो मुझ को 
हर ग़म  में और ख़ुशी में

 tanha se zindigi mein 
 tehra sa ho koi rishta
 apna lage jo mujh ko 
 har gum mein aur khushi mein 

एक  अनजानी सी तलाश 
बरसो से रही है मुझ को 
शायद किसी सुबह 
मेरे दरवाज़े पे खड़ी हो 

Ek anjani se talash 
barson se rahi hai mujhko
sayad kisi subah 
 mere darwaze pe khadi ho 

अरशिया  ज़ैदी( Arshia zaidi)

27 May 2012

satya mave jayate....ek aam aadmi ka show

       सत्य मेव जयते...एक आम आदमी  का टॉक  शो 
                          
आज  सन्डे  है  दिन  के 9 बज  रहे  है ... और  मुझे दिन  के 11 बजने का इन्तिज़ार है दिन  के 11 बजे ....यानी  आमिर खान के साथ " सत्य मेव जयते " देखने का वक़्त...जिसका  मुझे  बेचैनी  से इन्तिज़ार है.....सोच  रही हूँ  की आज  आमिर  खान  किस   मुद्दे  पर  अपने टॉक  शो में   बात   करेंगे  

एक  लम्बे  अरसे के बाद  ऐसा  रिअलिटी  शो आया है जो  ऐसे  सामाजिक  मुद्दो  और समस्याओ   पर   बात  करता है ...जो  आम     आदमी की  जिंदिगी  पर  सीधा  असर डालते  है ... और कही न  कही .....  हम  सब  की  जिंदिगी  से  ताल्लुक़   रखते  है.  ये  शो लोगो  को एक  नयी   उम्मीद .... नया हौसला  दे रहा है .  
  सत्य  मेव  जयते  को देख  कर लगता है  जैसे  वो  ज़माना  वापस  आ  गया हो ,जब  इतवार  को  दिन  के 11 बजे,  पूरा  घर  एक  साथ  बैठ  महाभारत  और  रामायण  टी वी  सीरियल  देखा  करता  था. तेलगु , कन्नड़ ,बंगाली , मलयालम  जैसी  दूसरी हिन्दुस्तानी भाषाओ   में  डब  किया गया ये  पहला  ऐसा  हिंदी  रिअलिटी शो है जो  प्राइवेट  चैनल  के साथ - साथ  दूर दर्शन  पर  भी  इतवार 11 बजे ही   दिखाया  जा रहा  है. ताकी उसे   भारत   के  सभी  भाषाएँ बोलने और समझने वालो  तक  पहुचाया  जा  सके.

आमिर खान  जो काम  भी करते है ... वो "ज़रा हट के "होता है ... ये एक  बार  फिर उन्होंने  साबित   कर   दिखाया  है .सत्य जीत  भटकल  के  निर्देशन  में Amir khan Production Company  ने  इस  सीरियल  को  बनाया  है. जिसमे  आमिर खान  ने  अपनी  स्टार  पॉवर  का इस्तेमाल  करके समाज  के कुछ  ऐसे अहम  अनछुए  मुद्दों और  समस्याओं पर रौशनी डालने की कामयाब  कोशिश  की है  जिन के  बारे  में  गहराई से सोचने और  उनका हल  .... निकालने की ज़रुरत है। 
पिछले तीन एपीसोड़ में आमिर  खान  ने  जो  topic  चुने  और जिस  तरह  उन्हें positive  approach के  साथ  conduct किया  वो क़बीले तारीफ़  है...  
6  मई  20 12 को  सत्य  मेव  जयते  के  पहले एपीसोड़  में हिन्दुस्तान  में  तेज़ी  से हो रहे  female  foeticide   की  शिकार  औरतो  की  आप -बीती  हम  तक  पहुचाई गयी . 
और  sting operation (2005)  करने  वाले   पत्रकार  श्रीपाल  शेक्तावत  और मीना  शर्मा  की  बहादुरी  को   ना  सिर्फ    सराहा  गया ....बल्कि  सात  साल  से  लटके  उनके  sting operation  केस  को  फास्ट  ट्रैक  पर चलाने  की गुजारिश  भी  की  गयी... जिसे   राजिस्थान  के मु ख्य  मंत्री अशोक  गहलोत  ने  मान  लिया 
Female  foeticide   के  खिलाफ  छिड़ी  इस  मुहीम का  अच्छा  असर  देश   के कई  शहरों  में  देखने  को  मिला, बड़ी तादाद   में ऐसे maternity और sonography  clinics  के  licenses  रद्द   कर   किये  जा रहे है जहां Female foeticide के  केस   हो रहे थे.
सत्य मेव  जयते  के  दूसरे  एपीसोड  में  आमिर  खान  ने एक  ऐसे  नाज़ुक  मुद्दे को  छुआ  जिसे  हम  child  sexual  abuse  कहते है, जिसके  बारे में   लोग   आज  भी  बात  करने से  कतराते  है .
इस   एपीसोड़े में  सिंड्रेला प्रकाश , हरीश  अय्येर   जैसे  victim से मुलाक़ात  करवाई गयी, जिन का  बचपन child  sex  abuse के खौफ़  नाक  अँधेरे  में  कहीं  गुम  हो गया था.  
आखें  खोलने  वाले  इस  एपीसोड़  ने   आम  लोगो को  child  sex  abuse के  बारे  न  सिर्फ  alert  रहने  की  सीख   दी  बल्कि उन्हें  इस  सच्चाई  से  भी वाकिफ  कराया  ... की  करीबी  दोस्त  और  रिश्तेदारो  पर  भी नज़र रखना  ज़रूरी है क्योकि  ज़्यादा तर  दोस्त और रिश्तेदार ही ऐसा कर बैठते है  इसके  अलावा आमिर  खान  ने  बच्चो  को  sex abuse  से
बचाने के लिए  एक  वर्क-शॉप   की
और  उन्हें  good touch / bad touch 
 का  फर्क  समझाया  ताकी  बच्चे  खुद को  sex abuse से बचा सके .
इस  एपीसोड़ ने  वो कर  दिखाया ,जो अब तक  नहीं हो सका था. हाल  में ही लम्बे वक़्त  से संसद में रुका हुआ  Protection of children  against sexual offences bill  पास  हो  गया है  जो  वाक़ई  बेहद  ख़ुशी  की  बात  है ,गौर  तलब  बात  ये है की  अब  तक, हमारे देश  में sex  abuse  को लेकर कोई  कानून  नहीं  था.
अब  लोग खुल  कर रेडियो और  मीडिया  में  child  sex  abuse के बारे  में बात  करने लगे है .बच्चो की  हेल्प  लाइन  और NGO  के  पास  भी अब बड़ी तादाद  में  मदद के लिए  फ़ोन  आ  रहे है 
त्य  मेव जयते  के   तीसरे  एपीसोड़  में  आमिर  खान ने दहेज़  के side effect को  आम  जनता तक पहुचाया....... लेकिन   कुछ   अलग  अंदाज़ से ...   
उन्होंने  अपने शो में  रानी त्रिपाठी  जैसी   लडकियों  को  बुलाया जिन्होंने "लोग  क्या  कहेंगे " इस  बात  की परवाह  न  करते हुए दहेज़  के  खिलाफ   अपने  सुसराल  वालो  की dowry demands को रिकॉर्ड  करके  मीडिया  और पब्लिक  के सामने ला खड़ा किया, जिसमे  उनके घर वालो ने उनका पूरा साथ  दिया .
आमिर खान  ने  अँधेरे में  रौशनी की  किरण  दिखाते  हुए .. बुरहान  पुर के  "तंज़ीम  खुद्दाम  ए   मिल्लत "  कॉमुनिटी के  मौसिम  उम्मीदी से  मुलाक़ात  करवायी  जो  अपने   शहर  बुरहानपुर में  नो  बैंड... नो  बाजा  ... नो बरात  का  तरीका  अमल  में लाते  हुए बिना दहेज़  और  लेन -देन के, सादगी से  शादियाँ  करवा रहे है ....  उनसे  inspire  होकर  उनका पूरा शहर  इस  तरीके  को  अपना  रहा   है. 
आमिर खान के  जादुई  पिटारे में  और क्या क्या है,  ये  हर नये  एपीसोड़ में पता  चलता  रहेगा   ... उम्मीद है  की  सत्य मेव जयते का हर एपीसोड़  लोगो  की  किसी  न   किसी   उलझन  को सुलझाएगा..... जीने की  राह  दिखायेगा. और  लोगो  को  कुछ  अच्छा करने की inspiration  देता रहेगा      
   अरशिया  ज़ैदी   













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10 May 2012

100 saal ki jawaan ....ZOHRA SEHGAL

                 100 साल की  जवान ......जोहरा सहगल 

"अभी  ना जाओ छोड़  कर,  
  के  दिल अभी  भरा नहीं .....
  के केक अभी कटा नहीं ....".ये  लाइने  गुनगुना रही थी मशहूर  थिऐटर  और  फिल्म  एक्टर  जोहरा सहगल..... अपनी 100 वी  साल गिरह  पर एक  बड़ा  सा  केक   काटते  हुए.
27 अप्रैल 1912 को उत्तर  प्रदेश  के  रामपुर  जिले  में  पैदा  हुई  और  सहारन पुर के  रूहेला पठान  ज़मीदार  खानदान  से ताल्लुक़  रखने वाली  जोहरा  सहगल बीती 27 अप्रैल को 100 साल की हो गयी.उनका ज़िक्र आते ही ऐसी  खुश मिज़ाज,अल्ल्हड़ , नटखट  और बिंदास   बुज़ुर्ग  अदा कारा  का चेहरा सामने आता है  जो अपनी  बेमिसाल   एक्टिंग  के लिए तो जानी ही जाती है....  साथ  ही जानी जाती है  जिंदिगी  के लिए अपने जोश  और प्यार  के  लिए .

एक  एक्टर  बनने  के लिए,उन्होंने अपने अंकल  के साथ ,इंग लैंड  तक  का  सफ़र सड़क  के रास्ते,अफगानिस्तान  और इरान  होते  हुए  तय  किया था .जोहरा ने अपने  लम्बे करियर में  Indian People's Theatre और प्रथ्वी राज थिएटर  के साथ  14 साल  तक काम  किया,और आठ  साल  तक  अपने गुरु  उदय  शंकर से   डांस  क्लासेस  ली.फिल्मो में उनका  करियर  धरती के लाल  से  शुरू  हुआ   ....Bhaji on the beach (1992) हम  दिल  दे चुके  सनम , Bend it like Beckham (2002),दिल  से ...(1998),चीनी कम  और  सावरियां उनकी  यादगार  फिल्में हैं   
इसके अलावा  छोटे परदे  पर The Jewel in the crown,(1984),Tandoori Nights (1985-87),Amma & Family(1996) जैसे  मशहूर  टी वी  सीरियल स  में  भी अपने काम से लोगो  के दिलो  पर  अपनी  छाप  छोड़ने  में  कामयाब  रही.

जोहरा  नास्तिक  ख़यालात  की  रही है.ख़ुदा  में  यकीन  न  रखने  वाली जोहरा  ने  जब  मजहब  और जात -पात  से ऊपर उठ  कर अपने से  8 साल  जूनियर .... 'साइंटिस्ट ,डांसर  और  पेंटर'  कामेश्वर  नाथ  सहगल  से  शादी  का  फैसला  किया  तो शुरू  में  माँ - बाप की  रज़ा मंदी  नहीं  मिली  लेकिन  कुछ  वक़्त  के बाद  वो मान  गए  और उन्होंने  शादी  की इज़ाज़त  दे दी. 14  अगस्त  1942 को  उन्होंने  कामेश्वर  नाथ  सहगल  से  शादी कर ली .उनकी शादी के  reception  में  पंडित  जवाहर  लाल  नेहरु  भी शामिल  होने वाले  थे  लेकिन  उन्ही दिनों 'भारत  छोड़ो  आन्दोलन'  में  महात्मा गाँधी  का  साथ  देने  की वजह से  उन्हें  कुछ  दिनों के लिए  गिरफ्तार   कर  लिया और  वो  जोहरा  की  शादी में शामिल   नही  हो सके  थे .

जोहरा  की शख़्सियत  शुरू से ही  रोबदार  और  दूसरो पर  धोंस  जमाने  वाली  थी.1945 में जब वो और  उनकी  बहन  उज़रा  साथ -साथ  प्रथ्वी  थियेटर  में काम  कर रही थी  तो वो  अक्सर ओपरा हाउस  का एक  कोना पकड़  लिया  करती .... और फिर  किसी की मजाल ....की कोई उनका  छोटा सा भी  मेंकअप  का सामान  ले  सके.... यहाँ तक  की छोटी  बहन उज़रा  भी  नहीं ... हालांकि,सब उनकी बेहद  इज्ज़त  करते  थे  और  उनका  मुकाम  बहुत ऊंचा था फिर भी उन्हें .... ये लगता था की उज़रा बेहद गोरी और हसीन  है इसलिए सब उसे ज्यादा प्यार करते है.

वो खूबसूरत  दिखने  और  लोगो  का ध्यान  अपनी  तरफ  खींचने  के लिए  काफी  मशक्कत   करती.....और  उनकी ये चाहत  आज  भी  बरक़रार है . 
"आज  भी वो एक  ऐसी  खूबसूरत  औरत  दिखने की  ख़्वाहिश  अपने दिल में रखती है.जो अंग्रेजो  की तरह  बेहद  गोरी  हो और  जिसकी  आखों का रंग  नीला हो ." 
उनकी जिंदिगी तब थम सी गयी, जब 1959 में उनके शोहर कामेश्वर  सहगल  ने, हमेशा  के लिए  अपनी  आँखें  बंद  कर ली ...और  बेटी किरण   सहगल  और बेटा पवन  सहगल  की  ज़िम्मेदारी अकेली जोहरा सहगल  पर आ गयी.अपनी इस  ज़िम्मेदारी  को  भी उन्होंने  बखूबी निभाया और  बच्चो  की  बेहेतरीन   परवरिश  की .  


जिंदिगी के  उतार - चढाव  उन्हें  कभी हरा  नहीं  पाए  उन्होंने .... अपने  अंदर की  आग  को जलाये  रखा .... बस  आगे चलती गयी ... कभी पीछे  मुड़  कर नहीं  देखा ,अपनी Creativity को बरक़रार रखते  हुए  हमेशा  कुछ  नया ... कुछ  अच्छा  करती गयी .जिसके लिए उन्हें अब तक  पद्म श्री(1998),काली दास  सम्मान ,(2001) जैसे  बड़े खिताबो से नवाज़ा  जा चुका  है.2004  में संगीत  नाटक  अकादमी से  उन्हें Life time achievements  के लिए  fellow ship  दी गयी और  2010  में  पदम् विभूषण  सम्मान  दिया  गया. 
जोहरा  सहगल  की बेटी  किरण  सहगल  ने  अपनी माँ की 100 वी साल  गिरह  पर  पहली Biography "जोहरा सहगल  फैटी"  निकाली  है जिसमे  उन्होंने  जोहरा सहगल   की जिंदिगी के  अन छुये पहलुओं पर  रौशनी  डाली है और  ख़ास तौर  पर "फैटी "लव्ज़  इसलिए  इस्तेमाल  किया है  क्योंकि  उनकी  माँ  अपने  वज़न  को लेकर आज भी  ऐसे ही ऐतिहात  बरतती  हैं ..... जैसे 16 साल  की लड़की ... हर हफ्ते अपना वज़न  तौलने वाली जोहरा सहगल  को अगर ज़रा सा भी  अपना वज़न  बढ़ा हुआ   लगता है,तो वो  फौर न अपनी diet  कम  कर  देती  हैं और दो टोस्ट के बजाये एक टोस्ट  ही लेना  पसंद करती  है. 
जोहरा सहगल वक़्त की बड़ी पाबंद हैं और अपनी घडी को पांच  मिनट  आगे रखती  हैं .....शायद  इसी लिए  वो वक़्त  से  कही आगे हैं, उन्होंने  उम्र  को अपने  ऊपर  कभी  हावी  नहीं होने  दिया....  और  आज  भी मस्ती में गुनगुनाती  हैं .. "अभी तो मैं जवान हूँ ...अभी तो मैं जवान  हूँ " 
अरशिया   ज़ैदी  
    

  












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25 Apr 2012

Ye Kaisa Craze.......

                                                              ये कैसा क्रेज़ !

एक माँ अपनी 14 साल की बेटी  को एक  Educational Institute में ले गयी और काउंसलर से  बोली.... मेरी बेटी को आप किसी ऐसे कोर्स  में admission  दे दीजिये ....जिसमे  ये  ज्यादा से ज्यादा busy रहे.और इसे फेस  बुक और मोबाइल फ़ोन से चिपके रहने का ज़रा भी  वक़्त  न मिले .  
ये तो थी एक माँ की बात ...लेकिन आज आप जिस तरफ नज़र घुमाएँ वहाँ आपको यही हाल मिलेगा ...... कोई मोबाईल पर बातें करते करते घंटो निकाल देता है तो कोई  सोशल नेटवर्किंग साइट्स  पर  चेट करते करते   अपना सारा वक़्त  बर्बाद कर लेता है. 
 कई बार नयी  नवेली-दुल्हन अपने मियाँ से इसलिए खफा  हो जाती  है क्योकि उसका मियाँ उनसे ज़्यादा अपने कंप्यूटर को वक़्त देता  है और ऑफिस  से आकर  भी अपने कंप्यूटर पर गेम खलने  बैठ जाता है.बड़े क्या... बच्चे क्या...  कंप्यूटर गेम का चस्का एक ऐसा चस्का बन गया है जिसके  बाद तो फिर किसी को किसी चीज़ का होश नहीं रहता .
 बेशक  नई-नई technologies और gadgets  ने हमारी जिंदिगी में connectivity को काफी आसान कर दिया है जिससे हम व्यस्त जिंदिगी और वक़्त की कमी के चलते  भी एक- दुसरे से जुड़े रह पाते है.
पर कहते है न ... हद से ज्यादा कोई भी चीज़ बुरी होती है .ये बात अब  मोबाइल  फोन  और सोशल  नेटवर्किंग  साईटस के बारे में भी लागू होने लगी  है.ऐसा लगने लगा है की इन  technologies का इस्तेमाल लोगो के लिए  एक लत .... एक चस्का बनती जा रही है.
 हाल में ही आयी रिसर्च कहती है.....  की ज़रुरत से ज्यादा  मोबाइल फोन के इस्तेमाल से कुछ लोगो के कान भी बजने लगे है....उन्हें बिना फ़ोन की घंटी बजे ही फ़ोन की घंटी सुनायी देती है.  और अगर थोड़ी देर तक उनका फ़ोन न बजे या कोई SMS न आये तो वो बैचेन  होने लगते  हैं . ..... उनके दिल की धड़कने बढ़  जाती है और  वो बार -बार अपने फोन को check करते रहते है.  

लोगो को Mobile Phone को लेकर इतना    obsession होता जा रहा है की वो एक मिनट के   लिए भी अपने फ़ोन को  खुद  से अलग नहीं कर पाते...  और तो और उनका फोन Bath Room में भी उनके साथ  जाता है.कई लोगो को तब तक नींद नहीं आती जब तक उनके ताकिये के पास उनका  मोबाइल  फ़ोन  नहीं रखा होता है .सोते- सोते तक  वो ये चेक करते रहते है की कही उनका कोई  मेसेज तो नहीं आया  ....और इस चक्कर में उनकी वो देर रात तक जागते रहते  है.
रिसर्च में आये ताज़ा आकडे बताते है की मोबाइल फ़ोन और सोशल  नेटवर्किंग साईटस पर बहुत ज्यादा वक़्त गुज़ारने और इन पर  ग़ैर ज़रूरी dependent रहने की  वजह  है ....लोगो के अंदर का अकेलेपन और आत्म सम्मान की कमी.
कई बार जब लोग जिंदिगी के बुरे दौर से गुज़र रहे होते है .... या अकेले रहते हुए अपने आप को Unwanted और lonely महसूस  करने लगते है तब  ऐसे में उनका  मोबाइल फोन उनका एक ऐसा दोस्त बन जाता है जिसका ज्यादा साथ उनके लिए नुकसानदेह  साबित हो सकता है.

इसका असर Offices में .Employees की performance पर भी देखने को मिल रहा है.फेस बुक  और ट्विट्टर जैसी  साइट्स पर ज्यादा वक़्त बिताने  से,उनका out put घटने लगा है.जिसे रोकने के लिए अब Offices में इन साईटस को  block किया जाने लगा है.
अच्छा होगा की हम  इनgadgets को अपनी सहूलियत के लिए इस्तेमाल करके इनका भरपूर फायदा उठाएं और किसी भी हालत में अपनी जिंदिगी पर इसका बुरा असर न पड़ने दे ..इसके लिए कुछ बातों का ख़याल रखा जा सकता  है. 
 खाना खाने से पहले फ़ोन  की  रिंग टोन को हल्का या बंद कर दे ताकी इत्मीनान से खाना खाया जा सके  ..... आपके खाने से ज्यादा ज़रूरी नहीं है  ...बात करना... बात.... खाना खाने के बाद भी की जा सकती है.
अगर आपको लोगो से आमने- सामने बात करते हुए बीच- बीच में फ़ोन पर बात करने और SMS चेक  करने की आदत है तो  अच्छा होगा की आप  ऐसा करने से खुद  को रोके और फोन को switched off कर दें .
मोबाइल के obsession से  छुटकारा पाने के लिए फ़ोन को  दुसरे कमरे में  recharge करे ... ताकी वहाँ तक जाते-जाते  आपका मेसेज पढने का जोश कुछ  कम हो सके.
सोने से पहले फ़ोन को  बंद कर के उसे Good Night ज़रूर कह दें ताकी  आपकी नींद में ख़लल न पड़े और आप चैन से सो सकें . 
फ़ोन पर लम्बी-लम्बी  बात करने से अच्छा होगा की आप अपने दोस्त से रुबरु मुलाक़ात करे और फुर्सत के लम्हे उनके साथ गुज़रें... यकीनन  आपको अच्छा लगेगा.
   अरशिया ज़ैदी  

9 Apr 2012

cake


          केक 

 केक  कटेगा  सब  में बटेगा 
 तुमको मिलेगा हमको मिलेगा 
 जिसने केक को  काटा होगा 
 कुछ  उसके  मूँह  पर भी मलेगा 

 cake  katega sab me batega
 tumko milega  hum ko milega 
 jisne cake ko kata hoga 
 kuch  uske moohn  par bhi malega

 हम सब देख के ललचायेंगे 
 और  केक पर झपट  पड़ेंगे 
 जो  ज़यादा   केक  गटक  जायेगा
 मज़े  तो बस  उसके आयेंगे 

 hum sab dekh ke lalchayenge
 aur cake par  jhapat  padenge
 jo zyada cake  gatat  jayega
 maze to bas uske aayenge

 अरशिया ज़ैदी 
( written on my brother's (Ali) birthday)
  

Meri Inspiration Rekha.........Vidhya baalan

मेरी Inspiration  रेखा .....विद्या बालन 
Vidhya Baalan 
विद्या बालन की ताज़ा- तरीन फिल्म "कहानी "आज कल बड़ी सुर्खियों में है. हर कोई फिल्म के डारेक्टर सुजोय घोष के Direction और विद्या बालन की बेहतरीन    अदाकारी की तारीफ कर रहा है. 
 हम भी काफी दिनों से विद्या बालन की फिल्म कहानी की तारीफ सुन  रहे थे इसलिए ऑफिस से आने के बाद  प्रोग्राम बना लिया Night Show जाने का.
'घर के सामने  महागुन माल में  ही तो जाना  है....5 मिनट में पहुच जायेंगे...'. ये सोच कर इत्मिनान से खाना -वाना खा के निकले,जब हम जब PVR Cinema पहुचे  तो फिल्म शुरू हुए 5 मिनट हो चुके थे ... मूड तो वही ऑफ हो  गया था क्योकि फिल्म का एक सीन भी छूटे ये  हमें गवारा  नहीं... खैर अपनी झुन्ज्लाहट पे क़ाबू करते हम आगे बढ़ने लगे. 
सुजय घोष की फिल्म  कहानी शुरू से ही काफी  दिलचस्प लग रही थी ....7 month  pregnant विद्या बागची ( विधा बालन) अपने  खोये पति को लन्दन  से इंडिया आकर ढूँढ रही थी. इस  suspense thriller देखने के लिए हम इतने excited थे की सिनेमा हॉल की सीढियां चढ़ते  हुए  भी  अँधेरे में स्क्रीन पर अपनी आखें गडाए हुए थे.

सुजोय घोष ने कोलकाता की तंग गलियों में एक बेहेतरीन फिल्म शूट करके ये बता दिया है की एक अच्छी फिल्म को बनाने के लिए फिल्म की  दमदार कहानी के साथ अच्छा direction  भी ज़रूरी है.ज़रूरी नहीं है की फिल्म का बजट आसमान को छुए,फिल्म की शूटिंग विदेशो की  हसीन लोकेशन पर ही हो,या फिल्म में ज्यादा से ज्यादा गाने डाल कर दर्शको को रिझाने की नाकाम कोशिश  की जाएँ .
विद्या बालन अपनी ज्यादा तर फिल्मो में  अलग-अलग तरह के यादगार किरदारों को निभाती  रही है .परिणीता,लगे रहो मुन्ना भाई, नो वन किल्ड जेसिका,गुरु ,पा,इश्किया, द डर्टी पिक्चर ,या  हाल में आयी उनकी नई फिल्म कहानी इसकी मिसाल है. हर फिल्म में उन्होंने एक से बढ़ कर एक Performances दी हैं और हर फिल्म में कुछ नया करके दिखाया है.  
रेखा और विद्या बालन जब एक साथ दिखाई देती है,तो दोनों की शख्सियत काफी हद तक एक-दुसरे से मिलती-जुलती नज़र आती  है फिर चाहे वो इन दोनों के Indian looks हो,कांजीवरम  साड़ी पहेनने का शौक़ हो या फिर,हो इनकी......boldness.विद्या बालन का कहना है की वो  रेखा से बेहद inspired है,जब कोई उन्हें रेखा से मिलाता है तो ये उनके लिए सबसे बड़ा Compliment होता है.    

स्क्रीन अवार्ड्स 2012 में जब  रेखा ने विद्या   बालन की सुपर हिट फिल्म Dirty Picture के मशहूर गाने ऊ ला ला.... ऊ ला ला पे ...अपने बेहेतरीन डांस की झ लक दिखाई  और एक साथ स्टेज शेयर  किया तो ऐसा लगा की ख़ूबसूरत रेखा की बे मिसाल विरासत   को अगर कोई आगे लेकर जा सकता है तो वो है विद्या बालन और सिर्फ ......विद्या बालन

अरशिया  ज़ैदी









27 Mar 2012

                         अजब फ़साना  (Ajab Phasana)

दर्द से हर एक दिल का
रिश्ता बड़ा पुराना है, 
न कोई समझ सका जिसे 
ये वो अजब फ़साना है. 

 Dard se har ek dil ka 
 Rishta bada purana hain 
 na koi samajh saka  jise 
 ye vo  ajab  phasana  hai 

हर शख्स सिलवटो में 
लिपटा सा नज़र आता है, 
अपने दर्द की अलग    
एक दांस्ता सुनाता है 

Har shakhs , silwato mein 
lipta sa nazar aata hai . 
apne dard ki alag
ek daastaan  sunata hai 

उलझी सी जिंदिगी को 
सुलझाने की जुस्तुजू में,  
हसरतो के जाल में 
उलझता ही चला जाता है. 

 Uljhi  see zindigi ko 
suljhane ki  justujo main
hasrato ke jaal main 
ulajhta hi chala  jata hai 

आँसू पलकों से निकलने को 
बेचैन  हुए जाते है 
फिर भी खुश होने का अहसास
 हम दुनिया  को दिए जाते हैं  

 Aansoo palkon se nikalne  ko 
 bechain hue jate hain 
 phir bhi khush  hone ka ahsaas 
 hum duniya  ko diye jaatein  hain 
   
अरशिया ज़ैदी  ( Arshia Zaidi)   

16 Mar 2012

Ek yaad bachpan ki

                            एक याद बचपन की

  आज कुछ फुरर्सत के लम्हे मेरे पास हैं .....सोच रही हूँ की यादो के झरोको से अपने बचपन में झाँकू .... बचपन में झाकते ही कई खट्टी-मीठी यादें,किसी किताब के पन्नो की तरह मेरी नजरो के सामने से गुज़रने लगती है.एक यादगार पन्ना, जहां आकर मेरी सोच कुछ ठहर सी जाती है ,और मुझे उस वक़्त में वापस ले जाती है जब मैं तक़रीबन दस साल की और मेरा भाई रुफी आठ साल का रहा होगा.

हर भाई-बहन की तरह हम भी बहुत झगड़ा करते थे.बात तू-तू मै-मै से शुरू हो कर अक्सर मार-पिटाई पर जाकर ख़त्म होती थी.मेरा प्यारा शैतान-भैया रुफी जो उम्र में मुझसे दो साल छोटा ज़रूर था लेकिन हर बार बाज़ी मार ले जाता था.हमारी लड़ाईयों से अगर कोई सबसे ज्यादा परेशान था .... तो वो थीं हमारी मम्मी.वो मुझे बार बार भइया से दूर रहने और लड़ाई न करने की हिदायत देती लेकिन मैं उनकी एक न सुनती.....और बार-बार झगड़ा करने के बाद भी अपने भैया के आस-पास ही रहना पसंद करती .... शायद इसलिए .....की मुझे उसके बिना ज़रा भी चैन नहीं था और मैं  उससे ज्यादा देर तक नाराज़ भी नहीं रह सकती थी. 
एक शाम  ... घर में सब लोग किसी पार्टी में जाने की तैयारी कर रहे थे. मम्मी ने हमेशा की तरह मुझे और रुफी  को पहले ही तैयार कर दिया था.खेल-खेल में हम दोनों की लड़ाई हुई और बात घूसों-लातो तक पहुच गयी.उस लड़ाई में मेरा पडला भरी रहा और मैने रुफी की पिटाई कर ली.
  मैं जानती थी कि मेरा नटखट  भैया मुझसे बदला ज़रूर लेगा,क्योंकि अक्सर ऐसी लडाई के बाद वो मुझे मारने भागता.... और मैं जल्दी से कमरे में जाकर छुप जाती,दरवाज़े को अंदर से बंद कर लेती....इस पर उसे और भी  ज़्यादा गुस्सा आता था.वो ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़े को धक्का देकर दरवाज़ा खोलने की  कोशिश करता  .... जब कभी  दरवाज़ा नही खुल पाता तो वो मुझे बहकाने के लिए  झूट-मूठ कहता अरे मेरी उंगली पिच गयी".जल्दी से दरवाज़ा खोलो.और मैं  झट से दरवाज़ा खोल देती...(इस डर से,कही सच में उसकी उंगली न पिच जाये) और दरवाज़ा खोलते ही रुफी को अपने सामने,शरारत से मुस्कुराता हुआ खड़ा पाती और फिर तो,मेरी ख़ैर नहीं होती थी.
उस दिन भी कुछ ऐसा  ही हुआ था .... दरवाज़ा बंद रखने के लिए मैंने  अपने दोनों हाथो की ताक़त लगा रखी थी ....दरवाज़े पर लगी चटख़नी भी कमज़ोर थी. 2-3 बार जोर से धक्का देने पर खुल जाती थी.उधर दरवाज़ा न खुल पाने की वजह से रुफी का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था ....वो दरवाज़े को जोर जोर से धक्का दे रहा था.अचानक उसने चिल्ला कर कहा ....  मेरी उंगली पिच गयी"....रेनी जल्दी से दरवाज़ा खोलो "..मैंने दिल ही दिल में सोचा ....
"अच्छा बच्चू....फिर एक बार तुम  मुझे बेवकूफ़ बना रहे हो  .....लेकिन इस बार मैं  तुम्हारी  बातो में नहीं आने वाली".
ये सब बातें दिल ही दिल में सोचते हुए मैंने और कस के दरवाज़ा बंद कर लिया.
अभी मैं अपने ख़यालो में उलझी हुई थी की,बाहर से मेरी अतिया फुप्पो  की आवाज़ आयी ....."रेनी जल्दी से दरवाज़ा खोलो....... रुफी की उंगली सच में, दरवाज़े के बीच में आ गयी है ."ये सुनते ही मैंने झट से दरवाजा खोल दिया और सामने  जो देखा......उसे देख कर मेरे तो होश उड़ गए  ....मेरा प्यारा भैया दर्द से बेहाल हो रहा था,उसका भोला-भाला मासूम चेहरा आँसूओ से तर था.उंगली से बुरी तरह खून बह रहा था,खाल आपस में चिपक गयी थी और नाख़ून उंगली से अलग हो चुका था. 
इतने में शोर सुन कर मम्मी बाहर आ गयी,और रुफी की यह हालत देख सन्न रह गयी ...लेकिन जल्दी ही उन्होंने खुद को सभाल लिया.बिना घबराये रुफी के हाथ पर डिटोल लगा कर पट्टी बाधी और मुझे पड़ोस में रहने वाले अज़ीज़ मामू को बुलाने भेज दिया.
 अज़ीज़ मामू एक बेहद नेक दिल और हमदर्द इंसान थे,जिन्हें हम प्यार से 'मामू' कहते थे.मैने जल्दी-जल्दी उन्हें सारी बात बतायी.वो घर आ गए और रुफी को फ़ौरन डॉक्टर चड्डा के पास ले जाकर  मरहम पट्टी करवा दी.
    घर में सब मुझसे बेहद नाराज़ थे.उसके बाद जो मेरी क्लास लगी है...उसके बारे में क्या बताऊ ? रुफी हमारे ताया-जानी(बड़े अब्बा) का बहुत लाडला भतीजा था. अपने लाडले की ये हालत देख कर ताया-जानी को मुझ पर बहुत ग़ुस्सा आया था ... मुझे अभी भी याद है ... उस वक़्त वो कघी से अपने बाल बना रहे थे... जैसे ही उन्होंने मुझे देखा... उन्हें और ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने उसी कघी से मेरी पिटाई कर दी थी,उस बेचारे कंघे को भी थोड़ी बहुत चोट आयी थी और वो टूट गया था. 
ऐसा लग रहा था की शायद भेड़िया आया-भेड़िया आया,वाली कहानी सच हो गयी थी.खेल ही खेल में एक बड़ा हादसा हो गया था,जिसकी वजह से मेरे भैया को बहुत दर्द सहना पड़ा था.जो कुछ हुआ वो अनजाने में हुआ ... लेकिन बेहद बुरा हुआ था.. 
रुफी की उंगली को ठीक होने में कई दिन लग गए थे...उसकी उंगली तो ठीक हो गयी लेकिन उस उंगली पर पूरा नाख़ून कभी न आ सका.जिसको देख कर आज भी मुझे अफ़सोस होता है..
अरे आप किस सोच में डूब गए ....क्या आप को भी अपने बचपन की कुछ शरारते याद आ गयी ? अगर आप ये सोच रहे है कि इस हादसे के बाद   हम सुधर गए होंगे और हमने झगड़ा करना बंद कर दिया होगा ... तो आप गलत समझ रहे है.उसके बाद भी हम झगड़ा करते रहे..... आज भी करते है लेकिन थोड़ी तमीज़ से !!!
 अरशिया  ज़ैदी